चीन सीमा पर देश की रक्षा में तैनात आईटीबीपी ने अपने श्वानों का नामकरण किया है। इस बार इन 17 श्वानों को देसी नाम दिए गए हैं। ये सभी नाम लद्दाख के स्थानों पर हैं। इससे पहले इन्हें पश्चिमी नाम दिए जाते थे। किसी का नाम गलवां तो किसी का नाम सासवां और किसी का दौलत और चुंगथांग और चिपचौप रखा गया है। इसके पीछे की वजह जान आप भी आईटीबीपी को सलाम करोगे।
ये श्वान आईटीबीवी के के-9 विंग के हैं। नेशनल ट्रेनिंग सेंटर फॉर डॉग एंड एनीमल और बेसिक ट्रेनिंग सेंटर पंचकूला में इनका नामकरण किया गया। बेल्जियन मेलीनाय ब्रीड के इन श्वानों के लिए ब्रीडिंग पंचकूला में आईटीबीपी के इसी सेंटर में की गई थी। खास तैयारी के बाद इनकी ब्रीडिंग करवाई गई। इनके पिता ‘गाला’ और मां ‘ओलगा’ और ‘ओलिशिया’ हैं जो कि कुछ समय पहले छत्तीगढ़ में तैनात थीं।
नामकरण सेरेमनी के दौरान इन श्वानों के गले में उनके नाम के पट्टे डाले गए और उसके साथ ही तलवार से छुआ गया। तलवार से छूने का अर्थ यह है कि इन्हें अब आईटीबीपी की इकाई में शामिल कर लिया गया है। सभी को नाम डीआईजी वेटनरी आईटीबीपी सुधाकर नटराजन ने दिया है।
उन्होंने बताया कि इन सभी श्वानों के नाम चीन सीमा पर स्थित पोस्ट के नाम पर रखे गए हैं। ये वह पोस्ट हैं जो नौ हजार फीट से 18 हजार फीट की ऊंचाई पर हैं। यहां तैनात आईटीबीपी के जवानों को सम्मान देने के उद्देश्य से के-9 टीम के इन सदस्यों को यह नाम दिए गए हैं।आईटीबीपी के एक अधिकारी ने बताया कि इन श्वानों को अब ट्रेनिंग दी जाएगी और उसके बाद उनकी तैनाती बड़े होने पर अलग अलग जगह की जाएगी।
बच्चों को आने-ला, गलवां, ससोमा, सिरिजाप, चिप चाप, सासेर, चार्डिंग, रेजांग, दौलत, सुल्तान-चुस्कू, इमिस, रांगो, युला, मुखपरी, चुंग थुंग, खार्दुंगी और श्योक नाम दिया गया है। पहली बार आईटीबीपी ने अपने श्वानों को देसी नाम दिया है। अब तक इन्हें सीजर, ओलगा, एलिजाबेथ, बेट्टी, लीजा जैसे नाम से होते थे। आईटीबीपी ने तय किया है कि आगे श्वानों का नाम कराकोरम दर्रे से जचेप दर्रे तक 3,488 किमी लंबी भारत-चीन सीमा के प्रसिद्ध स्थानों के नाम पर रखा जाएगा।