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MP High Court: 150 क्रिश्चियन परिवार को मिली राहत, हाईकोर्ट ने कहा- हटाने के लिए न की जाए बलपूर्वक कार्रवाई
Sat, 08 Mar 2025 05:04 PM IST
जबलपुर ब्यूरो
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Sat, 08 Mar 2025 05:04 PM IST
सार
डेढ़ सौ क्रिश्चियन परिवार को राहत मिली है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कहा- इन्हें हटाने के लिए बलपूर्वक कार्रवाई न की जाए।
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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
डेढ़ सौ क्रिश्चियन परिवार को हाईकोर्ट से राहत मिली है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कहा, इन्हें हटाने के लिए बलपूर्वक कार्रवाई न की जाए। जमीन से बेदखल किए जाने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत तथा जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए नजूल की जमीन पर बने आवासीय संपत्तियों पर बलपूर्वक कार्रवाई करने पर रोक लगा दी है। युगलपीठ ने अनावेदकों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है।
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याचिकाकर्ता असीम जोसेफ सहित तीन अन्य की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि साल 1975 में राज्य सरकार ने क्रिश्चियन समाज की समिति लूथरन चर्च को 22 लाख 3515 वर्ग फीट जमीन लीज पर दी थी, जिसमें चर्च, स्कूल, हॉस्टल और मकान बने हुए हैं। चर्च के बिशप समिति के अध्यक्ष होते हैं और उनके द्वारा लीज की जमीन में नियम विरुद्ध तरीके से निर्माण कराया गया है।
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इस संबंध में याचिकाकर्ताओं ने पूर्व में जिला कलेक्टर से शिकायत की थी, जिस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके बाद आवेदकों की शिकायत पर बिशप सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ पांच एफआईआर दर्ज की गई थी। जमीन का व्यवसायिक उपयोग किए जाने के कारण जिला कलेक्टर ने तीन जनवरी 2025 को लीज निरस्त कर दी। इसके अलावा चर्च की समिति को भंग करते हुए अतिरिक्त कलेक्टर छिंदवाड़ा को प्रशासक नियुक्त करते हुए अध्यक्ष दायित्व दिया गया था। चर्च की संपत्ति संरक्षित करने उनके द्वारा कोई प्रयास नहीं किए गए। उक्त संपत्ति पर लगभग डेढ़ सौ से अधिक परिवार रहते हैं, जिन्हें बेदखल किया जा रहा है।
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याचिका की सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से तर्क दिया गया कि कानूनी प्रावधानों के तहत याचिकाकर्ता के पास मध्यप्रदेश नजूल भूमि विमोचन निर्देश, 2020 की धारा 145 (1) के अंतर्गत उच्च अधिकारी के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का प्रावधान है। याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि इस दौरान बलपूर्वक निवासरत परिवारों को बेदखल किया जा सकता है। युगलपीठ ने सुनवाई के बाद याचिकाकर्ताओं को निर्देशित किया है कि वह दो सप्ताह में संबंधित प्राधिकारी के समक्ष आवेदन पेश करें। संबंधित प्राधिकारी छह सप्ताह में अभ्यावेदन का निराकरण करें। युगलपीठ ने अनावेदकों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने पैरवी की।
