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Election: पहले आम चुनाव में मतदाताओं की गणना और सूची प्रकाशन चुनौती थी, जानें क्यों स्थगित किए गए थे चुनाव

Tue, 13 Feb 2024 08:50 AM IST
उदित दीक्षित कमलेश सेन
कमलेश सेन Published by: उदित दीक्षित Updated Tue, 13 Feb 2024 08:50 AM IST
सार

First General Election: 1951 में चुनाव आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत की जनसंख्या 35 करोड़ 66 लाख 91 हजार 760 थी। इसमें से करीब 49 प्रतिशत मतदाताओं ने सूची में नाम दर्ज कराए थे। 21 वर्ष से अधिक वयस्क मतदाताओं की संख्या कुल जनसंख्या का 50 से 55 प्रतिशत के करीब थी।

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First General Election Counting of Voters and Publication of the List Difficult Task Hindi News
जामा मस्जिद इलाके का एक पोलिंग बूथ (फाइल फोटो) फोटो : wikimedia commons - फोटो : wikimedia commons

विस्तार

देश के पहले आम चुनाव में मतदाताओं की गणना करना और उनका नामांकन करना एक बहुत मुश्किल कार्य था। यह भगीरथी कार्य था जिसे पहले चुनाव आयोग ने बखूबी किया था।  महिला मतदाताओं ने नाम दर्ज करने की परेशानियां और नाम दर्ज करने में सामाजिक तकलीफें, महिलाओं का नाम ठीक तरह से नहीं लिखवाने जैसी कई तकलीफें थी, जिसे आयोग ने बखूबी किया था।

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1951-52 के लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनावों के लिए चुनावी सामग्री का प्रकाशन चुनौती पूर्ण कार्य था। जनप्रतिनिधित्व कानून का प्रकाशन हुआ और उसके तहत चुनावी सामग्री का प्रकाशन कर जनता को सूचित करना महत्वपूर्ण कार्य था। 
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चुनाव आयोग ने राज्य सरकारों को निर्देश दिए कि वे चुनाव प्रक्रिया से जुडी सामग्री आमजन को बताने की प्रक्रिया नवंबर 1950 के प्रथम सप्ताह में कर इससे जुड़े दावे आपत्ति मंगाकर आमजन की समस्या को जानें। 

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सूचियों का प्रकाशन कर दावे आपत्ति मांगे गए
आयोग ने निर्देश दिए कि मतदाता सूची का प्रकाशन कर उसे जिला कार्यालय, तहसील कार्यालय, ब्लॉक स्तर, पुलिस थाना, ग्राम पंचायत कार्यालय और गांव नगर के मुख्य चौराहों पर इनकी प्रतियां लगाएं ताकि आमजन इन्हें देख सकें। इस कार्य के लिए आयोग ने समय सीमा निर्धारित की थी कि 15 अक्तूबर 1950 तक अनुपूरक सूचियों का प्रकाशन, नामावलियों का प्रकाशन 31 अक्तूबर 1950 और 21 नवंबर 1950 तक दावे और आपत्तियां प्राप्त करें।

चुनाव स्थगित किए गए
आयोग ने नवंबर-दिसंबर 1951 तक चुनाव स्थगित करने का निर्णय लिया ताकि मतदाता सूची को और अच्छे से जांचा जा सके और मतदाता अपने नाम की जांच कर सकें। इस संबंध में दावे और आपत्तियां प्राप्त करने की तारीख को भी आगे बढ़ाया। चुनाव और दावे के आपत्तियां प्राप्त करने का अधिक अवसर राज्यों को मिल गया था। तमाम दावे आपत्तियों को प्राप्त कर उसमें सुधार कर इनका पुनः प्रकाशन किया गया था। सामान्यतः मतदाता उस दौर में भी अपना नाम दर्ज करवाने के प्रति उत्सुक नहीं था, राजनैतिक दल के कार्यकर्ता मतदाताओं के नाम जुड़वाने में मददगार रहे। असम और उत्तर प्रदेश से सर्वाधिक आपत्तियां प्राप्त हुईं और उनका निराकरण किया गया। देशभर में 13 लाख 93 हजार 526 दावे और 7 लाख 12 हजार 802 आपत्तियां प्राप्त हुई थी। मतदाता सूची में बहुत गंभीर खामियां थी, जिनका निराकरण करना आयोग के लिए बड़ा मुश्किल भरा कार्य था, जिसे आयोग ने किया।

35 करोड़ थी देश की आबादी, 17 करोड़ से अधिक थे मतदाता
1951 में चुनाव आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत की जनसंख्या 35 करोड़ 66 लाख 91 हजार 760 थी। इसमें से करीब 49 प्रतिशत मतदाताओं ने सूची में नाम दर्ज कराए थे। 21 वर्ष से अधिक वयस्क मतदाताओं की संख्या कुल जनसंख्या का 50 से 55 प्रतिशत के करीब थी। देश की वयस्क आबादी 18 करोड़ 3 लाख 7 हजार 384 थी, इसमें से मतदाता सूची में कुल 17 करोड़ 32 लाख 13 हजार 635 नाम दर्ज हुए थे। कुछ कारणों से 70 लाख 34 हजार 839 युवा वोटरों के नाम दर्ज नहीं हो पाए थे।  

नासिक सिक्यूरिटी प्रेस में हुई थी मतपत्रों की छपाई
चुनाव आयोग द्वारा सभी राजनैतिक पार्टियों के चुनाव चिन्ह पर सहमति होने के पश्चात उनकी डिजाइन तय की गई और चुनाव चिन्हों की डमी छपाई का कार्य करवाया गयां 1951 -52 के चुनाव में मतपेटियों पर भी चुनाव चिन्ह मुद्रित कर चिपकाना था। चुनाव आयोग ने तय किया की मतपत्रों की छपाई केंद्रीय रूप से नासिक की सिक्यूरिटी प्रेस में करवाई जाए।

मतपत्रों की डिजाइन में कुछ बड़ा परिवर्तन नहीं किया गया, क्योंकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हुए थे। लोकसभा के चुनाव के मत पत्र अशोक स्तंभ वाटर मार्क के रूप में मुद्रित किया गया था और राज्य का नाम कोड के रूप में अंकित किया था, जैसे बीआर यानि बिहार और एएस यानी असम। मतपत्रों की साइज को लेकर हैदराबाद में कुछ परेशानी रही, बाद में इसे हल किया गया।

चुनाव आयोग ने यह भी तय किया था कि मतपत्र पर किसी भी उम्मीदवार का नाम नहीं लिखा जाएगा। मतपत्र पर गुलाबी रंग से भारतीय चुनाव आयोग प्रिंट किया गया था। दो सदस्यों के लिए संसदीय सीट पर एक जैसे मतपत्र मुद्रित किए गए थे। आरक्षित सीट पर एक दर्ज किया गया था। त्रि-सदस्यीय मतपत्रों पर सी दर्ज किया गया था। इन सभी मतपत्रों की छपाई में 180 टन कागज  का उपयोग किया गया था। तब करीब 60 करोड़ मतपत्रों की छपाई की गई थी। इन मतपत्रों की छपाई की कुल लागत 10 लाख 77 हजार 401 रुपये 13 आना रही थी। 

ईवीएम नहीं होती तो कितना कागज लगता
आज का वक्त ईवीएम मशीनों का है देश में मतदाताओं की कुल संख्या बढ़कर 97 करोड़ से अधिक हो चुकी है, ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है कि आज यदि मतपत्रों की छपाई हो तो कितना कागज लगे। करोड़ों मतपत्रों की छपाई कितना महंगा सौदा होता।

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