पंजाब में जब आतंकवाद का काला दौर शुरू हुआ था तो उसका प्रभाव चौक चौराहों पर आयोजित होने वाले जागरण पर भी पड़ा। 1990 तक पंजाब में जागरणों की संख्या में भारी कमी आ गई थी। हर शनिवार की रात अमृतसर में होने वाले जागरणों में चंचल की आवाज सुनाई नहीं देती थी। चंचल पहले भजन गायक थे जिन्होंने नववर्ष की पूर्व संध्या पर माता वैष्णो देवी के दरबार में जागरण करने की परंपरा शुरू की थी। यह आज भी जारी है।
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नरेंद्र चंचल।
- फोटो : फाइल फोटो
नरेंद्र चंचल ने माता चिंतपूर्णी, मां कांगड़े वाली और माता ज्वाला देवी में जागरण कर उनका वीडियो बनाकर श्रद्धालुओं को इन शक्तिपीठों के बारे में जानकारी प्रदान की। एक इंटरव्यू में नरेंद्र चंचल ने बताया था कि उनके पिता चैत राम को जब इस बात की भनक लगी कि बेटा संगीत में रुचि रखता है तो शाम के समय घर से निकलना बंद करवा दिया था। इस कारण वह चंडीगढ़ संगीत की शिक्षा नहीं ले सके।
उन्होंने अमृतसर के ही एक शास्त्री संगीतकार प्रेमनाथ त्रिखा से संगीत की शिक्षा प्राप्त की। उनकी मां कैलाशवती की प्रेरणा से घर में जोत जगा कर मां की भेंट गाने का जो सिलसिला शुरू किया था वह अंतिम सांस तक जारी रहा। नरेंद्र चंचल ने माता की भेंट गाने की कला अपनी मां से विरासत में मिली। उनकी मां शक्ति नगर के नजदीक स्थित काली मंदिर में भेंट गाने के लिए जाती तो वह चंचल को भी भेंट गाने को कहती थी।
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नरेंद्र चंचल
- फोटो : फाइल फोटो
नरेंद्र को भेंट गाने से कोई लगाव नहीं था, वह बस मंदिर में शरारत करते रहते। मंदिर के पुजारी ने नरेंद्र की मां से कहा कि देखो, आपका बेटा कितना चंचल है। बेटे को भेंट गाने की प्रेरणा देने के लिए कैलाशवती उन्हें रामायण की कहानियां सुनती थी, जिसका नरेंद्र के बालमन में गहरा प्रभाव पड़ा। कुछ साल बाद जब नरेंद्र मंदिर में भेंट गाने लगे तो पुजारी ने उन्हें चंचल का नाम दिया था।
एक इंटरव्यू में चंचल की पत्नी ने बताया था कि जब उनकी शादी चंचल के साथ तय हुई तो उनकी सहेलियां ताना मरती थी कि उसने एक भेंट गाने वाले को चुना है। वह देर रात तक घर नहीं आता। जागरण करता है। इस पर नम्रता अपनी सहेलियों को कहती थी कि वह भेंटें ही गाते हैं, कोई माहिया (पंजाबी लोक परंपरा के साथ जुड़ा गीत) तो नहीं गाते। भेंट गाकर वह मां भगवती को ही याद करते हैं।