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Jabalpur: कैट ने स्पेशल केडर रिव्यू में विलंब पर किया जवाब तलब, केंद्र शासन सहित अन्य को नोटिस
Wed, 24 Jan 2024 10:39 PM IST
दिनेश शर्मा
अमर उजाला, न्यूज डेस्क, जबलपुर
अमर उजाला, न्यूज डेस्क, जबलपुर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Wed, 24 Jan 2024 10:39 PM IST
सार
नियमानुसार स्पेशल कैडर रिव्यू प्रति पांच वर्ष में आवश्यक रूप से होना चाहिए, किंतु ऐसा नहीं किया जा रहा। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) ने केंद्र शासन सहित अन्य को नोटिस जारी किए हैं।
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कैट ने स्पेशल कैडर रिव्यू में विलंब पर जवाब-तलब कर लिया है।
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विस्तार
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) ने स्पेशल कैडर रिव्यू में विलंब पर जवाब-तलब कर लिया है। इस सिलसिले में केंद्र शासन सहित अन्य को नोटिस जारी किए गए हैं।
याचिकाकर्ता मप्र स्टेट पुलिस ऑफिसर एसोसिएशन व जितेंद्र सिंह, पुलिस अधीक्षक, साइबर क्राइम, इंदौर की ओर से अधिवक्ता पंकज दुबे व अक्षय खंडेलवाल ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि नियमानुसार स्पेशल कैडर रिव्यू प्रति पांच वर्ष में आवश्यक रूप से होना चाहिए, किंतु ऐसा नहीं किया जा रहा। इससे याचिकाकर्ता सहित अन्य को परेशानी हो रही है। दरअसल सीएसपी, एडिशनल एसपी का प्रमोशन नहीं होता महज क्रमोन्नति होती है। कैडर संख्या कम होने से आईपीएस अवार्ड होने की संभावना क्षीण होती जा रही है।
दलील दी कि आलम यह है कि एएसपी के पद से ही अधिकतर सेवानिवृत्त होते जा रहे हैं। जबकि दूसरे राज्यों में समय से आईपीएस बनाए जा रहे हैं। मप्र शासन की ओर से इस सिलसिले में समय-समय पर केंद्र तक सिफारिश भेजी गई किंतु केंद्र का रवैया उदासीनता भरा रहा है। 2008 से विलंब से कैडर संख्या के निर्धारण से परेशानी बढ़ती चली गई है। बावजूद इसके कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में विलंब से निर्धारण को अन्याय की कोटि में रखा है। वास्तव में पदोन्नति पर समय रहते विचार कर्मचारी का अधिकार है।
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याचिकाकर्ता मप्र स्टेट पुलिस ऑफिसर एसोसिएशन व जितेंद्र सिंह, पुलिस अधीक्षक, साइबर क्राइम, इंदौर की ओर से अधिवक्ता पंकज दुबे व अक्षय खंडेलवाल ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि नियमानुसार स्पेशल कैडर रिव्यू प्रति पांच वर्ष में आवश्यक रूप से होना चाहिए, किंतु ऐसा नहीं किया जा रहा। इससे याचिकाकर्ता सहित अन्य को परेशानी हो रही है। दरअसल सीएसपी, एडिशनल एसपी का प्रमोशन नहीं होता महज क्रमोन्नति होती है। कैडर संख्या कम होने से आईपीएस अवार्ड होने की संभावना क्षीण होती जा रही है।
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दलील दी कि आलम यह है कि एएसपी के पद से ही अधिकतर सेवानिवृत्त होते जा रहे हैं। जबकि दूसरे राज्यों में समय से आईपीएस बनाए जा रहे हैं। मप्र शासन की ओर से इस सिलसिले में समय-समय पर केंद्र तक सिफारिश भेजी गई किंतु केंद्र का रवैया उदासीनता भरा रहा है। 2008 से विलंब से कैडर संख्या के निर्धारण से परेशानी बढ़ती चली गई है। बावजूद इसके कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में विलंब से निर्धारण को अन्याय की कोटि में रखा है। वास्तव में पदोन्नति पर समय रहते विचार कर्मचारी का अधिकार है।
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