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एमपी: 'शाह' की बलि लेकर कांग्रेस की 'विजय' नहीं होने देगी BJP, केस न चलाने की आखिर सरकार की क्या है मजबूरी?

Tue, 01 Sep 2026 08:44 AM IST
Anand Pawar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: Anand Pawar Updated Tue, 01 Sep 2026 08:44 AM IST
सार

Madhya Pradesh: कर्नल सोफिया कुरैशी के मामले में मोहन सरकार ने मंत्री विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति नहीं दी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने गेंद दे राज्यपाल के पाले में डाल दिया है और अब राज्यपाल ने कैबिनेट के फैसले पर मुहर लगा दी है। इससे साफ है कि शाह की बलि लेकर कांग्रेस को बीजेपी विजय होने नहीं देना चाहती है। आइए समझते हैं इसके पीछे का गणित क्या है...

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The BJP will not hand the Congress a 'victory' by sacrificing 'Shah'; what, after all, is the government's com
मंत्री विजय शाह - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मंत्री विजय शाह के खिलाफ अभियोजन नहीं चलाने के सरकार के फैसले को लेकर चर्चा भी तेज हो गई हैं। सवाल यह है कि आखिर सरकार ने शाह के मामले में अभियोजन की मंजूरी नहीं देने का फैसला क्यों किया? इसके पीछे कानूनी तर्क अपनी जगह हैं, लेकिन राजनीतिक तौर पर देखें तो विजय शाह भाजपा के लिए सिर्फ एक मंत्री नहीं, बल्कि आदिवासी राजनीति का बड़ा चेहरा भी हैं। ऐसे में उनके खिलाफ कार्रवाई का असर केवल एक मंत्री तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पार्टी की राजनीतिक छवि और आदिवासी समाज के बीच दिए जाने वाले संदेश से भी जुड़ता है।
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मध्य प्रदेश में आदिवासी मतदाता चुनावी राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विधानसभा की 230 सीटों में 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में इन 47 सीटों में कांग्रेस ने 30 और भाजपा ने 16 सीटें जीती थीं और भाजपा को सत्ता से बेदखल कर दिया। 2023 में भाजपा ने अपनी स्थिति में सुधार करते हुए 24 एसटी सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को 22 सीटें मिलीं और एक सीट भारत आदिवासी पार्टी के खाते में गई।
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आदिवासी वोट बैंक पर भाजपा की नजर
मध्य प्रदेश की कुल आबादी का करीब 22 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति वर्ग की हैं। 2018 के चुनाव में आदिवासी सीटों पर मिली करारी शिकस्त के बाद भाजपा ने लगातार आदिवासी समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की। आदिवासी नायकों और प्रतीकों को लेकर कार्यक्रमों से लेकर राजनीतिक अभियानों तक भाजपा ने इस वर्ग पर खास फोकस किया है। 2023 के चुनाव में भी पार्टी ने एसटी सीटों पर अपना प्रदर्शन बेहतर किया। मंत्री शाह इसी वर्ग से आते हैं। शाह हरसूद विधानसभा सीट से लगातार आठ चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने पहली बार 1990 में विधानसभा चुनाव जीता था और 1990 से 2023 तक हर चुनाव में हरसूद से विजयी रहे हैं। वे वर्तमान में भी इसी सीट से विधायक और राज्य सरकार में मंत्री हैं। 

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लंबे समय से भाजपा का आदिवासी चेहरा
विजय शाह का राजनीतिक सफर तीन दशक लंबा है। खंडवा जिले की  हरसूद एसटी आरक्षित सीट पर लगातार जीत ने उन्हें भाजपा के सबसे प्रभावशाली आदिवासी नेताओं में शामिल किया है। वे शिवराज सिंह चौहान सरकार में भी कई महत्वपूर्ण विभाग संभाल चुके हैं और  दिसंबर 2023 से मोहन यादव सरकार में मंत्री हैं। जानकारों का कहना हैं कि  शाह के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का राजनीतिक असर केवल एक मंत्री तक सीमित नहीं माना जा सकता। भाजपा के सामने एक तरफ विवादित बयान पर कार्रवाई का सवाल है तो दूसरी तरफ आदिवासी समाज में अपने प्रमुख चेहरे को लेकर राजनीतिक संदेश का सवाल भी है। 

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माफी को आधार मान सरकार ने लिया फैसला 
विजय शाह के मामले में सरकार के सामने शुरुआत से ही दोहरी चुनौती रही है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट अभियोजन मंजूरी में देरी को लेकर सरकार से जवाब मांगता रहा है। दूसरी तरफ शाह के राजनीतिक कद और आदिवासी राजनीति में उनकी उपयोगिता को नजरअंदाज करना भाजपा के लिए आसान नहीं है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन मंजूरी में देरी पर सरकार को फटकार लगाते हुए निर्णय लेने को कहा था। इसके बाद सरकार ने उनके विवादित बयान पर माफी मांग लेने के चलेते अभियोजन नहीं चलाने का रास्ता चुना हैं।  

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कांग्रेस लगातार बना रही दबाव
वहीं कांग्रेस इस मुद्दे को हाथ से जाने देने के मूड में नहीं है। पार्टी लगातार विजय शाह को मंत्री पद से हटाने और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग करती रही है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार राजनीतिक कारणों से शाह को संरक्षण दे रही है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की ओर से राज्यपाल के समक्ष भी विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति देने की मांग उठाई गई है।  
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