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MP News: गढ़ियाघुल्ला की मिठास के बिना संक्रांति का त्योहार अधूरा; साल में केवल एक दिन के लिए बनती है खास मिठाई

Mon, 15 Jan 2024 10:18 AM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह Published by: हिमांशु प्रियदर्शी Updated Mon, 15 Jan 2024 10:18 AM IST
सार

Makar Sankranti: बुंदेलखंड में सभी तयोहारों को एक खास अंदाज में मनाया जाता है और यहां की परंपराएं भी अलग हैं। गढ़ियाघुल्ला मिठाई का भी खास महत्व है, जो सिर्फ मकर संक्रांति के दिन ही बनाई जाती है।
 

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MP News: festival of Makar Sankranti is incomplete without sweetness of Gadhiyaghulla in Bundelkhand
गढ़ियाघुल्ला मिठाई - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मकर संक्राति पर्व पर घरों में कई प्रकार के लड्डू बनाए जाते हैं। लेकिन बुंदेलखंड में शक्कर की चाशनी से बनी गढ़ियाघुल्ला की मिठाई का अलग ही महत्व है। दमोह की मिठाई लाइन में शक्कर से बनी मिठाई साल में एक दिन मकर संक्रांति के दिन ही मिलती है। इस मिठाई को हलवाइयों के द्वारा घोड़ा, हाथी, ऊंट, आभूषण सहित विभिन्ना प्रकार की आकृतियों में ढाला जाता है। इन्हें आकर्षक बनाने के लिए कई प्रकार के रंगों का प्रयोग किया जाता है, जिससे यह मिठाई लोगों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती है।

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महाभारत काल से जुड़ा है मिठाई का इतिहास
गढ़ियाघुल्ला मिठाई का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। महाभारत के युद्ध में हांथी, घोड़े और अन्य चीजों का उपयोग हुआ था। इसलिए महाभारत की सेना के रूप सहित अन्य अक्स के रूप में मिठाई बनाई जाती है। विशेष रूप से गढ़ियाघुल्ला में हाथी, घोड़ा, बग्गी, बाबा, घर, महल, सैनिक, कंगन और योद्धा सहित अन्य प्रकार की मिठाई बनाई जाती है। लोगों का मानना है कि सेना के इस गढ़ियाघुल्ला के स्वरूप को खाने से संबंधित विरोधी सेना को पराजित करना माना जाता था। इसे विशेष रूप से मकर संक्रांति पर्व पर खरीदी के लिए दुकानों पर इसे सजाकर रखा जाता है। मिठाई बनाने वाले भगवानदास नेमा का कहना है कि इस प्रकार की मिठाई का निर्माण तीन पीढ़ियों से होता आ रहा है, जिसकी मांग अब पहले से बहुत कम हो गई है।
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मिठाई का महत्व
भगवानदास नेमा और प्रसन्न नेमा ने बताया कि गढ़ियाघुल्ला की मिठाई को हाथी, घोड़े, ऊंट, गहने और कई प्रकार की आकृति में बनाया जाता है। महाभारत काल में सेना में यह हांथी, घोड़े थे। राजा, महाराजा के समय में वह हाथी, घोड़े, ऊंट और गहनों के शौकीन होते थे। साथ ही उस समय में जब मेला भरता था तो उसमें यही हाथी, घोड़े, ऊंट बिक्री के लिए आते थे। इसलिए इस मिठाई को इसी प्रकार की आकृति में बनाया जाता है।
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उन्होंने बताया कि उसके अलावा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में यह परंपरा है कि जब बेटी की शादी के बाद उसकी ससुराल से पहली विदाई होती है। मायके वाले जब बेटी को लेने आते हैं तो वे स्टील की मटकी में इसी तरह यह गढ़ियाघुल्ला की मिठाई लेकर जाते हैं। यह पुरानी परंपरा है जिसे आज भी निभाया जा रहा है।

 
ऐसे बनती है मिठाई
मिठाई बनाने वाले प्रसन्न नेमा ने बताया कि कई पीढ़ियों से उनके परिवार में मिठाई बनाने का काम किया जा रहा है। साल भर उनके यहां मिठाइयों का निर्माण होता है, लेकिन मकर संक्रांति पर्व पर गढ़ियाघुल्ला की मिठाई का विशेष महत्व है। शक्कर की चाशनी बनाकर सांचों में डाली जाती है तब कई आकृतियों में यह मिठाई बनती है। मकर संक्रांति पर्व पर दमोह जिले के कोने-कोने से लोग यह मिठाई खरीदने आते हैं। 100 क्विंटल तक शक्कर की चासनी से यह मिठाई बनाई जाती है, जो ज्यादा महंगी तो नहीं रहती। लेकिन रिश्तों की डोर को निभाने के लिए यह काफी महंगी है।

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