देखिए, 1952 से अब तक हरियाणा पंचायत चुनाव की कहानी
भाई! पहले पंचायत होया करती। लोग सरपंचों को मानते भी थे। बैठकों में बुजुर्गों के खंडके दिख्या करते, पर इब तै लुगाइयां का राज आग्या। सुनिए दो दोस्तों की जुबानी, हरियाणा पंचायत चुनाव की कहानी। रिपोर्टः अंकित चौहान, रोहतक
देखिए, 1952 से अब तक हरियाणा पंचायत चुनाव की कहानी
87 साल के करतारा और 82 साल के रिटायर्ड नायब सूबेदार प्यारे लाल की बूढ़ी आंखों को 1952 का पंचायत चुनाव आज भी याद है। सामने खड़े पीपल के पेड़ की ओर इशारा कर बताते हैं कि बेटा, पहला चुनाव इसी पेड़ के नीचे हुआ था। चुनाव भी क्या था। जिस उम्मीदवार के पक्ष में जितने वोटर बैठे, वही सरपंच बन गया और गांव की पहली सरपंची का ताज मेरे दादा रत्न के सिर ही सजा था।
देखिए, 1952 से अब तक हरियाणा पंचायत चुनाव की कहानी
पंचायत चुनाव की पूर्व संध्या पर पोस्टरों से पटे शिमली गांव की बैठक में बैठकर दोनों दोस्तों ने यह कहानी सुनाई। करतारा के दादा गांव के पहले सरपंच थे। दोनों बताते हैं कि पहले एक भी रुपया खर्च नहीं होता था तो अब लाखों रुपया लुटाया जा रहा है।
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दोनों दोस्तों का कहना है कि पहले तो बस गांव से बाहर रह रहे वोटर को गांव तक लाने के लिए उम्मीदवार किराया दे देते थे। हुक्के की कश मारकर करतारा प्यारे लाल की ओर इशारा कर कहते हैं कि पहले पुरुषों की चौधर होती थी, लेकिन अब तो हम केवल देखने वाले रह गए। अब तो घर और पंचायत दोनों जगह महिलाओं का राज आ गया।
देखिए, 1952 से अब तक हरियाणा पंचायत चुनाव की कहानी
शामली गांव का पहला चुनाव करतारा के दादा रतन और हजारी के बीच लड़ा गया। गांव के लोगों को इकट्ठा कर लिया गया और रतन व हजारी को खड़ा कर दिया गया। लोगों को कह दिया गया कि जिसे भी सरपंच बनाना चाहते हो, उसके पीछे खड़े हो जाओ। लोगों ने उन दोनों के पीछे लाइन लगा दी और रतन की लाइन बड़ी होने के कारण उन्हें सरपंची मिल गई।