अगर आप केला खाने के शौकीन हैं तो संभल जाएं, वरना कोई बड़ी बीमारी हो सकती है। यकीं नहीं आता तो देखिए कितने बड़े खतरे में हैं आप।
आप केले खा रहे हैं तो जरा देख लें, क्या वे केमिकल से पके हैं या प्राकृतिक रूप से। ट्राइसिटी में करीब 20 लाख केले केमिकल से पकाकर बेचे जा रहे हैं। केमिकल से पकाने का कारण है कि ये 24 घंटे में पक जाते हैं और इसमें कीमत भी कम लगती है। वहीं, प्राकृतिक रूप से पकाने में इसे 100 घंटे लगते हैं और कास्टिंग भी ज्यादा आती है। हालांकि, जल्द पकाया गया केला कई बीमारियां देकर जाता है।
केमिकल से केले को पकाने पर फिलहाल कोई चेक नहीं है। बेशक ट्राइसिटी में इसको लेकर सीआरपीसी की धारा 133 के अंतर्गत केमिकल द्वारा पकाए गए फलों पर रोकथाम के लिए निर्देश जारी किए हैं, लेकिन चेकिंग अब तक नहीं है। इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट के फेलो और इनोवेटिव फार्मर डा. मुनीष त्यागी ने बताया कि केमिकल वाला केला ही मार्केट में ज्यादा है।
इसकी वजह है कि केमिकल से पकाने में केला चौबीस घंटे में पक जाता है और उसमें ज्यादा मेहनत नहीं लगती है। इसे खाने से कई प्रकार की बीमारियों का अंदेशा रहता है। केले का प्रयोग शेक बनाने, बडे़ स्टोर और अन्य स्थानों पर किया जाता है। इसके साथ ही व्यंजन तैयार करने में भी इसका उपयोग होता है। ऐसे में केमिकल से पकाने का प्रोसेस रोकने का इंतजाम किया जाना चाहिए।
नेचुरल और केमिकल का अंतर
नेचुरल रूप से पका केला तीन से चार दिन तक खराब नहीं होता है। केमिकल से पका केला 24 घंटे में ही काला पड़ने लगता है। यह एक महत्वपूर्ण पहचान है। इसके अतिरिक्त यदि टीम द्वारा चेकिंग करवाई जाए तो भी इसकी पहचान आसानी से की जा सकती है।