{"_id":"6a75f065693017cd00018df0","slug":"a-divorce-cannot-be-legally-obtained-by-issuing-a-fatwa-jabalpur-news-c-1-1-noi1229-4587295-2026-08-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"Jabalpur News: फतवे जारी करने से नहीं मिल सकता कानूनी तौर पर तलाक, हाईकोर्ट का अहम फैसला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Jabalpur News: फतवे जारी करने से नहीं मिल सकता कानूनी तौर पर तलाक, हाईकोर्ट का अहम फैसला
Fri, 07 Aug 2026 09:32 PM IST
जबलपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Fri, 07 Aug 2026 09:32 PM IST
सार
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि केवल फतवे के आधार पर मुस्लिम निकाह समाप्त नहीं माना जा सकता। धार्मिक संस्थाएं केवल धार्मिक राय दे सकती हैं, जबकि कानूनी तलाक का अधिकार सक्षम अदालत को है। कोर्ट ने पति को पारिवारिक न्यायालय में तलाक याचिका दायर करने की स्वतंत्रता देते हुए वर्तमान वाद खारिज कर दिया।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि केवल फतवे के आधार पर मुस्लिम निकाह समाप्त नहीं माना जा सकता। धार्मिक संस्थाएं केवल धार्मिक राय दे सकती हैं, जबकि कानूनी तलाक का अधिकार सक्षम अदालत को है। कोर्ट ने पति को पारिवारिक न्यायालय में तलाक याचिका दायर करने की स्वतंत्रता देते हुए वर्तमान वाद खारिज कर दिया।
विज्ञापन
फतवे जारी करने से नहीं मिल सकता कानूनी तौर पर तलाक
विस्तार
मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने मुस्लिम विवाह-विच्छेद से जुड़े अहम मामले में स्पष्ट किया है कि केवल फतवे के आधार पर निकाह खत्म नहीं माना जा सकता। धार्मिक संस्था या मसाजिद कमेटी धार्मिक राय दे सकती है। कानूनी तौर पर तलाक की मंजूरी देते हुए विवाह समाप्त करने का अधिकार सक्षम अदालत के पास है।
विज्ञापन
भोपाल की दारुल-दफा मसाजिद कमेटी ने निकाह समाप्त करने के संबंध में फतवा जारी किया था। फतवा की वैधता के संबंध एकलपीठ के समक्ष याचिका दायर की गई थी। पति चाहता था कि फतवे के आधार पर उसका निकाह खत्म मान लिया जाए, जबकि पत्नी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि फतवा कानूनी तलाक नहीं है, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने फतवे का अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि फतवे में निकाह खत्म करने की घोषणा नहीं, बल्कि इस्लामी ग्रंथों के आधार पर पत्नी की कथित क्रूरता जैसी परिस्थितियों पर धार्मिक मार्गदर्शन दिया गया था। इसलिए इसे कानूनी तलाक नहीं माना जा सकता।
विज्ञापन
ये भी पढ़ें- बोतल से पानी पीने पर दलित को पीटने का मामला: शिक्षक को पुलिस ने थमाया नोटिस, मानवाधिकार आयोग ने भी मांगा जवाब
विज्ञापन
एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि कोई मदरसा, धार्मिक शिक्षण संस्था या मस्जिद कमेटी को कानूनी तलाक देने का अधिकारी नहीं है। कानूनी तौर पर तलाक की मंजूरी देते हुए विवाह समाप्त करने का अधिकार सिर्फ सक्षम अदालत के पास है। पति चाहे तो पारिवारिक न्यायालय में तलाक के लिए आवेदन दायर कर सकता है। मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम 1939 भी उसे ऐसा करने से नहीं रोकता। हाईकोर्ट ने दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश सात नियम 11 के तहत मौजूदा वाद खारिज करते हुए तलाक याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता दी है।
