सलीम बावरिया गैंग ने किया था बुलंदशहर हाईवे पर मां-बेटी का रेप!
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उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर हाईवे पर रोड होल्डअप और गैंगरेप की वारदात को अंजाम देने वालों में बावरिया गैंग का नाम सामने आया है। यह गैंग यूपी का नहीं बल्कि राजस्थान का है। सूत्रों का दावा है कि पुलिस और एसटीएफ को भरतपुर के कुख्यात सलीम बावरिया की तलाश है। आगे की स्लाइड में पढ़ें कौन हैं बावरिया समुदाय के लोग।
गैंग के सरगना सलीम का डेरा भरतपुर जिले में है, जहां करीब 20 दिन पहले पूरा गैंग क्राइम करने से पहले इकट्ठा हुआ था।
हाईवे-91 पर हुए गैंगरेप में इसका ही हाथ बताया जा रहा है। बुलंदशहर में सलीम बावरिया गैंग के कई सक्रिय सदस्य और रिश्तेदारियां होने की बात भी पुलिस की जानकारी में आई है। पुलिस के विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो हापुड़ का शावेज बावरिया गैंग का बेहद शातिर और पुराना बदमाश है।
इस गैंग में बुलंदशहर और नोएडा के बदमाश भी हैं
पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के कई जिलों में इस गैंग ने कई संगीन वारदातें की हैं। इन वारदातों में हत्या, गैंगरेप और बर्बरता के साथ की गईं लूटें शामिल हैं। पुलिस सूत्रों को मुताबिक करीब 20 दिन पहले सलीम बावरिया गैंग के 20 से ज्यादा बदमाश भरतपुर डेरे पर इकट्ठा हुए थे।
इस बैठक में शावेज के अलावा बुलंदशहर का रईस और नोएडा का जबर सिंह भी शामिल थे। बुलंदशहर पुलिस ने जिन तीन बदमाशों को शिनाख्त के आधार पर गिरफ्तार करके जेल भेजा है, उनमें जबर सिंह, रईस और शावेज शामिल हैं।
जबर सिंह की बीबी गैंग सरगना सलीम के नजदीकी रिश्तेदार की बेटी है और वह बावरिया जाति की है। जबर सिंह और उसकी पत्नी को पुलिस ने नोएडा के रबूपुरा से गिरफ्तार किया है। पुलिस को जबर सिंह की पत्नी से बावरिया गैंग की गहरी और पुख्ता जानकारियां मिलीं हैं।
जबर सिंह की पत्नी ने पुलिस को यह भी बताया है कि एक बार डेरे से निकलने के बाद वापस डेरे की ओर तभी लौटता है जब चार-पांच महीनों में लूटपाट से भरपूर कमाई कर लेता है।
कौन हैं बावरिया समुदाय के लोग
डाउन टु अर्थ डॉट ओआरजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, बावरिया समुदाय राजस्थान के उन लोगों का समूह है जो पुराने जमाने में जंगलों में शिकार कर जीवन यापन करते थे।
आजादी से पहले बावरिया समुदाय के 70 प्रतिशत लोग जंगली जानवरों का शिकार कर गुजर बसर करते थे। पांच प्रतिशत लोग मजदूरी करते थे और 15 फीसदी लो कृषि पर आश्रित थे, जबकि 10 फीसदी लोग चौकीदारी करते थे।
बदलते समय और जंगलों के भारी कटान से बावरिया समुदाय के जीवन पर भी असर पड़ा। अब वर्तमान में 80 फीसदी बावरिया परिवारों का चौकीदारी मुख्य पेशा है। समुदाय के पांच प्रतिशत लोग कृषि आधारित जीवन जीते हैं जबकि 15 फीसदी लोग मजदूरी करते हैं।
इस समुदाय के कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था जबकि कुछ अभी भी हिंदू हैं।