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जब कार्तिकेय ने छोड़ा कैलाश, तब पंजाब को बनाया निवास, पढ़ें- भगवान शिव से जुड़ी ये मान्यता
Sun, 22 Nov 2020 06:44 PM IST
निवेदिता वर्मा
आर. रघुवंशी, संवाद न्यूज एजेंसी, बटाला (पंजाब)
आर. रघुवंशी, संवाद न्यूज एजेंसी, बटाला (पंजाब)
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sun, 22 Nov 2020 06:44 PM IST
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बटाला स्थित अचलेश्वर धाम मंदिर।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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जब भगवान गणेश ने माता-पिता की परिक्रमा कर तीनों लोकों की परिक्रमा को पूरा बता दिया था तो भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय स्वामी नाराज होकर जिस स्थान पर आए थे, वह आज अचलेश्वर धाम के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि कार्तिक माह की नवमी-दशमी को 33 करोड़ देवी-देवता यहां पधारते हैं। जानिए पंजाब के बटाला से सात किलोमीटर दूर स्थित इस धाम की अनूठी कहानी...
अचलेश्वर धाम में भगवान कार्तिकेय स्वामी की मूर्ति।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
मान्यता के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती ने अपने पुत्रों गणेश और कार्तिकेय से कहा कि वे उसी को अपना उत्तराधिकारी बनाएंगे जो तीनों लोकों की परिक्रमा कर पहले कैलाश पर पहुंचेगा। यह सुनकर दोनों यात्रा पर निकल गए। भगवान गणेश को रास्ते में नारद मुनि मिले जिन्होंने कहा कि समस्त लोक तो माता-पिता के चरणों में हैं। ऐसा सुनते ही गणेश कैलाश लौट आए और माता-पिता की परिक्रमा कर उन्हें प्रणाम किया। इस पर भगवान शिव ने अपना उत्तराधिकारी गणेश को बना दिया।
अचलेश्वर धाम।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
जब कार्तिकेय को इस बात का पता चला तो वो नाराज हो गए। वे रूठकर उस स्थान पर पहुंचे जो आज अचलेश्वर धाम के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि उस समय कार्तिकेय को मनाने 33 करोड़ देवी-देवता इसी स्थान पर आए थे लेकिन उन्होंने जाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि अब वह कहीं नहीं जाएंगे और सारा जीवन उसी स्थान पर रहेंगे। इसके बाद भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि इसी स्थान पर हर साल कार्तिक माह की नवमी-दशमी को 33 करोड़ देवी-देवता आएंगे और मंदिर परिसर में बने सरोवर में स्नान करने वालों की मन्नत पूरी होगी।
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बटाला के अचलेश्वर धाम के सामने बना गुरुद्वारा साहिब।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
श्री अचल साहिब गुरुद्वारा साहिब का भी है ऐतिहासिक महत्व
इतिहास के अनुसार बटाला के कस्बा अचल में सिखों के पहले गुरु श्री गुरु नानक देव जी भी पहुंचे थे। यहां उन्होंने सिद्धों, योगियों और नाथों के वरिष्ठ आगू भंगर नाथ से गोष्ठी की। अपने विचारों को उनके सामने रखा। इसके बाद वहां गुरुद्वारा साहिब बना दिया गया। अचलेश्वर धाम मंदिर के बिल्कुल सामने पहली पातशाही श्री गुरुनानक देव जी के चरण स्पर्श प्राप्त स्थान पर बना गुरुद्वारा साहिब सिख समुदाय के लिए काफी अहम है।
इतिहास के अनुसार बटाला के कस्बा अचल में सिखों के पहले गुरु श्री गुरु नानक देव जी भी पहुंचे थे। यहां उन्होंने सिद्धों, योगियों और नाथों के वरिष्ठ आगू भंगर नाथ से गोष्ठी की। अपने विचारों को उनके सामने रखा। इसके बाद वहां गुरुद्वारा साहिब बना दिया गया। अचलेश्वर धाम मंदिर के बिल्कुल सामने पहली पातशाही श्री गुरुनानक देव जी के चरण स्पर्श प्राप्त स्थान पर बना गुरुद्वारा साहिब सिख समुदाय के लिए काफी अहम है।
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अचलेश्वर धाम का पवित्र सरोवर।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
अचलेश्वर धाम में आज और कल होगा मेला
अचलेश्वर धाम में सोमवार और मंगलवार को दो दिवसीय मेला लगेगा। यह मेला नवमी-दशमी के मेले के नाम से भी प्रचलित हैं। इन दोनों दिन में हजारों श्रद्धालु भगवान शिव औैर भगवान कार्तिकेय की पूजा करते हैं। इसके अलावा पवित्र सरोवर में स्नान भी किया जाता है। मंदिर परिसर से बाहर स्टाल लगाकर लंगरों का आयोजन किया जाएगा। जिला प्रशासन ने तहसील बटाला में 23 नवंबर को छुट्टी का एलान भी किया है। श्री अचलेश्वर धाम मंदिर ट्रस्ट के मुख्य संचालक पवन कुमार पम्मा ने बताया कि इस दो दिवसीय मेले को लेकर सभी तैयारियां मुकम्मल कर ली गई हैं। 23 नवंबर की रात को मंदिर परिसर में स्थापित कार्तिकेय हाल में जागरण भी होगा। पंजाब के अलावा दूसरे राज्यों से साधु-संत भी पहुंच गए हैं। मंदिर परिसर को भव्य तरीके से सजाया गया है।
अचलेश्वर धाम में सोमवार और मंगलवार को दो दिवसीय मेला लगेगा। यह मेला नवमी-दशमी के मेले के नाम से भी प्रचलित हैं। इन दोनों दिन में हजारों श्रद्धालु भगवान शिव औैर भगवान कार्तिकेय की पूजा करते हैं। इसके अलावा पवित्र सरोवर में स्नान भी किया जाता है। मंदिर परिसर से बाहर स्टाल लगाकर लंगरों का आयोजन किया जाएगा। जिला प्रशासन ने तहसील बटाला में 23 नवंबर को छुट्टी का एलान भी किया है। श्री अचलेश्वर धाम मंदिर ट्रस्ट के मुख्य संचालक पवन कुमार पम्मा ने बताया कि इस दो दिवसीय मेले को लेकर सभी तैयारियां मुकम्मल कर ली गई हैं। 23 नवंबर की रात को मंदिर परिसर में स्थापित कार्तिकेय हाल में जागरण भी होगा। पंजाब के अलावा दूसरे राज्यों से साधु-संत भी पहुंच गए हैं। मंदिर परिसर को भव्य तरीके से सजाया गया है।