हर पल मौत के साए में रहते और फिर खत में मां से झूठ बोल देते कि सब ठीक है जल्द लौटू आऊंगा। कुछ ऐसी होती है सरहद पर डटे जवानों की जिंदगी, भावुक हो जाएंगे किस्से पढ़कर...
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कारगिल विजय दिवस
- फोटो : अमर उजाला
दुनिया के इतिहास में सबसे मुश्किल जंग में शुमार कारगिल की लड़ाई में भारतीय जवान जहां दुश्मन से मोर्चा ले रहे थे, वहीं उनका एक युद्ध अपने भीतर की भावनाओं से भी चल रहा था। जवानों के लिए भावुक पलों से उबरकर दुश्मन से लड़ना बेहद मुश्किल था। इतना ही नहीं, उनके कमांडिंग अफसरों के लिए भी जवानों की इस भावुकता को जोश में बदलना किसी चुनौती से कम नहीं था।
आलम यह था कि मोर्चे पर जाने से पहले जब जवानों को अपने परिजनों खासकर मां व पत्नी से बात करने का मौका मिलता या वे उन्हें खत लिखते तो उसमें वे अपनी कुशलता का अहसास करवाने की कोशिश करते रहते। हर पल मौत के साए में रहने के बावजूद उन्हें बताते कि सब ठीक है और जल्द घर लौटेंगे। सेवानिवृत्त कर्नल सीजे सिंह बताते हैं कि यूं तो युद्ध में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती, लेकिन अकसर भावनाएं जवानों को घेरने की कोशिश करती हैं।
जवानों की इसी भावुकता और भावनाओं को जोश व जीत के जज्बे में बदलना बेहद मुश्किल काम होता है। लेकिन यह काम कैसे करना है, उनके कमांडिंग अफसर बखूबी जानते हैं। कारगिल युद्ध में परमवीर चक्र विजेता संजय कुमार बताते हैं कि चोटियों पर जाने से पहले खत ही परिजनों से अपनी बात कहने का बड़ा माध्यम थे। उन दिनों सेक्टर में एसटीडी बूथों की संख्या बहुत कम थी, इसलिए घरवालों से बात करने के लिए काफी देर कतार में खड़े रहना पड़ता था।
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संजय कुमार ने बताया कि घंटों लाइन में लगने के बाद जब घरवालों से बात हो जाती थी तो जवान नम आंखों के साथ ही बाहर आते थे। क्योंकि सभी जवान युद्धभूमि के असली हालातों को अपने घरवालों से छिपाते थे, ताकि वे उनके लिए चिंतित न हों। बहुत से जवान मां-बाप से बाचतीत करके ही ऑपरेशन पर जाते थे और हंसते हुए एक-दूसरे को कहते थे ‘बात कर लो यारो टाइम आ गया है।’ कई जवानों और अफसरों के लिए ये बातचीत अपने घरवालों से आखिरी बातचीत साबित हुई।