इस बार हिंदुस्तानी पटाखों की धमक के साथ दिवाली का जश्न मनेगा। ऐसा कई सालों के बाद हो रहा है, जब घरेलू पटाखा बाजार से ड्रैगन (चाइनीज पटाखे) एक तरह से आउट है।
चालू सीजन के दौरान लुधियाना के बाजार में 95 फीसदी से अधिक पटाखे मेड इन इंडिया हैं। भारतीय पटाखा निर्माताओं ने चीन को टक्कर देने के तहत आकर्षक पैकिंग के साथ एक से बढ़कर एक पटाखे बाजार में पेश किए हैं। कारोबारियों का कहना है कि पटाखा आयात पर सरकारी सख्ती एवं चाइनीज उत्पादों को लेकर लोगों की बदल रही धारणा के कारण ही विदेशी पटाखों से लोगों का मोह भंग हो रहा है।
साथ ही दिल्ली एनसीआर के बाद अब देश के अन्य हिस्सों में भी पटाखों पर प्रतिबंध को लेकर उठ रही आवाजों से कारोबारी बेहद डरे हुए हैं, क्योंकि उनका करोड़ों रुपये का निवेश कारोबार में हुआ है। लुधियाना होलसेल फायर क्रैकर्स एसोसिएशन के चेयरमैन अशोक थापर का कहना है कि पिछले साल तक मार्केट में करीब पचास फीसदी पटाखा चाइनीज था। इस बार कारोबारियों ने चीन से आयात नहीं किया है।
शिवाकासी में चीन की तर्ज पर सस्ते एवं आकर्षक पटाखों का उत्पादन वाजिब कीमत पर किया जा रहा है। वहां से बच्चों के लिए खास माचिस, रिंग पत्ता, चुटपुट, गारलैंड समेत कई पटाखे आए हैं। पहले बच्चों की गन भी चीन से आती थी, लेकिन इस बार वह भी देश में ही बनी है।
ध्वनि प्रदूषण को देखते हुए कंपनियों ने पटाखों में ब्लास्टिंग के डेसिबल भी कम किए हैं। ब्लास्टिंग पर फोकस की बजाए आतिशबाजी में आसमान में पहुंचकर आतिशबाजी के दौरान कई रंग छोड़ना और हल्के हल्के शॉट बनाना शामिल हैं। इस बार बाजार में सिलेंडर के आकार के पटाखे, कार्टून कैरेक्टर, आईपीएल क्रिकेटर शॉट्स बच्चों पसंद आ रहे हैं। कारोबारी इस बार 28 फीसदी जीएसटी की मार से भी परेशान हैं।