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मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी...7 बेमिसाल कहानियां
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Mon, 15 May 2017 09:21 AM IST
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मदर्स डे
मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी। लबों पे उसके बद्दुआ नहीं होती, एक मां ही है जो खफा नहीं होती। ये मां चंडीगढ़ में ईंटों के एक भट्ठे पर काम करती है और वहां पर बच्चों को साथ लेकर आती है।
शनिवार को भी वह हर रोज की तरह काम पर आई। खेलते खेलते उसके एक बच्चे को चोट लग गई तो वह काम छोड़कर दौड़ी आई और बच्चे को गोद में उठा लिया। उसने एक साथ दोनों बच्चों को उठाया। उसके बाद वह बच्चे के साथ खेलती नजर आई, वाकई नजारा दिल छू लेने वाला था।
फोटोग्राफर ने जब उससे कड़ी धूप में बच्चों को साथ लेकर आने के बारे में पूछा तो वह बोली कि घर पर कौन उनकी देख रेख करेगा। आंखों के सामने रहते हैं तो सुकून भी रहता है।
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शनिवार को भी वह हर रोज की तरह काम पर आई। खेलते खेलते उसके एक बच्चे को चोट लग गई तो वह काम छोड़कर दौड़ी आई और बच्चे को गोद में उठा लिया। उसने एक साथ दोनों बच्चों को उठाया। उसके बाद वह बच्चे के साथ खेलती नजर आई, वाकई नजारा दिल छू लेने वाला था।
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फोटोग्राफर ने जब उससे कड़ी धूप में बच्चों को साथ लेकर आने के बारे में पूछा तो वह बोली कि घर पर कौन उनकी देख रेख करेगा। आंखों के सामने रहते हैं तो सुकून भी रहता है।
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बेटी को आईएएस बनाने के लिए मां ने छोड़ी थी नौकरी
मदर्स डे
आईएएस तपस्या राघव के आईएएस बनने के पीछे उनकी मां लता राघव मेहनत और समर्पण है। तपस्या के पिता यूबी सिंह राघव इंडियन रैवेन्यू सर्विस में तैनात थे, जबकि मां लता राघव सरकारी स्कूल में टीचर। उनके पिता की बार-बार पोस्टिंग होती थी, इससे तपस्या की पढ़ाई काफी प्रभावित हो रही थी। जबकि पिता चाहते थे कि तपस्या की पढ़ाई-लिखाई में कोई बाधा न आए।
इसलिए उनकी मां ने अपनी नौकरी छोड़ दी और तपस्या की पढ़ाई में मदद करने लगी। तपस्या ने पहले डॉक्टर की पढ़ाई की और फिर आईएएस की। लता राघव ने बताया कि दिल्ली की भागदौड़ जिंदगी और कंपीटीशन युग में वे अपनी बेटी के साथ हमेशा एक दोस्त की तरह खड़ी रहीं। तपस्या ने बताया कि जब देर रात उनका ट्यूशन छूटता तो उनकी मां ही उन्हें लेने आती थी।
सुबह पढ़ने के लिए उठाना, घर के कामकाज बिलकुल न करने देना, जो भी खाना होता था, वो कुछ ही मिनट में तैयार मिलता था। जब भी मुझे कोई मुश्किल आती थी, तो एक दोस्त के रूप में उनसे साझा करती थीं। तपस्या चंडीगढ़ में एसडीएम ईस्ट के पद पर तैनात हैं।
इसलिए उनकी मां ने अपनी नौकरी छोड़ दी और तपस्या की पढ़ाई में मदद करने लगी। तपस्या ने पहले डॉक्टर की पढ़ाई की और फिर आईएएस की। लता राघव ने बताया कि दिल्ली की भागदौड़ जिंदगी और कंपीटीशन युग में वे अपनी बेटी के साथ हमेशा एक दोस्त की तरह खड़ी रहीं। तपस्या ने बताया कि जब देर रात उनका ट्यूशन छूटता तो उनकी मां ही उन्हें लेने आती थी।
सुबह पढ़ने के लिए उठाना, घर के कामकाज बिलकुल न करने देना, जो भी खाना होता था, वो कुछ ही मिनट में तैयार मिलता था। जब भी मुझे कोई मुश्किल आती थी, तो एक दोस्त के रूप में उनसे साझा करती थीं। तपस्या चंडीगढ़ में एसडीएम ईस्ट के पद पर तैनात हैं।
सिलाई-कढ़ाई कर बेटे को इंजीनियर बनाया
मदर्स डे
एक मां की जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उसने हार नहीं मानी। सेक्टर-22 निवासी लक्ष्मी की जिंदगी का सबसे बुरा दौर तब आया, जब उनके पति की मौत हो गई। यह बात साल 1995 की है। सिर पर घर का खर्च, साथ ही 3 बच्चों की जिम्मेदारी। मानो जीवन के इस दौर में जिंदगी ठहर सी गई हो। लक्ष्मी अंदर से काफी टूट चुकी थी। आर्थिक हालात भी ठीक नहीं थे।
फिर हिम्मत करके घर पर ही सिलाई-कढ़ाई का काम शुरू किया। सिलाई कर चार पैसे कमा घर का खर्च चलाने के साथ ही तीनों बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। बड़े बेटे सुरिंदर को बीए के बाद आईटी हार्डवेयर का डिप्लोमा करवाया। छोटे बेटे विनोद को होटल मैंनेजमेंट की पढ़ाई करवाई। बेटी इंदू को भी पढ़ाया और 2007 में सिलाई से पैसे जमा कर उसकी शादी करवा दी।
लक्ष्मी बताती हैं कि वे सुबह 9 से रात 10 बजे तक सिलाई के साथ घर का काम भी करतीं हैं। बड़ा बेटा सुरेंद्र टेक्सपोर्ट इंजीनियर है। एक कंपनी में, दूसरा बेटा विनोद होटल मैनेजमेंट का कोर्स करने के बाद बेरीन चला गया। दोनों बेटों को नौकरी मिलने के बाद भी लक्ष्मी अपना काम छोड़ना नहीं चाहती। उनका कहना है कि जब तक उनके हाथ चलेंगे तब तक उनकी सिलाई मशीन चलती रहेगी।
फिर हिम्मत करके घर पर ही सिलाई-कढ़ाई का काम शुरू किया। सिलाई कर चार पैसे कमा घर का खर्च चलाने के साथ ही तीनों बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। बड़े बेटे सुरिंदर को बीए के बाद आईटी हार्डवेयर का डिप्लोमा करवाया। छोटे बेटे विनोद को होटल मैंनेजमेंट की पढ़ाई करवाई। बेटी इंदू को भी पढ़ाया और 2007 में सिलाई से पैसे जमा कर उसकी शादी करवा दी।
लक्ष्मी बताती हैं कि वे सुबह 9 से रात 10 बजे तक सिलाई के साथ घर का काम भी करतीं हैं। बड़ा बेटा सुरेंद्र टेक्सपोर्ट इंजीनियर है। एक कंपनी में, दूसरा बेटा विनोद होटल मैनेजमेंट का कोर्स करने के बाद बेरीन चला गया। दोनों बेटों को नौकरी मिलने के बाद भी लक्ष्मी अपना काम छोड़ना नहीं चाहती। उनका कहना है कि जब तक उनके हाथ चलेंगे तब तक उनकी सिलाई मशीन चलती रहेगी।
मां थी शूटर, बेटी को भी बनाया इंटरनेशनल शूटर
मदर्स डे
हर मां का सपना होता है कि वह अपने बच्चों को बुलंदियों तक पहुंचाए। सेक्टर सात में रहने वाली शुभ मोदगिल इंटर यूनिवर्सिटी स्तर की शूटर रही हैं। उनकी इच्छा थी कि उनके बच्चे भी इसी क्षेत्र में जाएं और उनका नाम रोशन करें। इसके लिए उन्होंने काफी मेहनत की। आखिर उनकी मेहनत रंग लाई।
बेटी अंजुम मोदगिल पहले नेशनल लेवल की शूटर बनी। फिर इंटरनेशनल लेवल की। सेक्टर आठ के सरकारी स्कूल में कार्यरत शुभ ने बताया कि साल 2000 में गवर्नमेंट जॉब में टीचर की नौकरी मिली। इनकी एक बेटा और एक बेटी हैं। एक बार स्कूल की छुट्टियों में वह सेक्टर 25 स्थित शूटिंग रेंज में अपनी बेटी अंजुम को लेकर गईं।
बेटी का लगाव देखकर उन्हें शूटिंग में डालने की ठान ली। इसके बाद वह अपनी बेटी को छुट्टियों में रेंज लेकर जाती और उसे शूटिंग के गुर भी साथ साथ सिखाती गई। जल्द अंजुम अपने मां के नक्शे कदम पर चल पड़ी। अंजुम आज भारतीय शूटिंग टीम की एक अहम सदस्य हैं और विदेशों में खेले जा रहे इंटरनेशनल शूटिंग कंपीटीशन में कई मेडल जीत चुकी हैं।
बेटी अंजुम मोदगिल पहले नेशनल लेवल की शूटर बनी। फिर इंटरनेशनल लेवल की। सेक्टर आठ के सरकारी स्कूल में कार्यरत शुभ ने बताया कि साल 2000 में गवर्नमेंट जॉब में टीचर की नौकरी मिली। इनकी एक बेटा और एक बेटी हैं। एक बार स्कूल की छुट्टियों में वह सेक्टर 25 स्थित शूटिंग रेंज में अपनी बेटी अंजुम को लेकर गईं।
बेटी का लगाव देखकर उन्हें शूटिंग में डालने की ठान ली। इसके बाद वह अपनी बेटी को छुट्टियों में रेंज लेकर जाती और उसे शूटिंग के गुर भी साथ साथ सिखाती गई। जल्द अंजुम अपने मां के नक्शे कदम पर चल पड़ी। अंजुम आज भारतीय शूटिंग टीम की एक अहम सदस्य हैं और विदेशों में खेले जा रहे इंटरनेशनल शूटिंग कंपीटीशन में कई मेडल जीत चुकी हैं।
मां के बलबूते बनी अफसर
मदर्स डे
पंचकूला के गांव नाडा साहिब निवासी 27 वर्षीय रोजी अंबाला के साहा में बीडीओ के पद पर तैनात हैं। वह कहती हैं कि आज जो कुछ भी हैं, वह अपनी मां के बलबूते पर हैं। रोजी कहती हैं कि 15 साल पहले जब बरसात के दिनों में गांव के नहर में पानी भर जाता था और बहते पानी के बीच से होते हुए मां हमें गोद में उठाकर स्कूल छोड़ने जाती थीं। कई दिनों तक गांव में बिजली नहीं आती तो मां लालटेन के उजाले में हमे पढ़ाती थीं, तभी तो मैं आज अपनी मां की अफसर बिटिया बन पाई हूं।
रोज़ी ने बताया कि 2012 में एचसीएस के लिए तैयारी शुरू की। 2014 में एचसीएच एलाइड का प्री एक्जामिनेशन हुआ। उसके बाद एक साल तक रिजल्ट नहीं आया। इस दौरान रोज़ी पीएचडी भी कर रहीं थीं। उन्होंने बताया कि इस बीच में कई बार हौसला डगमगाया। कई बार तो इच्छा हुआ कि शिक्षिका बन जाऊं। लेकिन हर बार की तरह मां आगे आई और उन्होंने हौसला बढ़ाया और कहती कि अब आगे बढ़ना है। पीछे नहीं मुड़ना। 2016 में ही साक्षात्कार हुआ और 16 जनवरी 2017 में सेलेक्शन।
रोजी की मां ने बताया कि वह खुद दसवीं तक पढ़ी हैं। वे चाहती थीं कि उनकी बेटी उनसे ज्यादा पढ़े और अफसर बनकर पीड़ितों की मदद करे। अफसर बनने के बाद भी रोजी आईएएस की तैयारी कर रही हैं। दफ्तर से लौटने के बाद वह पढ़ाई करती हैं। उन्होंने बताया कि मां उन्हें बिस्तर पर ही खाना देती हैं ताकि उनका समय बचे और वह पढ़ाई कर सकें। रोज़ी बताती है कि बचपन में मां ने उन्हें खाना पकाना भी सिखाया है। वह अच्छे से कुकिंग भी कर लेती हैं। गृह कार्य में भी वह पूरी तरह से निपुण हैं।
रोज़ी ने बताया कि 2012 में एचसीएस के लिए तैयारी शुरू की। 2014 में एचसीएच एलाइड का प्री एक्जामिनेशन हुआ। उसके बाद एक साल तक रिजल्ट नहीं आया। इस दौरान रोज़ी पीएचडी भी कर रहीं थीं। उन्होंने बताया कि इस बीच में कई बार हौसला डगमगाया। कई बार तो इच्छा हुआ कि शिक्षिका बन जाऊं। लेकिन हर बार की तरह मां आगे आई और उन्होंने हौसला बढ़ाया और कहती कि अब आगे बढ़ना है। पीछे नहीं मुड़ना। 2016 में ही साक्षात्कार हुआ और 16 जनवरी 2017 में सेलेक्शन।
रोजी की मां ने बताया कि वह खुद दसवीं तक पढ़ी हैं। वे चाहती थीं कि उनकी बेटी उनसे ज्यादा पढ़े और अफसर बनकर पीड़ितों की मदद करे। अफसर बनने के बाद भी रोजी आईएएस की तैयारी कर रही हैं। दफ्तर से लौटने के बाद वह पढ़ाई करती हैं। उन्होंने बताया कि मां उन्हें बिस्तर पर ही खाना देती हैं ताकि उनका समय बचे और वह पढ़ाई कर सकें। रोज़ी बताती है कि बचपन में मां ने उन्हें खाना पकाना भी सिखाया है। वह अच्छे से कुकिंग भी कर लेती हैं। गृह कार्य में भी वह पूरी तरह से निपुण हैं।
प्रिंसिपल मां व बेटी ने शहर को दिलाई नई पहचान
मदर्स डे
शहर की एक मां बेटी ने अपने शहर की शान में एक और तगमा जड़ दिया है। दोनों ने हैदराबाद में हुए वर्ल्ड लार्जस्ट ताईक्वांडो डिसप्ले में एक साथ हिस्सा लिया। साथ ही 991 प्रतिभागियों के साथ अपना टैलेंट दिखाया। यह रिकॉर्ड अब गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल हो गया है। जो कि अपने आप में एक मिसाल है। दोनों को इस संबंधी संस्था की तरफ से सर्टिफिकेट तक मिल गए हैं। सेंट पॉल स्कूल की प्रिंसिपल नीतू दांडी और उनकी बेटी आर्यका ने हैदराबाद में कांटेस्ट में एक साथ हिस्सा लिया था।
उक्त कांटेस्ट में हिस्सा लेने वाली मां बेटी वह अकेली थी। उनकी बेटी चंडीगढ़ के सेक्टर-32 स्थित एसडी स्कूल में सांतवीं कक्षा की छात्रा है। जिसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड की टीम ने चैक किया। साथ ही इस संबंधी उन्हें पत्र भेजा है। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के अधिकारियों के अधिकारियों ने कहा कि आप उन पांच फीसदी लोगों में से एक है। जो कि इस तरह के रिकॉर्ड कायम कर पाते हैं। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में चालीस हजार वर्ल्ड रिकॉर्ड है। वहीं, दोनों को गिनीज बुक ने अमेजिंग, यूनिक परसनेलिटी ऑफ द वर्ल्ड कहा है।
इसके अलावा नारी सशक्तिकरण का भी उनको अग्रणी माना गया है। जिक्त्रस्योग है कि नीतू दांडी को करीब 18 साल का टीचिंग एक्सपीरियंस है। इसके अलावा इनोवेटिव राइटर, क्त्रिस्येटिव कवि, मोटिवेशनल स्पोकपर्सन भी है। साथ ही वह मैनेजमेंट के क्षेत्र में माहिर है। वह फिजीक ल एजुकेशन पर एक किताब तक लिख चुकी है। साथ ही कई अन्य प्रोजेक्टों पर काम कर रही है। उनकी सफलता का एक ही राज है जो भी काम हाथ में पकड़ो उसे पूरी लगन से करो। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति किसी से कम नहीं है। वहीं, उन्होंने कहा कि लड़कियों को आगे बढ़ऩे के मौके दिए जाने चाहिए।
उक्त कांटेस्ट में हिस्सा लेने वाली मां बेटी वह अकेली थी। उनकी बेटी चंडीगढ़ के सेक्टर-32 स्थित एसडी स्कूल में सांतवीं कक्षा की छात्रा है। जिसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड की टीम ने चैक किया। साथ ही इस संबंधी उन्हें पत्र भेजा है। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के अधिकारियों के अधिकारियों ने कहा कि आप उन पांच फीसदी लोगों में से एक है। जो कि इस तरह के रिकॉर्ड कायम कर पाते हैं। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में चालीस हजार वर्ल्ड रिकॉर्ड है। वहीं, दोनों को गिनीज बुक ने अमेजिंग, यूनिक परसनेलिटी ऑफ द वर्ल्ड कहा है।
इसके अलावा नारी सशक्तिकरण का भी उनको अग्रणी माना गया है। जिक्त्रस्योग है कि नीतू दांडी को करीब 18 साल का टीचिंग एक्सपीरियंस है। इसके अलावा इनोवेटिव राइटर, क्त्रिस्येटिव कवि, मोटिवेशनल स्पोकपर्सन भी है। साथ ही वह मैनेजमेंट के क्षेत्र में माहिर है। वह फिजीक ल एजुकेशन पर एक किताब तक लिख चुकी है। साथ ही कई अन्य प्रोजेक्टों पर काम कर रही है। उनकी सफलता का एक ही राज है जो भी काम हाथ में पकड़ो उसे पूरी लगन से करो। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति किसी से कम नहीं है। वहीं, उन्होंने कहा कि लड़कियों को आगे बढ़ऩे के मौके दिए जाने चाहिए।
पति की आखिरी ख्वाहिश पूरी की
मदर्स डे
पीजीआई में गाइनी डिपार्टमेंट की एसोसिएट प्रोफेसर डा. सीमा चोपड़ा के पति उस वक्त उनका साथ छोड़ गए, जब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। बेटी के कैरियर की नींव रखी जा रही थी। छोटा बेटा बड़ा हो रहा था। घर के बाहर की सारी जिम्मेदारियां उन पर थीं। डा. सीमा पीजीआई की ओपीडी और इमरजेंसी में इतनी व्यस्त थीं कि उनका कभी इन चीजों से वास्ता नहीं पड़ा था। साल 2011 में उनके पति डा. पुनीत की मौत हो गई। जब पुनीत गए तो सारी जिम्मेदारियां डा. सीमा के कंधों पर आ गईं।
एक बार तो उन्हें लगा कि वे पुनीत की जगह नहीं ले पाएंगी। बच्चों का भविष्य कैसे बनेगा? घर कैसे चलेगा? कई सारी चुनौतियां डा. सीमा के सामने थीं। सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह थी कि पुनीत चाहते थे कि उनके बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर न छूटे। बुरे वक्त में हर किसी का हौसला टूट जाता है, लेकिन डा. सीमा के कदम बिलकुल भी नहीं डगमगाए। उन्होंने बच्चों के भविष्य के लिए दिन रात एक कर दिया। दोनों बच्चों को पढ़ाई का माहौल दिया। अब बेटी डॉक्टर की पढ़ाई कर रही है। छोटा बेटा अभी 11वीं में है।
डा. सीमा ने बताया कि पीजीआई में रहते बच्चों के लिए वक्त निकाल पाना काफी मुश्किल होता था। गाइनी में तो कई बार रात में आना पड़ता है, लेकिन इस संघर्ष में पीजीआई के स्टाफ ने पूरा साथ दिया। पड़ोसियों ने बहुत सहयोग किया। उन्होंने बताया कि जब उनके पति जिंदा थे, तब उन्हें कोई भी काम नहीं करना पड़ता था। घर से पीजीआई। पीजीआई से घर। वे अब पूरे विश्वास से कहती हैं कि काम कभी भी नहीं रुकते। मुश्किलें आती हैं, लेकिन समय के साथ वे ठीक हो जाती हैं। हालांकि डा. पुनीत की कमी अब भी उन्हें काफी खलती है।
एक बार तो उन्हें लगा कि वे पुनीत की जगह नहीं ले पाएंगी। बच्चों का भविष्य कैसे बनेगा? घर कैसे चलेगा? कई सारी चुनौतियां डा. सीमा के सामने थीं। सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह थी कि पुनीत चाहते थे कि उनके बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर न छूटे। बुरे वक्त में हर किसी का हौसला टूट जाता है, लेकिन डा. सीमा के कदम बिलकुल भी नहीं डगमगाए। उन्होंने बच्चों के भविष्य के लिए दिन रात एक कर दिया। दोनों बच्चों को पढ़ाई का माहौल दिया। अब बेटी डॉक्टर की पढ़ाई कर रही है। छोटा बेटा अभी 11वीं में है।
डा. सीमा ने बताया कि पीजीआई में रहते बच्चों के लिए वक्त निकाल पाना काफी मुश्किल होता था। गाइनी में तो कई बार रात में आना पड़ता है, लेकिन इस संघर्ष में पीजीआई के स्टाफ ने पूरा साथ दिया। पड़ोसियों ने बहुत सहयोग किया। उन्होंने बताया कि जब उनके पति जिंदा थे, तब उन्हें कोई भी काम नहीं करना पड़ता था। घर से पीजीआई। पीजीआई से घर। वे अब पूरे विश्वास से कहती हैं कि काम कभी भी नहीं रुकते। मुश्किलें आती हैं, लेकिन समय के साथ वे ठीक हो जाती हैं। हालांकि डा. पुनीत की कमी अब भी उन्हें काफी खलती है।
ऑटो चला बच्चों की कर रही परवरिश
मदर्स डे
मोहाली के फेज-11 निवासी बलजिंदर कौर के संघर्ष का सफर उस दिन शुरू हो गया था जब शादी के कुछ समय बाद ही उन्हें अपने पति से अलग होना पड़ा था। उस समय उनका बेटा चार महीने का था। पिता के घर आईं तो वहां भी कोई कमाने वाला नहीं था।
पिता खुद अपाहिज थे व भाई का कुछ साल पहले निधन हो गया था। उन्होंने सिलाई का काम शुरू किया, लेकिन इससे वह इतना नहीं कमा पाती थीं जिससे घर चल सके। उन्होंने एक दिन तय कर लिया कि वह अपने भाई का आटोरिक्शा चलाएंगी कुछ घर पर बेकार खड़ा था।
पांचवीं कक्षा पास बलजिंदर मोहाली की पहली महिला आटोरिक्शा चालक हैं। वह अपने बेटे का पालन पोषण तो कर ही रही हैं, अपने माता-पिता की भी देखभाल कर रही हैं। बलजिंदर का उद्देश्य अब अपने बेटे को पुलिस में भर्ती कराना है।
पिता खुद अपाहिज थे व भाई का कुछ साल पहले निधन हो गया था। उन्होंने सिलाई का काम शुरू किया, लेकिन इससे वह इतना नहीं कमा पाती थीं जिससे घर चल सके। उन्होंने एक दिन तय कर लिया कि वह अपने भाई का आटोरिक्शा चलाएंगी कुछ घर पर बेकार खड़ा था।
पांचवीं कक्षा पास बलजिंदर मोहाली की पहली महिला आटोरिक्शा चालक हैं। वह अपने बेटे का पालन पोषण तो कर ही रही हैं, अपने माता-पिता की भी देखभाल कर रही हैं। बलजिंदर का उद्देश्य अब अपने बेटे को पुलिस में भर्ती कराना है।