प्राचीन काली माता मंदिर को नवरात्र के मद्देनजर भव्य तरीके से सजाया गया है। पहले नवरात्र शनिवार से श्रद्धालु माता के दर्शनों के लिए सुबह से ही मंदिर में आने लगेंगे। इसके लिए मंदिर प्रबंधन ने सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। मंदिर सचिव पृथ्वी मित्तल का कहना है कि इस बार ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करने के बाद ही श्रद्धालु माता के दर्शन कर सकेंगे। देखें तस्वीरें...
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माता काली मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला
रजिस्ट्रेशन करने के बाद 11 हजार श्रद्धालुओं को रात दस बजे तक माता के दर्शन हो सकेंगे। जानकारों का कहना है कि पौराणिक कथाओं के अनुसार, काली माता मंदिर के नाम पर ही शहर का नाम कालका पड़ा था। मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। देश से ही नहीं अपितु विदेश से भी श्रद्धालु माता के दरबार में नतमस्तक होने आते हैं।
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माता काली मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला
मंदिर की यह है मान्यता
जानकारों के अनुसार, सतयुग में महिषासुर, चंड-मुंड, शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज आदि राक्षसों का उपद्रव बढ़ गया था। देवता भी डरकर कंदराओं में छिपे थे। एक दिन सभी देवताओं ने आदिशक्ति श्री जगदंबा मातेश्वरी की स्तुति की। प्रसन्न होकर माता एक बालक के रूप में प्रकट हुईं। देवताओं का दुख सुनकर माता ने अपने स्वरूप को विस्तृत किया।
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माता काली मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला
उनके हजारों हाथ-पैर थे। सभी देवताओं ने आदिशक्ति को अपना एक-एक शस्त्र दिया। विष्णु ने चक्र, शिव ने त्रिशूल, ब्रह्मा ने कमंडल, इंद्र ने वज्र, शेषनाग ने शेषफांस, यमराज ने यमफांस आदि शस्त्र माता को अर्पण किए। इसके बाद माता जगदंबा रणभूमि में उतरीं और महिषासुर सहित सभी दैत्यों का संहार कर कालका की भूमि पर स्थित हुईं, जो कालांतर में कालका में काली माता के नाम से प्रसिद्ध हुई।
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माता काली मंदिर।
- फोटो : फाइल फोटो
पांडव काल से भी जुड़ी हैं धारणाएं
धारणा है कि द्वापर युग में पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास हुआ। उस दौरान वह विराट नगर में 12 वर्ष तक रहे। उस समय केवट राजा के राज्य में गाय की बहुत सेवा की जाती थी। वहीं एक श्यामा नामक गाय रोजाना अपने दूध से माता की पिंडी का अभिषेक करती थी। यह करिश्मा देख पांडव आश्चर्यचकित रह गए और पांडवों ने इसी स्थान पर मंदिर की स्थापना की।