आज ही के दिन (18 नवंबर) 1962 को लद्दाख के रेजांगला में 124 भारतीय जवानों ने 1300 चीनी सैनिकों को मार गिराया था। 124 भारतीय सैनिकों की अदम्य साहस की ये लड़ाई दुनिया की सर्वोत्तम युद्धों में से एक है। भारतीय सैनिकों ने यह युद्ध लद्दाख की दुर्गम बर्फीली चोटियों पर लड़ा था। इनमें अधिकांश वीर सैनिक हरियाणा के रेवाड़ी जिले के रहने वाले थे।
यह युद्ध रेजांग ला के एक दर्रे पर हुआ। जहां से चुशूल की घाटी में प्रवेश मिलता है। यहां 17-18 नवंबर, 1962 को मेजर शैतान सिंह की छोटी सी टुकड़ी मौजूद थी। चीन के मुकाबले भारत के पास सैनिक तो कम थे ही, साथ ही गोला बारूद भी काफी कम संख्या में मौजूद था। लेकिन अगर हौसले की बात करें तो उसमें भारत आगे था। यहां भारतीय जवानों के आगे चीन की बड़ी सेना भी कमजोर पड़ गई थी।
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- फोटो : अमर उजाला
वक्त रात का था, तेज बर्फीले तूफान के बीच सुबह के 3.30 बजे चीनी सैनिक इलाके में घुस चुके थे। सुबह के पांच बजे जब मौसम थोड़ा बेहतर हुआ तब अचानक चीनी सैनिक सामने आ गए। उन्होंने झुंड में आकर हमला करना शुरू कर दिया था। इनका मुकाबला करने के लिए भारतीय सैनिक पूरी तरह तैयार थे। उन्होंने चीनियों पर एलएमली, एलएमजी और मोर्टार से हमला करना शुरू कर दिया।
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चीन के कई सैनिक इस लड़ाई में मारे जा रहे थे, लेकिन खतरा कम नहीं था। एक के बाद एक चीनी टुकड़ी हमले के लिए आगे आ रही थी।वहीं भारतीय सैनिकों की टुकड़ी भी कमजोर होती जा रही थी। भारतीय वीर सैनिकों के पास अब सामने से हमला करने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा। भारतीय सैनिकों ने बाहर आकर चीनी सैनिकों पर बैनट से हमला करना शुरू कर दिया। जिसके बाद चीनी सैनिक बेबस हो गए। आंकड़े बताते हैं कि भारत के 124 जवानों ने चीन के करीब 1300 जवानों को मार गिराया था।
इस युद्ध में तत्कालीन 13 कुमाऊं बटालियन के 124 जवानों में से 114 जवान शहीद गए थे। इन जवानों ने 1300 चीनी सैनिकों को मार गिराया था और करीब तीन हजार सैनिकों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। इस टुकड़ी का नेतृत्व मेजर शैतान सिंह कर रहे थे। वीरता का सम्मान करते हुए कंपनी कमांडर मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। वहीं इसी बटालियन के आठ अन्य जवानों को वीर चक्र, चार को सेना मेडल व एक को मैंशन इन डिस्पेच का सम्मान प्रदान किया गया था।