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सीहोर: प्रखर राष्ट्र चिंतक पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ ने रखे विचार, कहा- जिन्हें राष्ट्र की चिंता है वह गीता पढ़ें
Mon, 28 Feb 2022 04:13 PM IST
अंकिता विश्वकर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
Published by: अंकिता विश्वकर्मा
Updated Mon, 28 Feb 2022 04:13 PM IST
सार
राष्ट्र चिंतक पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने सीहोर में अपने विचार व्यक्त किए। इस मौके पर उन्होंने कहा कि जिन्हें परिवार चलाना है उन्हें रामायण पढ़नी चाहिए, वहीं जिन्हें देश की फ्रिक है उन्हें गीता पढ़ना चाहिए।
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राष्ट्र चिंतक पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सीहोर जिले में मुक्ति फाउंडेशन समिति की ओर से आयोजित कार्यक्रम में प्रखर राष्ट्र चिंतक पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ ने भारत निर्माण में सनातन धर्म की प्रासंगिकता पर विचार व्यक्त किए और लोगों को आवश्यकता अनुसार गीता और रामायण पढ़ने की सलाह दी।
शादी के पवित्र बंधन पर बोलते हुए कुलश्रेष्ठ ने कहा कि यूरोप में शादी का कोई बंधन ही नहीं रहता था। वहां दो युवक-युवती कि यदि कोई संतान हो जाती थी, तो उसे एक सरकारी जगह पर रख दिया जाता था, जिसका नाम होता था कॉन्वेंट और इस कॉन्वेंट में बिना शादी शुदा एक महिला और पुरूष होते थे, उन्हें ही फादर और मदर कहा जाता था, जिन्हें शादी के पवित्र बंधन की जानकारी नहीं थी। आज उसी की नकल करते हुए आप अपने बच्चों को कॉन्वेंट में पढ़ाने की होड़ करते हैं। पिता को डैडी कहलवाते हैं। यह सही नहीं है। कार्यक्रम में प्रसिद्ध कथा वाचक पं. प्रदीप मिश्रा भी उपस्थित रहे।
शादी के पवित्र बंधन पर बोलते हुए कुलश्रेष्ठ ने कहा कि यूरोप में शादी का कोई बंधन ही नहीं रहता था। वहां दो युवक-युवती कि यदि कोई संतान हो जाती थी, तो उसे एक सरकारी जगह पर रख दिया जाता था, जिसका नाम होता था कॉन्वेंट और इस कॉन्वेंट में बिना शादी शुदा एक महिला और पुरूष होते थे, उन्हें ही फादर और मदर कहा जाता था, जिन्हें शादी के पवित्र बंधन की जानकारी नहीं थी। आज उसी की नकल करते हुए आप अपने बच्चों को कॉन्वेंट में पढ़ाने की होड़ करते हैं। पिता को डैडी कहलवाते हैं। यह सही नहीं है। कार्यक्रम में प्रसिद्ध कथा वाचक पं. प्रदीप मिश्रा भी उपस्थित रहे।
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कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे
- फोटो : अमर उजाला
कुलश्रेष्ठ ने कहा कि देश और राष्ट्र दो अलग चीजें हैं। देश का संचालन चुनी हुई सरकार करती है। देश किसी भूमि के टुकड़े को कहते हैं, लेकिन राष्ट्र एक सतत संस्कृति होती है। इस राष्ट्र का संचालन किसी शंकराचार्य के हाथ में होना चाहिए। राष्ट्र के किसी बड़े निर्णय पर पहली राय जब शंकराचार्य की होगी, तब जाकर यह राष्ट्र एकसूत्र में बंधेगा। राष्ट्र को मजबूत करेंगे, तो सरकार आपकी सुनने को मजबूर होगी। तब कोर्ट में बैठकर कोई हिन्दुत्व की परिभाषा की व्याख्या करने की हिम्मत नहीं करेगा।
सबरीमाला मंदिर के मामले को उठाते हुए कहा कि वह एक वैज्ञानिक आधार पर रची गई व्यवस्था है, जिस पर राष्ट्र के कमजोर होने के कारण स्थानीय सरकार दखल दे रही है, जिसको कुछ जानकारी नहीं होगी, वह ही आजकल विशेषज्ञ बनकर डिबेट में हिस्सा लेने पहुंच जाते हैं।
कुलश्रेष्ठ ने कहा कि सब काम सरकार के भरोसे मत छोड़िए अपना काम खुद करना सीखिए। जिन्हें घर चलाना है वो रामायण पढ़ें और जिन्हें राष्ट्र की चिंता है वह गीता पढ़ना शुरू कर दें। भारत भूमि धर्म प्रधान नहीं यहां कर्म प्रधान भूमि है।
