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हरियाणा: सियासी बिसात पर दिग्गजों में पूरा साल खूब चला शह और मात का खेल, ये रही 2022 की प्रमुख सरगर्मियां

Fri, 30 Dec 2022 06:31 PM IST
भूपेंद्र सिंह सोमदत्त शर्मा, अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
सोमदत्त शर्मा, अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़ Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Fri, 30 Dec 2022 06:31 PM IST
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Important events of Haryana politics in 2022
selja kumari, bhupinder singh hooda, Manohar lal Khattar - फोटो : Social Media

खेल-खिलाड़ियों को लेकर सरगर्म रहने वाली हरियाणा की हवा 2022 में राजनीतिक सरगर्मियों को लेकर गर्म रही। यह गर्मी लाजमी भी थी, क्योंकि 2024 में विधानसभा चुनाव होने हैं। आठ साल से सत्ता में बैठी भाजपा इस चुनाव में गठबंधन से मुक्त होकर फिर अपने दम पर सरकार बनाने को आतुर है। वहीं पिछले दो चुनावों से सत्ता से बाहर कांग्रेस वापसी के लिए संघर्षरत है।



कांग्रेस में जहां हुड्डा खेमे के लगातार विरोध के चलते कुमारी सैलजा को प्रदेशाध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा। वहीं, पार्टी में अहम ओहदा नहीं मिलने पर आदमपुर से विधायक कुलदीप बिश्नोई ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। हुड्डा का राज कांग्रेस में एकछत्र कायम हैं। विरोध होता भी है तो सैलजा और किरण खुलकर नहीं करते। इनेलो और जजपा का साल 2022 आरोप-प्रत्यारोप के बीच गुजर गया। 

चाचा अभय सिंह ने घोटालों को लेकर भतीजों को घेरा तो भतीजे ने भी पलटवार कर तीखे जवाब दिए। भाजपा की अंदरूनी फूट किसी को दिखी नहीं क्योंकि गृह मंत्री अनिल विज अनुशासन के दायरे में रहकर अपनी बात कहते रहे। बॉन्ड पॉलिसी को लेकर सीएम और विज के विचार भले ही अलग रहे हों, लेकिन अंतत: मुख्यमंत्री की बात ही ऊपर रही और बॉन्ड पॉलिसी लागू हो गई।

मनोहर लाल: प्रयोगों के महारथी

Important events of Haryana politics in 2022
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल। - फोटो : @mlkhattar

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने इस साल एक काम बिल्कुल अलग किया। उन्होंने हरियाणा में महापुरुषों की जयंती मनाने के जो कार्यक्रम शुरू किए हैं। इससे उन्हें विभिन्न समाज के लोगों के बीच जाने का मौका मिला। इस कड़ी में शुरुआत सिख समाज को जोड़ने के लिए हुई। मुख्यमंत्री ने सबसे पहले पानीपत में गुरु तेगबहादुर का 400 साला प्रकाश पर्व मनाया और किसान आंदोलन से नाराज चल रहे सिख समुदाय को साधने का प्रयास किया।

करनाल में ब्राहमण सम्मेलन आयोजित कर प्रदेश के ब्राहम्णों को साधने का काम किया। हाल ही में हिसार में सैनी समाज से जुड़े महाराजा शूरसेन की जयंती मनाई। नए प्रयोगों के लिए जाने जाने वाले मनोहर लाल ने जहां परिवहन विभाग में पुलिस के अधिकारी लगाए तो प्रमोटी एचसीएस को डीसी लगाने में कोताही नहीं की। साल के अंत में एक प्रयोग और किया जिसको लेकर खासी चर्चा है। विभागों के मर्जर का जो फैसला सीएम ने लिया है इसका नया खाका नए साल में नजर आएगा।

हुड्डा-सैलजाः तू डाल-डाल मैं पात-पात

Important events of Haryana politics in 2022
भूपेंद्र हुड्डा-शैलजा कुमारी - फोटो : सोशल मीडिया

कांग्रेस पार्टी की बात करें तो कुमारी सैलजा और नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा पूरे साल आमने-सामने रहे। दोनों ने एक दूसरे पर निशाना साधने को कोई मौका नहीं छोड़ा। आदमपुर उपचुनाव में प्रत्याशी चयन और हार को लेकर भी सैलजा ने हुड्डा को कई बार कठघरे में खड़ा किया। हुड्डा खेमे से विवाद के चलते अप्रैल में कुमारी सैलजा ने प्रदेशाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद हुड्डा के खासमखास चौधरी उदयभान को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी गई। अब राहुल गांधी की रैली में हुड्डा और सैलजा साथ-साथ हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव तक दोनों नेता कितने कदम साथ चलेंगे यह देखना होगा। इस बार टिकट वितरण में हुडडा खेमा पूरा काबिज रहने की कोशिश करेगा। ऐसे में सैलजा कितने करीबियों को टिकट दिलवाने में सक्षम होंगी, 2024 इसका साक्षी होगा।

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कुलदीप: भये भाजपाई

Important events of Haryana politics in 2022
सीएम मनोहर लाल से मिले कुलदीप बिश्नोई व भव्य बिश्नोई। - फोटो : सोशल मीडिया

कांग्रेस पार्टी में अहम ओहदा नहीं मिलने से नाराज आदमपुर कुलदीप बिश्नोई ने अगस्त में कांग्रेस छोड़ विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में बिश्नोई ने भाजपा का दामन थाम लिया था। बिश्नोई भी नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा के धुर विरोधी रहे हैं। बिश्नोई लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि कांग्रेस अब बाप-बेटे की पार्टी बनकर रह गई है। बाद में कुलदीप के बेटे भव्य बिश्नोई को आदमपुर से भाजपा का प्रत्याशी बनाया गया और उन्होने जीत दर्ज की।

अब भाजपा में एंट्री के बाद कुलदीप बिश्नोई लेाकसभा चुनाव में राजस्थान से टिकट लेने में सक्षम होंगे या नहीं यह फैसला २०२४ में होगा। फिलहाल भाजपा उनका पूरा उपयोग राजस्थान की सियासत में करेगी, क्योंकि राजस्थान की कई सीटों पर बिश्नोई समाज निर्णायक स्थिति में है और भजनलाल परिवार का राजस्थान से जुड़ाव भी रहा है।

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माकनः जीती बाजी हारे

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अजय माकन - फोटो : amar ujala

जून माह में हुए राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता अजय माकन को अपनों की वजह से हार का सामना करना पड़ा। हालांकि यह हार पार्टी में रहस्य बनकर रह गई। भाजपा समर्थित कार्तिकेय शर्मा ने माकन को एक वोट से हरा दिया। हालांकि, कांग्रेस के पास जीत के लिए पर्याप्त वोट थे, लेकिन कांग्रेस के ही किसी एक विधायक ने गलत निशान लगा दिया, जिससे एक वोट रद्द हो गया और माकन जीती हुई बाजी हार गए।

इसके लिए हुड्डा खेमा और विरोधी खेमा दोनों एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। लेकिन दूध का जला छांछ फूंक-फूंक कर पीता है। रणदीप सुरजेवाला जींद उपचुनाव में इस धड़ेबंदी का शिकार हो चुके थे। इसलिए उन्होंने राज्यसभा में जाने के लिए राजस्थान का रास्ता चुना और उनका निर्णय भी ठीक रहा, क्योंकि माकन की जगह यदि रणदीप होते तो उनका भी यही हश्र होता।

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