सड़क पर बिताई जिंदगी, जीता गोल्ड...और अब ओलंपिक
2016 में रियो ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाले देश के पहले एथलीट इंद्रजीत की शुरुआती जिंदगी आसान नहीं रही। देखिए, इंद्रजीत सिंह की संघर्ष भरी दास्तां।
सड़क पर बिताई जिंदगी, जीता गोल्ड...और अब ओलंपिक
मूलरूप से पंजाब के होशियारपुर के रहने वाले 27 वर्षीय इंद्रजीत सिंह जब 10वीं में थे तो पिता की असमय मौत हो गई। परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। किराए पर कमरा लेने के लिए पैसे नहीं थे। हालांकि पिता की जगह उनके बड़े भाई जसविंद्र उर्फ सोनू को नौकरी मिल गई। मुश्किलें कम नहीं हुईं।
सड़क पर बिताई जिंदगी, जीता गोल्ड...और अब ओलंपिक
इंद्रजीत ने जैसे-तैसे अपनी प्रैक्टिस जारी रखी। इंद्रजीत कहते हैं कि अपनी ट्रेनिंग के लिए पिछले कई सालों में मैंने दो दुकानें बेच दीं और कई लोगों से कर्ज भी लिया हुआ था। करीब 10 साल पहले इंद्रजीत केरल में एक प्रतियोगिता में भाग ले रहे थे। एथलेटिक्स कोच शक्ति सिंह ने इंद्रजीत को गोला फेंकते देखा। वह इंद्रजीत से बहुत प्रभावित हुए।
सड़क पर बिताई जिंदगी, जीता गोल्ड...और अब ओलंपिक
कोच शक्ति सिंह ने इंद्रजीत को भिवानी बुला लिया। कोच ने अपने एक परिचित के गोदाम में उनके रहने का इंतजाम कराया। करीब तीन वर्ष तक इंद्रजीत उसी गोदाम में रहकर गोला फेंकना सीखा। इंद्रजीत बताते हैं कि मैं एशियन गेम्स में गोल्ड जीतने के लिए तैयार था, लेकिन परिस्थितियां मुश्किल थीं। ठंड पड़ने के साथ-साथ बारिश भी हो रही थी। मैं अच्छे से वार्मअप भी नहीं कर पाया था।
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बकौल इंद्रजीत, मेरे पास कोई कोच भी नहीं था। ऊपर से दो बैग उठाकर करीब 3 किलोमीटर पैदल चला। मेरे हाथ में ओम प्रकाश का बैग भी था, वे कोई जरूरत की चीज लेने के लिए वापस रूम चले गए थे। उसके बाद स्टेडियम पहुंचा और मैं प्रतिस्पर्धा में ब्रोंज मेडल ही जीत सका। इस पर इंद्रजीत की मां दर्शन कौर कहती हैं कि तो क्या अगर इंद्रजीत ने गोल्ड मेडल नहीं जीता?