पिता-चाचा जो न कर पाए उसे दुष्यंत चौटाला ने कर दिखाया, 15 साल बाद परिवार में लौटी ये बड़ी खुशी
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हरियाणा में चौटाला परिवार की चौधर एक बार फिर आ रही है। परदादा ताऊ देवीलाल और दादा ओम प्रकाश चौटाला के बाद पोते दुष्यंत चौटाला जाटों की भी चौधर लाने में सफल रहे हैं। चौटाला परिवार की हरियाणा की सत्ता में 15 साल बाद हिस्सेदारी होगी। ओम प्रकाश चौटाला की सरकार 2000 से 2005 तक प्रदेश में रही, इसके बाद यह परिवार व उनकी पार्टी इनेलो सत्ता से दूर रही।
दिसंबर 2018 में दुष्यंत ने जजपा बनाई व सरकार बनाने की लड़ाई लड़ने में जुट गए। विधानसभा चुनाव में उनकी सीटें तो दस ही आईं, लेकिन वह किंगमेकर बनकर उभरे और अब सरकार में भागीदार भी बन गए हैं। दुष्यंत भी सीएम मनोहर लाल की तरह किस्मत के धनी हैं। जैसे 2014 में मनोहर लाल पहली बार ही जीतकर सीएम बन गए थे, वैसे ही दुष्यत भी उचाना कलां से पहली बार विधायक बनकर उपमुख्यमंत्री बने हैं। दुष्यंत का यह दूसरा विधानसभा चुनाव था, लेकिन जीते पहली ही बार। 2014 में वह इनेलो टिकट पर उचाना कलां से हार गए थे।
उन्हें चौधरी बीरेंद्र की पत्नी प्रेमलता ने हराया था। इस बार जजपा के बैनर तले दुष्यंत उचाना से ही जीते और उन्होंने प्रेमलता को ही हराया है। उपमुख्यमंत्री पद भाजपा की गठबंधन सरकार में पाकर दुष्यंत ने उचाना की चौधर भी कायम कर दी है।उनके दादा ओमप्रकाश चौटाला भी उचाना से चुनाव लड़ते रहे हैं और जब चौधरी बीरेंद्र सिंह कांग्रेस में सीएम बनने की दौड़ में थे तो उन्हें बड़े चौटाला ने ही हराया था।
इसके बाद बीरेंद्र सिंह कांग्रेस में बड़े नेता तो रहे पर सीएम की दौड़ में शामिल नहीं हो पाए। अब दुष्यंत ने उपमुख्यमंत्री बनकर फिर बीरेंद्र परिवार को राजनैतिक झटका दिया है। बीरेंद्र अपने सांसद बेटे को केंद्र में मंत्री बनने के लिए लॉबिंग में जुटे हैं, जो अब शायद ही संभव हो सके। दुष्यंत परदादा ताऊ देवी लाल की नीतियों पर ही आगे बढ़ रहे हैं। ताऊ हरियाणा के मुख्यमंत्री रहने के साथ ही 1989 से 1991 तक उपप्रधानमंत्री रह चुके हैं। उस समय जनता दल की सरकार बनी थी। देवीलाल ने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया था।
अभय और अजय नहीं ला सके चौधर
चौटाला परिवार की चौथी पीढ़ी के नेता दुष्यंत ने वो कर दिखाया है जो उनके पिता अजय चौटाला व चाचा अभय चौटाला नहीं कर पाए। दुष्यंत की लड़ाई प्रदेश में जजपा की सत्ता लाने की है। जिसकी ओर उन्होंने कदम बढ़ा दिए हैं। अभय चौटाला ने दस साल चौटाला परिवार की चौधर लाने की लड़ाई लड़ी मगर सफलता हाथ नहीं लगी।