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इंदौर दूषित पानी कांड: मौत पर पीड़ितों को दस लाख क्षतिपूर्ति की सिफारिश, हाईकोर्ट में अंतिम बहस 5 नवंबर तक टली
Mon, 05 Oct 2026 09:23 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Mon, 05 Oct 2026 09:23 PM IST
सार
इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पानी मामले में हाईकोर्ट की अंतिम बहस 5 नवंबर तक टल गई। 600 से अधिक पन्नों की जांच रिपोर्ट में प्रशासनिक लापरवाही और पेयजल लाइन में ड्रेनेज पानी मिलने की बात सामने आई। आयोग ने दूषित पानी से जुड़ी 22 मौतों के मामलों में परिजनों को 10-10 लाख रुपये क्षतिपूर्ति की सिफारिश की है।
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मप्र हाईकोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में इंदौर के चर्चित भागीरथपुरा दूषित पेयजल मामले की जांच रिपोर्ट पर होने वाली अंतिम बहस 5 नवंबर तक के लिए स्थगित हो गई है। सोमवार को सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ता पक्ष के वकीलों ने न्यायालय से 600 से अधिक पृष्ठों में फैली विस्तृत जांच रिपोर्ट का अध्ययन करने के लिए समय देने का अनुरोध किया। याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि रिपोर्ट अत्यधिक व्यापक है, इसलिए इसका गहन अध्ययन करने के बाद ही अंतिम बहस करना उचित होगा। उच्च न्यायालय ने इस आग्रह को स्वीकार करते हुए सभी पक्षों की दलीलें सुनने के लिए 5 नवंबर की तिथि तय की है।
भागीरथपुरा क्षेत्र में दिसंबर और जनवरी के दौरान दूषित पेयजल आपूर्ति के कारण बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े थे और 36 लोगों की मौत का मामला सामने आया था। इस प्रकरण को लेकर उच्च न्यायालय में सात जनहित याचिकाएं लंबित हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया था। जांच आयोग ने लगभग ढाई महीने पहले अपनी सीलबंद रिपोर्ट उच्च न्यायालय को सौंपी थी। इसके बाद न्यायालय के निर्देश पर इस विस्तृत रिपोर्ट को उच्च न्यायालय की अधिकृत वेबसाइट पर सार्वजनिक किया गया था।
ये भी पढ़ें- कांग्रेस नेता पहुंचे भागीरथपुरा बस्ती, प्रभावित परिवारों ने कहा-दोषियों को सजा दिलवाएं
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जांच आयोग की रिपोर्ट में गंभीर लापरवाही का खुलासा
एक सदस्यीय जांच आयोग ने 600 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट के अंतिम 112 पृष्ठों में अपने निष्कर्षों का सार दिया है। इस रिपोर्ट में प्रशासनिक स्तर पर हुई गंभीर लापरवाही को उजागर किया गया है। आयोग के निष्कर्षों के अनुसार, जिम्मेदार अधिकारियों को वर्ष 2018 से ही शहर के एक बड़े हिस्से में दूषित पानी की समस्या की जानकारी थी। इसके बावजूद अधिकारियों ने इस समस्या के समाधान के लिए कोई प्रभावी सुधारात्मक कदम नहीं उठाए।
इसके अलावा, रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भागीरथपुरा के निवासी बीते वर्ष सितंबर से लगातार गंदे पानी की शिकायतें दर्ज करा रहे थे। स्थानीय नागरिकों द्वारा दर्ज कराई गई इन शिकायतों पर संबंधित अधिकारियों ने अपेक्षित गंभीरता से कोई कार्रवाई नहीं की। उपेक्षा के कारण क्षेत्र में स्थिति बिगड़ती चली गई और अंततः निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
नई पेयजल लाइन के टेंडर में 20 महीने का विलंब
जांच आयोग की रिपोर्ट में नई पेयजल पाइपलाइन बिछाने में हुई प्रशासनिक देरी को भी रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, नई पेयजल लाइन बिछाने से संबंधित टेंडर की प्रक्रिया में लगभग 20 महीने का विलंब हुआ। जांच में यह बात भी सामने आई है कि टेंडर स्वीकृति की प्रक्रिया से जुड़ी फाइलों को जानबूझकर लंबित रखा गया था। साथ ही, आयोग ने पेयजल और ड्रेनेज लाइन के निर्माण में हुई गड़बड़ियों की ओर संकेत किया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पेयजल और ड्रेनेज की लाइनों को एक साथ बिछाया गया था। दोनों लाइनों के एक साथ होने के कारण ड्रेनेज का गंदा पानी पेयजल लाइन में मिल गया, जिससे पूरे क्षेत्र में दूषित जल की आपूर्ति हुई।
स्वतंत्र जल-मल बोर्ड बनाने की सिफारिश
व्यवस्था में सुधार के लिए आयोग ने नगर निगम से पेयजल और ड्रेनेज प्रबंधन की जिम्मेदारी अलग कर एक स्वतंत्र जल-मल बोर्ड गठित करने की सिफारिश की है। मौतों के आकलन पर आयोग ने स्पष्ट किया है कि दूषित पानी से 22 मौतों का सीधा संबंध पाया गया है, जबकि अन्य मौतों के कारण स्पष्ट नहीं हैं। आयोग ने दूषित पानी से मौत की पुष्टि वाले 22 मामलों में प्रत्येक मृतक के परिजनों को 10-10 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देने की सिफारिश की है। अब 5 नवंबर को उच्च न्यायालय में होने वाली अंतिम बहस के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि न्यायालय इन सिफारिशों पर क्या रुख अपनाता है।
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भागीरथपुरा क्षेत्र में दिसंबर और जनवरी के दौरान दूषित पेयजल आपूर्ति के कारण बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े थे और 36 लोगों की मौत का मामला सामने आया था। इस प्रकरण को लेकर उच्च न्यायालय में सात जनहित याचिकाएं लंबित हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया था। जांच आयोग ने लगभग ढाई महीने पहले अपनी सीलबंद रिपोर्ट उच्च न्यायालय को सौंपी थी। इसके बाद न्यायालय के निर्देश पर इस विस्तृत रिपोर्ट को उच्च न्यायालय की अधिकृत वेबसाइट पर सार्वजनिक किया गया था।
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जांच आयोग की रिपोर्ट में गंभीर लापरवाही का खुलासा
एक सदस्यीय जांच आयोग ने 600 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट के अंतिम 112 पृष्ठों में अपने निष्कर्षों का सार दिया है। इस रिपोर्ट में प्रशासनिक स्तर पर हुई गंभीर लापरवाही को उजागर किया गया है। आयोग के निष्कर्षों के अनुसार, जिम्मेदार अधिकारियों को वर्ष 2018 से ही शहर के एक बड़े हिस्से में दूषित पानी की समस्या की जानकारी थी। इसके बावजूद अधिकारियों ने इस समस्या के समाधान के लिए कोई प्रभावी सुधारात्मक कदम नहीं उठाए।
इसके अलावा, रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भागीरथपुरा के निवासी बीते वर्ष सितंबर से लगातार गंदे पानी की शिकायतें दर्ज करा रहे थे। स्थानीय नागरिकों द्वारा दर्ज कराई गई इन शिकायतों पर संबंधित अधिकारियों ने अपेक्षित गंभीरता से कोई कार्रवाई नहीं की। उपेक्षा के कारण क्षेत्र में स्थिति बिगड़ती चली गई और अंततः निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
नई पेयजल लाइन के टेंडर में 20 महीने का विलंब
जांच आयोग की रिपोर्ट में नई पेयजल पाइपलाइन बिछाने में हुई प्रशासनिक देरी को भी रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, नई पेयजल लाइन बिछाने से संबंधित टेंडर की प्रक्रिया में लगभग 20 महीने का विलंब हुआ। जांच में यह बात भी सामने आई है कि टेंडर स्वीकृति की प्रक्रिया से जुड़ी फाइलों को जानबूझकर लंबित रखा गया था। साथ ही, आयोग ने पेयजल और ड्रेनेज लाइन के निर्माण में हुई गड़बड़ियों की ओर संकेत किया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पेयजल और ड्रेनेज की लाइनों को एक साथ बिछाया गया था। दोनों लाइनों के एक साथ होने के कारण ड्रेनेज का गंदा पानी पेयजल लाइन में मिल गया, जिससे पूरे क्षेत्र में दूषित जल की आपूर्ति हुई।
स्वतंत्र जल-मल बोर्ड बनाने की सिफारिश
व्यवस्था में सुधार के लिए आयोग ने नगर निगम से पेयजल और ड्रेनेज प्रबंधन की जिम्मेदारी अलग कर एक स्वतंत्र जल-मल बोर्ड गठित करने की सिफारिश की है। मौतों के आकलन पर आयोग ने स्पष्ट किया है कि दूषित पानी से 22 मौतों का सीधा संबंध पाया गया है, जबकि अन्य मौतों के कारण स्पष्ट नहीं हैं। आयोग ने दूषित पानी से मौत की पुष्टि वाले 22 मामलों में प्रत्येक मृतक के परिजनों को 10-10 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देने की सिफारिश की है। अब 5 नवंबर को उच्च न्यायालय में होने वाली अंतिम बहस के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि न्यायालय इन सिफारिशों पर क्या रुख अपनाता है।
