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एमपी: रिटायर्ड आईपीएस रघुवीर सिंह मीणा पर धोखाधड़ी का केस, फर्जी एसटी प्रमाण-पत्र से नौकरी पाने का आरोप

Sat, 19 Sep 2026 05:29 PM IST
भोपाल ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: भोपाल ब्यूरो Updated Sat, 19 Sep 2026 05:29 PM IST
सार

रिटायर्ड आईपीएस और गुना जिला पंचायत सदस्य रघुवीर सिंह मीणा पर शुक्रवार रात धोखाधड़ी और एससी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ। उन पर फर्जी एसटी प्रमाण-पत्र से पीएससी में चयन और नौकरी पाने का आरोप है। मीणा ने आरोपों को गलत बताया है।

 

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MP: Fraud case registered against retired IPS officer Raghuvir Singh Meena.
रघुवीर सिंह मीणा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्यप्रदेश कैडर के सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी और गुना जिला पंचायत सदस्य रघुवीर सिंह मीणा के खिलाफ धोखाधड़ी और एससी-एसटी एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है। पुलिस मुख्यालय की सतर्कता शाखा की जांच के बाद शुक्रवार रात केस दर्ज किया गया। मीणा पर फर्जी जाति प्रमाण-पत्र के आधार पर अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग से पीएससी में चयनित होकर पुलिस अधिकारी और बाद में आईपीएस बनने का आरोप है।
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नौकरी के दौरान उनके जाति प्रमाण-पत्र की वैधता को लेकर जांच अलग-अलग स्तर पर लंबित रही। शासन स्तर पर गठित उच्च स्तरीय छानबीन समिति संबंधित जाति प्रमाण-पत्र को पहले ही अमान्य घोषित कर चुकी है। सेवानिवृत्ति के बाद पुलिस मुख्यालय की सतर्कता शाखा ने जांच पूरी कर अब आपराधिक प्रकरण दर्ज कराया है। रघुवीर सिंह मीणा मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले बताए जाते हैं। वे वर्तमान में गुना जिला पंचायत के सदस्य हैं। उनकी पत्नी ममता मीणा वर्ष 2013 से 2018 तक गुना जिले की चाचौड़ा विधानसभा सीट से भाजपा विधायक रह चुकी हैं।
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शिकायत से शुरू हुई जांच, विजिलेंस ने दर्ज किया केस
पुलिस के मुताबिक, राघौगढ़, गुना निवासी हरवीर सिंह रघुवंशी ने रघुवीर सिंह मीणा के खिलाफ शिकायत की थी। शिकायत में उनके अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंधित होने और आरक्षण का लाभ लेने पर सवाल उठाए गए थे। पुलिस मुख्यालय की सतर्कता शाखा ने शिकायत की जांच की। जांच में सामने आए तथ्यों और शासन स्तर पर हुई पूर्व जांच के आधार पर अब आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया है। मीणा वर्ष 1986 में डीएसपी के पद पर भर्ती हुए थे। वर्ष 2002 में उन्हें आईपीएस अवॉर्ड हुआ था। पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि उनके द्वारा प्रस्तुत जाति प्रमाण-पत्र किस आधार पर जारी हुआ और उसे जारी करने की प्रक्रिया में निर्धारित नियमों व दस्तावेजों का पालन किया गया था या नहीं।
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1984 में विदिशा से जारी हुआ था एसटी प्रमाण-पत्र
प्रकरण का अहम बिंदु वर्ष 1984 में जारी अनुसूचित जनजाति प्रमाण-पत्र है। मीणा के पक्ष में विदिशा जिले से एसटी प्रमाण-पत्र जारी किया गया था। बाद में इसकी वैधता को लेकर शिकायत हुई और मामला शासन स्तर पर गठित अनुसूचित जनजाति संदेहास्पद जाति प्रमाण-पत्र उच्च स्तरीय छानबीन समिति के सामने पहुंचा। समिति ने उपलब्ध दस्तावेजों और तथ्यों की जांच के बाद वर्ष 1984 में क्षेत्र संयोजक, आदिम जाति कल्याण, विदिशा द्वारा जारी एसटी जाति प्रमाण-पत्र को अमान्य घोषित किए जाने की जानकारी सामने आई है। जांच के दौरान मीणा के मूल निवासी होने से जुड़े दस्तावेजों और तथ्यों को लेकर भी सवाल उठे। यही बिंदु अब विजिलेंस की जांच का अहम हिस्सा हैं।

शिक्षक की नौकरी में ओबीसी, बाद में एसटी का दावा क्यों?
पुलिस में आने से पहले रघुवीर सिंह मीणा शासकीय शिक्षक के रूप में कार्यरत थे। उस दौरान उन्होंने खुद को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अभ्यर्थी के रूप में प्रस्तुत किया था। बाद में एसटी वर्ग का प्रमाण-पत्र लगाकर पीएससी परीक्षा पास की। पुलिस अब अलग-अलग सरकारी सेवाओं और प्रक्रियाओं में उनके द्वारा प्रस्तुत जाति संबंधी दस्तावेजों का मिलान कर रही है। साथ ही यह भी जांचा जा रहा है कि वर्ष 1984 में एसटी प्रमाण-पत्र हासिल करने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज लगाए गए थे और प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी या नहीं।


2009 में विजिलेंस ने की थी शिकायत
पुलिस महानिरीक्षक विजिलेंस ने वर्ष 2009 में शासन स्तर पर गठित छानबीन समिति के समक्ष शिकायत की थी कि रघुवीर सिंह मीणा अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंधित नहीं हैं। इसके बाद मामले की जांच चली। वर्ष 2016 में गठित समिति ने भी शिकायत को सही ठहराया था। समिति की जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर जाति प्रमाण-पत्र को लेकर आपत्ति कायम रही। अब इसी पुराने विवाद से जुड़े तथ्यों के आधार पर सतर्कता शाखा ने शुक्रवार रात आपराधिक प्रकरण दर्ज किया है।

हाई कोर्ट में मामला विचाराधीन : मीणा
केस दर्ज होने को लेकर रघुवीर सिंह मीणा ने कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप सही नहीं हैं। उनका मामला हाई कोर्ट की डबल बेंच में विचाराधीन है। ऐसे में जाति प्रमाण-पत्र और उससे जुड़े विवाद पर अंतिम न्यायिक स्थिति अदालत के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।
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