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देवास: डोल ग्यारस पर भमोरी नदी में तीन बार तैरी 7.5 किलो वजनी नृसिंह प्रतिमा, हजारों श्रद्धालु बने साक्षी
Tue, 22 Sep 2026 10:49 PM IST
देवास ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देवास
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देवास
Published by: देवास ब्यूरो
Updated Tue, 22 Sep 2026 10:49 PM IST
सार
हाटपिपल्या में 127 साल पुरानी परंपरा के तहत डोल ग्यारस पर भगवान नृसिंह की पाषाण प्रतिमा को भमोरी नदी में तैराया गया। तीनों बार प्रतिमा के पानी की सतह पर तैरने को स्थानीय मान्यता में शुभ संकेत माना जाता है।
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घाट पर मौजूद श्रद्धालु
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
जिले के हाटपिपल्या क्षेत्र में 127 साल पुरानी परंपरा आज भी लगातार निभाई जा रही है। डोल ग्यारस के अवसर पर मंगलवार शाम नृसिंह घाट पर भमोरी नदी में भगवान नृसिंह की 7.5 किलो वजनी पाषाण प्रतिमा को तीन बार तैराया गया। खास बात यह रही कि तीनों बार प्रतिमा पानी की सतह पर तैरती रही। इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए हाटपिपल्या सहित आसपास के क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु घाट पर पहुंचे।
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इस बार नगर के इतिहास में पहली बार 22 वर्षीय अविनय पिता विष्णुदास वैष्णव ने प्रतिमा को नदी में तैराया। उन्होंने अपने पिता, दादा और परदादा से चली आ रही करीब 127 साल पुरानी पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाया। सुबह नृसिंह मंदिर से भगवान की शोभायात्रा निकाली गई, जबकि शाम को नगर के विभिन्न मंदिरों के डोल नृसिंह घाट पहुंचे। आरती और पूजन के बाद पुजारी ने मंगल मंत्रोच्चार के बीच प्रतिमा को नदी के पानी में तीन बार छोड़ा।
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तीन बार तैरना माना जाता है शुभ संकेत
स्थानीय मान्यता के अनुसार प्रतिमा का तीनों बार तैरना आगामी वर्ष के सुखद रहने का संकेत माना जाता है। मान्यता है कि प्रतिमा दो बार तैरती है तो आठ महीने अच्छे रहते हैं, एक बार तैरने पर वर्ष सामान्य रहता है, जबकि तीनों बार डूबने पर आने वाला वर्ष अनिश्चितताओं से गुजरने का संकेत माना जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार ठोस पत्थर से बनी यह प्रतिमा पानी में करीब 7 से 8 फीट तक तैरती दिखाई देती है। यह भी मान्यता है कि प्रतिमा नदी के बहाव के विपरीत दिशा में तैरती है।
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साधु ने राजपरिवार को भेंट की थी प्रतिमा
स्थानीय इतिहास के अनुसार करीब 127 वर्ष पहले 10 से 15 हाथियों का दल, उनके महावत और साधुओं की जमात के साथ हाटपिपल्या पहुंचा था। तत्कालीन शक्तावत राजपरिवार ने उनकी सेवा की। इससे प्रसन्न होकर एक तपस्वी साधु ने भगवान नृसिंह की पाषाण प्रतिमा राजपरिवार को भेंट की थी।
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साधु ने बताया था कि यह प्रतिमा रामेश्वरम से लाई गई है और पानी में तैरती है। उन्होंने डोल ग्यारस पर प्रतिमा को तीन बार नदी में तैराने की परंपरा शुरू करने की बात कही थी। इसके बाद राजपरिवार ने गढ़ी में भगवान नृसिंह का मंदिर बनवाकर प्रतिमा स्थापित की और हर साल डोल ग्यारस पर इसे नदी में तैराने की परंपरा शुरू हुई।
चौथी बार तैराने पर नदी में गायब
परंपरा से जुड़ा एक प्रसंग भी स्थानीय इतिहास में बताया जाता है कि एक बार बागली के ठाकुर साहब के कहने पर प्रतिमा को चौथी बार तैराने का प्रयास किया गया लेकिन प्रतिमा पानी के अंदर ही गायब हो गई थी। करीब दो महीने बाद पुजारी को स्वप्न में प्रतिमा के सेंधला नदी में तैरते हुए होने की जानकारी मिली। इसके बाद नगरवासी और बागली नरेश गाजे-बाजे के साथ हाथी पर प्रतिमा को वापस लेकर आए और मंदिर में पुन: स्थापित किया।
कुछ वर्षों बाद प्रतिमा तीन हिस्सों में टूट गई। पुजारी ने एक स्वर्णकार से उसे चांदी के तार से बंधवाया, लेकिन कुछ दिन बाद प्रतिमा के तीनों हिस्से अपने आप ही जुड़ गए और चांदी का तार भी गायब हो गया। यह प्रसंग आज भी श्रद्धालुओं के बीच आस्था का विषय बना हुआ है।
श्रद्धालुओं के लिए घाट पर की गई विशेष व्यवस्थाएं
डोल ग्यारस के कार्यक्रम को देखते हुए नगर परिषद की ओर से नृसिंह घाट पर विशेष व्यवस्थाएं की गईं। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के बैठने के लिए रैलियां लगाई गईं। घाट की सफाई, रंग-रोगन और प्रकाश व्यवस्था भी कराई गई। विशेष अतिथियों के लिए भी व्यवस्थाएं की गईं। प्रशासनिक अधिकारियों ने शोभायात्रा के मार्ग और मुख्य कार्यक्रम स्थल नृसिंह घाट का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया।
