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Mandsaur: एक छोटे से कमरे को कश्मीर बनाकर शुरू की केसर की खेती, इंडोर फॉर्मिग के जरिए की अनूठी शुरुआत

Wed, 01 Nov 2023 11:12 AM IST
अंकिता विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मंदसौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मंदसौर Published by: अंकिता विश्वकर्मा Updated Wed, 01 Nov 2023 11:12 AM IST
सार

डॉ. राठौर कहते हैं कि केसर की खेती के प्राकृतिक वातावरण की ज्यादा आवश्यकता होती है, जरा सा भी मौसम अनुकूल ना हो तो खेती खराब हो जाती है जैसे ही फूल आने लगते है उस वक्त यदि बारिश हो जाऐ तो फसल जल जाती है और यदि ज्यादा धूप मिल जाऐ तो भी फसल खराब हो जाती है।

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Mandsaur: Started saffron cultivation by a unique beginning through indoor
केसर की खेती करने वाले राठौर दंपती - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दुनिया में आपूर्ति का 95 फीसदी केसर उत्पादन करने वाला देश ईरान, लेकिन गुणवत्ता में कश्मीर किसी से कम नहीं है, परन्तु अब भगवान पशुपतिनाथ की नगरी मंदसौर का नाम भी इसमें जुड़ने वाला है। मंदसौर के युवा डॉ कुणाल राठौर दंपती ने अब मंदसौर में इंडोर फार्मिंग के माध्यम से मंदसौर में एक छोटे से कमरे को कश्मीर बना दिया और वहां केसर की खेती को शुरू किया है। उनका दावा है कि केसर को जिस प्रकार के वातावरण की आवश्यकता होती है वैसा ही वातावरण इंडौर फार्मिग में तैयार किया गया, इसमें भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सनातन मंत्रों के माध्यम से पौधों की वृद्धि को वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया है। इस पद्धति को भी उन्होंने अपनाया और केसर के पौधे को गायत्री मंत्र और ओमकार की ध्वनी सुना रहे हैं। जिसके आश्चर्यजनक परिणाम आए, मंत्र ध्वनी से केसर की खेती की गुणवत्ता और विकास दोनों पर सकारात्मक प्रभाव नजर आया और दूसरे साल में ही डॉ राठौर को केसर की खेती में सफलता मिल गई। उनके इंडोर फॉर्मिंग में केसर तैयार है, जिसको अब ऑनलाइन मााध्यम से बाजार में भेजा जाएगा।
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डॉ. कुणाल बताते है कि कुछ सालों पहले वे अपने दोस्तों के साथ घूमने गऐ तब उनके मन मे ख्याल आया कि बाकी सभी दोस्तों के घूमने जाने से उनके व्यापार पर कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन उनके बाहर जाने से क्लीनिक बंद करना पड़ा, तभी से वे ऐसा कुछ करने का सोचने लगे कि दो दिन यदि बीमार हो जाए तो भी व्यवसाय वैसे ही चलता रहे, लेकिन परिवार में सभी चिकित्सा पेशे से जुडे हैं किसी को भी व्यवसाय के बारे में अनुभव नहीं था, जिसके चलते लगातार नेट के माध्यम से जानकारियां जुटाई इसी में से केसर की इंडोर फॉर्मिंग के बारे में उन्हें पता लगा, जिसे उनके क्लीनिक पर ही 10 बाय 15 के एक कमरे में किया जा सकता था। इतनी सी जगह में इतनी फसल तैयार की जा सकती है जितनी एक बीघा के खेत में तैयार होती है।
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डॉ. कुणाल बताते है कि उन्होंने फसल के बारे में इंटरनेट पर मौजूद कई रिसर्च को पढ़ा और इसके बारे में पूरी जानकारी जुटाई और अपनी पत्नी डॉ निकिता राठौर के साथ केसर के लिए जन्नत माने जाने वाले कश्मीर के उस इलाके में जा पहुंचे, जहां केसर की खेती होती है। शुरुआत में तो वहां उन्हें कोई सफलता नहीं मिली लेकिन धीरे-धीरे वहां के कुछ लोगों से संबंध प्रगाढ़ किए और खेती के बारे में पूरी जानकारी जुटाकर केसर के कंद को मंगवाया।
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डॉ. राठौर कहते है कि केसर की खेती के प्राकृतिक वातावरण की ज्यादा आवश्यकता होती है, जरा सा भी मौसम अनुकूल ना हो तो खेती खराब हो जाती है जैसे ही फूल आने लगते है उस वक्त यदि बारिश हो जाऐ तो फसल जल जाती है और यदि ज्यादा धूप मिल जाऐ तो भी फसल खराब हो जाती है। ऐसे में इस खेती के लिए इंडोर फॉर्मिंग सबसे माफीक तरीका है, जिसमें तापमान इत्यादि को फसल की आवश्यकता के मुताबिक किया जा सकता है। डॉ कुणाल राठौर ने बताया कि इसमें एरोपॉनिक तकनीक का उपयोग किया गया। जिसमें एरो का मतलब हवा और पॉनिक का मतलब होता है सहायता।  इसमें सबसे महत्वपूर्ण ध्वनी का उपयोग रहा। जिससे पौधे का विकास और क्वालिटी में निखार आया। एक समान बॉइब्रेशन में इंडोर फॉर्मिंग रूम में सभी पौधों को बीज मंत्र और गायत्री मंत्र की ध्वनी सुनाई गई। इसमें पक्षियों की आवाज भी पौधों को सुनाई गई। महत्वपूर्ण यह रहा कि हर पौधे तक समान ध्वनी पहुंचे, इस तरह की व्यवस्था की गई। ध्वनी की आवाज को लेकर भी विशेष रिसर्च कर उसे पौधों तक पहुंचाई गई। डॉ कुणाल ने बताया कि अमेरिका, यूरोप के देशों में उपज की ग्रोथ और गुणवत्ता को लेकर इस तरह का प्रयोग किया जाता है। लेकिन इसमें हमने आध्यात्मिक फ्रीकवेंसी का उपयोग किया। इसके अलावा एक कंट्रोल ग्रुप बनाकर जांच भी की गई। जिस पौधे तक आवाज नहीं पहुंची। उसकी ग्रोथ कम हुई। जबकि जिन पौधों ने ध्वनी को सुना। उसका विकास जल्द और गुणवत्ता वाला हुआ।

कश्मीर रुके, कंद लेकर आए
डॉ कुणाल ने बताया कि करीब दो से ढाई साल से इस रिसर्च पर वह काम रहे हैं। इसके लिए कश्मीर कई दिनों तक रहे। वहां के माहौल और केसर की फसल को देखा। उसके बारे में जानकारी जुटाई। इसके बाद वहा से कंद लेकर आए, जिसमें एक पौधे का विकास होता है। कंद के बारे में कुणाल ने बताया कि कंद से पौधे निकलते हैं। इसके बाद कंद को फिर से मिट्टी में रखा जाता है। इस कंद से अन्य कंद भी बनते हैं।

बना दिया इंडोर रुम को कश्मीर
कुणाल का इंडोर फॉर्मिंग रूम किसी कश्मीर से कम नहीं है। केसर के पौधों को ऐसा वातावरण दिया जाता है जैसा कश्मीर में है। धूप के लिए रिसर्च कर पौधों को लाइट उपलब्ध कराई जाती है। कार्बन डाई ऑक्साइड के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। लाइट, कार्बनडाइ ऑक्साइड और नमी कितनी मात्रा में केसर को आवश्यक है, रिसर्च कर उपलब्ध कराई जाती है। कुणाल ने बताया कि सबसे पहले पौधे को पच्चीस डिग्री तापमान पर रखा जाता है और अंत में यह तापमान छह डिग्री तक पहुंचाया जाता है।

इतना आया खर्च
डॉ कुणाल ने बताया कि पांच से छह लाख रुपए लेब या इंडोर रूम तैयार करने में खर्च किया गया। दिसम्बर में फसल को बोया जाता है और अक्टूबर, नवम्बर और दिसम्बर में फसल तैयार होती हैहै। छोटे लेबल या प्रयोग के तौर पर किए गए इस काम मेें करीब आधा किलो केसर निकलेगी।

दुनिया में पहली बार, गुणवत्ता सबसे बेहतर
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कुणाल की केसर दुनिया में कहीं भी उगने वाली केसर को मात देती है। इसका कारण है कि केसर को खुले में लगाया जाता है। जहां प्रदूषण और कई प्राकृतिक चीजों का सामना केसर के पौधे को करना होता है। लेकिन इंडोर फार्मिंग में नमी, धूप, कॉर्बनडाइ ऑक्साइड से लेकर हर तत्व मात्रा में दिए गए न कम और न ही ज्यादा। रूम में प्रवेश वर्जित रखा गया। इस तरह से बिना किसी नकारात्मक चीज का सामना कर निकली केसर गुणवत्ता से परिपूर्ण निकल रहीं है। इसके अलावा कुणाल ने बताया कि यह प्रयोग दुनिया में पहला प्रयोग है जो की सफल हुआ है। केसर की टेस्टिंग करवाकर इसकी गुणवत्ता को प्रमाणित भी करवाया जाएगा।


डॉक्टर पत्नी ने भी किया सहयोग
दंत चिकित्सक कुणाल की पत्नी निकिता भी चिकित्सक हैं। दोनों ही नर्सिंग होम संभालते हैं। कुणाल की पत्नी निकिता माथुर ने भी कुणाल के इस प्रयोग में उनका बखूबी साथ दिया। दोनों बताते हैं कि एक पौधे को संभालता है तो दूसरा पेसेंट को।
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