मोहाली के हॉस्टल वीडियो कांड में आरोपियों के फोन सबसे अहम कड़ी हैं क्योंकि इन्हीं में सारे राज कैद हैं। तीनों आरोपियों के फोन फॉरेंसिक लैब भेज दिए गए हैं, जहां सभी की व्हाट्सएप चैट, डिवाइस का डाटा और सोशल मीडिया एप आईडी की जांच की जाएगी। सोमवार को आरोपियों की रिमांड के लिए पुलिस ने अदालत के सामने यह बात रखी।
मोहाली वीडियो कांड: फोन से खुलेगा बड़ा राज, विदेशी कनेक्शन का भी शक, आखिर डिलीट वीडियो किसके?
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आरोपियों को रिमांड पर लेने के लिए पुलिस ने कई और भी तर्क दिए। बताया कि यह अपराध काफी गंभीर श्रेणी का है। इसमें टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हुआ है। आरोपियों से पता लगाया जाना है कि डिलीट वीडियो किसके हैं और वीडियो किस-किस को भेजे गए हैं। इस मामले के तार विदेश से भी जुड़े हो सकते हैं, इसकी भी जांच करनी है। मामले में गिरफ्तार तीनों आरोपियों को पुलिस की टीमों ने सोमवार दोपहर बाद कड़ी सुरक्षा में खरड़ अदालत में पेश किया। आरोपियों की सुरक्षा को देखते हुए पूरे इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया था। पुलिस मुताबिक तीनों आरोपी हिमाचल प्रदेश के शिमला के रहने वाले हैं।
विवि प्रबंधन ने सभी मांगें मानीं, 28 घंटे बाद संघर्ष थमा
हंगामे और प्रदर्शन का दौर 28 घंटे बाद रविवार देर रात डेढ़ बजे थम गया। यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने जिला प्रशासन व पुलिस के सामने विद्यार्थियों की सभी मांगों को पूरा करने का भरोसा दिया। इसके बाद विद्यार्थियों ने संघर्ष विराम कर एलान कर दिया। हालांकि विवि ने स्थिति को देखते हुए छुट्टियों का एलान कर दिया है।
चंडीगढ़ विवि प्रबंधन ने रविवार रात विद्यार्थियों को आश्वासन दिया कि संघर्ष के दौरान छात्रों पर जो लाठीचार्ज हुआ था उसकी जांच होगी। जिन विद्यार्थियों को चोटें आईं हैं, उनके इलाज का खर्च विवि प्रबंधन उठाएगा। विद्यार्थियों ने सभी हॉस्टल के वार्डन को लेकर काफी शिकायत दी थी। इस चीज को ध्यान में रखते हुए यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने सारे हॉस्टल वार्डन को बदलने आश्वासन दिया। इसके अलावा हॉस्टल में विद्यार्थियों को अपनी मर्जी के कपड़े पहनने की भी छूट दे दी गई।
वहीं, लाठीचार्ज के दौरान जिन छात्राओं के फोन टूटे हैं, उनको भी मुआवजा देने पर सहमति बनी है। इसके अलावा हॉस्टल में किसी भी तरह की कोई खामी है तो उनको सुधारा जाएगा। भविष्य में विद्यार्थियों को किसी भी प्रकार की मुश्किल नहीं उठानी पड़ेगी। इस फैसले से विद्यार्थी खुश थे। विद्यार्थियों का कहना है कि यूनिवर्सिटी ने अगर पहले ही इस मामले पर गंभीरता दिखाई होती तो संघर्ष इतना आगे नहीं बढ़ता।