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केला खाने के शौकीन हैं तो संभल जाएं, बीमारी हो सकती है, देखो कितने बड़े खतरे में हैं आप!
Sat, 23 Jun 2018 05:13 PM IST
अरविंद वाजपेयी, अमर उजाला, चंडीगढ़
अरविंद वाजपेयी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 23 Jun 2018 05:13 PM IST
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banana
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अगर आप केला खाने के शौकीन हैं तो संभल जाएं, वरना कोई बड़ी बीमारी हो सकती है। यकीं नहीं आता तो देखिए कितने बड़े खतरे में हैं आप।
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banana face mask
आप केले खा रहे हैं तो जरा देख लें, क्या वे केमिकल से पके हैं या प्राकृतिक रूप से। ट्राइसिटी में करीब 20 लाख केले केमिकल से पकाकर बेचे जा रहे हैं। केमिकल से पकाने का कारण है कि ये 24 घंटे में पक जाते हैं और इसमें कीमत भी कम लगती है। वहीं, प्राकृतिक रूप से पकाने में इसे 100 घंटे लगते हैं और कास्टिंग भी ज्यादा आती है। हालांकि, जल्द पकाया गया केला कई बीमारियां देकर जाता है।
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banana peel
केमिकल से केले को पकाने पर फिलहाल कोई चेक नहीं है। बेशक ट्राइसिटी में इसको लेकर सीआरपीसी की धारा 133 के अंतर्गत केमिकल द्वारा पकाए गए फलों पर रोकथाम के लिए निर्देश जारी किए हैं, लेकिन चेकिंग अब तक नहीं है। इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट के फेलो और इनोवेटिव फार्मर डा. मुनीष त्यागी ने बताया कि केमिकल वाला केला ही मार्केट में ज्यादा है।
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banana milk combination
इसकी वजह है कि केमिकल से पकाने में केला चौबीस घंटे में पक जाता है और उसमें ज्यादा मेहनत नहीं लगती है। इसे खाने से कई प्रकार की बीमारियों का अंदेशा रहता है। केले का प्रयोग शेक बनाने, बडे़ स्टोर और अन्य स्थानों पर किया जाता है। इसके साथ ही व्यंजन तैयार करने में भी इसका उपयोग होता है। ऐसे में केमिकल से पकाने का प्रोसेस रोकने का इंतजाम किया जाना चाहिए।
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केला और शहद
नेचुरल और केमिकल का अंतर
नेचुरल रूप से पका केला तीन से चार दिन तक खराब नहीं होता है। केमिकल से पका केला 24 घंटे में ही काला पड़ने लगता है। यह एक महत्वपूर्ण पहचान है। इसके अतिरिक्त यदि टीम द्वारा चेकिंग करवाई जाए तो भी इसकी पहचान आसानी से की जा सकती है।
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