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भोलेनाथ का शहर इंदौर: उज्जैन-महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर के बीच बसा, शिवभक्तों के लिए है आस्था का संगम

Sun, 15 Feb 2026 06:31 AM IST
Kamlesh Sen कमलेश सेन
Updated Sun, 15 Feb 2026 06:31 AM IST
सार

Mahashivratri: शिवरात्रि विशेष में इंदौर को भोलेनाथ की नगरी के रूप में याद किया जा रहा है। इंदौर दो ज्योतिर्लिंगों महाकालेश्वर मंदिर और ओंकारेश्वर मंदिर के बीच स्थित है। अहिल्याबाई होलकर की शिवभक्ति और प्राचीन मंदिर इसकी पहचान हैं।

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Indore News: Devi Ahilya Bai Reforms Ancient Shiva Temples History All You Need to Know
महाशिवरात्रि - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देवी अहिल्या का शहर इंदौर को भोलेनाथ का शहर भी कहा जाता है। मराठा शासन और उनके आराध्य शिव की भक्ति के कारण नगर में शिव मंदिरों की प्रमुखता रही है। शहर और आसपास के क्षेत्रों में कई मंदिर अपनी प्राचीनता और भव्यता के लिए प्रसिद्ध हैं। विशेष बात यह है कि इंदौर दो ज्योतिर्लिंगों उज्जैन के महाकालेश्वर और खंडवा जिले के ओंकारेश्वर के बीच स्थित है। इसलिए यहां असंख्य शिव मंदिर हैं और लाखों भक्त नियमित रूप से दर्शन के लिए आते हैं। शिवरात्रि के अवसर पर पूरे शहर के मंदिरों में विशेष आयोजन होते हैं।

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देवी अहिल्या बाई: शिवभक्त रानी
देवी अहिल्या बाई ने 1767 में होलकर रियासत की प्रमुखता संभाली और लगभग 28 वर्ष 5 माह तक शासन किया। उनके हर कार्य में शिव की भक्ति झलकती थी। उनके चित्रों में उन्हें अक्सर शिवलिंग के साथ दिखाया गया है। उनके द्वारा चलवाए गए सिक्कों पर भी शिवलिंग और बिल्वपत्र अंकित हैं। अहिल्या बाई के सभी आदेशों पर ‘शिव आदेश’ अंकित रहते थे। इस प्रकार वह परम शिवभक्त मानी जाती थीं।

पढ़ें: महाशिवरात्रि पर उमड़ेगा श्रद्धालुओं का सैलाब, महेश्वर में 2 लाख से अधिक लोगों के आने की संभावना

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देवगुराडिया शिव मंदिर का जीर्णोद्धार
1784 में महेश्वर से इंदौर प्रवास के दौरान अहिल्याबाई छत्रीबाग में ठहरीं। इसी दौरान उन्होंने देवगुराडिया शिव मंदिर में दर्शन किए और पूरे दिन पूजा-अर्चना में समय बिताया। इस मंदिर का उल्लेख होलकर राज्य के ऐतिहासिक दस्तावेज 'महेश्वर दरबाराची बातमी पत्रे' में गरुड़ तीर्थ के नाम से मिलता है। अहिल्या बाई ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह मंदिर 1784 से पहले का है।

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इंद्रेश्वर महादेव: इंदौर का नाम और इतिहास
जूनी इंदौर की प्राचीन बस्ती खान (कान्ह) और सरस्वती नदी के किनारे स्थित थी। इतिहास के कुछ ग्रंथों में उल्लेख है कि 1715 में कुछ जमींदारों ने यह बस्ती बसाई थी।
इन जमींदारों ने जूनी इंदौर में एक ऊंचे टीले पर 1741 में इंद्रेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की। इतिहासकार स्व. वाकणकर के अनुसार मंदिर की संरचना राष्ट्रकूट शैली की प्रतीत होती है। 1741 में महाराजा मल्हारराव होलकर ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। इसके कुछ अभिलेखों में 1854 और 1912 में शिखर का जीर्णोद्धार भी दर्ज है। डॉ. शिवनारायण यादव के अनुसार अल्प वर्षा या वर्षा अभाव के वर्षों में भक्तगण इंद्रेश्वर महादेव का जलाभिषेक किया करते थे।

अन्य प्रमुख शिवालय

कनकेश्वर महादेव मंदिर – जूनी इंदौर के मालीपुरा में स्थित, उत्तरमुखी और गुफानुमा गर्भगृह वाला मंदिर। 1829 में महाराजा मल्हारराव द्वितीय ने महंत को पूजा-अर्चना के लिए 15 बीघा भूमि प्रदान की। मंदिर में नंदी विराजमान है और नियमित पूजा होती है।

चंद्रेश्वर महादेव मंदिर – जूनी इंदौर, रावजी बाजार के पास, वर्तमान में पुलिस थाना के पीछे। यह 18वीं शताब्दी का मंदिर है। ज्योतिष अनुसार किसी का चंद्र कमजोर होने पर इस शिवलिंग पर जलाभिषेक करना शुभ माना जाता है।

जबरेश्वर महादेव मंदिर – ग्राम पिगंडबर, राऊ-पीथमपुर मार्ग पर स्थित। 1914–1916 के बीच निर्मित। पहाड़ी पर आरोग्य धाम (टीबी चिकित्सालय) था। मंदिर में दो शिवलिंग और नंदी हैं।

शहर के अन्य शिव मंदिर
इंदौर में लालबाग परिसर में चंपा बावड़ी के पास शिव मंदिर, गणगौर घाट छत्रीबाग में शिव मंदिर, जूनी इंदौर में कान्ह नदी किनारे शिव मंदिर, भूतेश्वर महादेव, केसरबाग शिव मंदिर और गांधीहाल में भी शिवालय हैं। नगर के आसपास के क्षेत्रों में खुदाई के दौरान प्राप्त प्राचीन शिव प्रतिमाएं इंदौर के केंद्रीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

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