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माह ए रमजान: जानिए किन पांच बुनियाद पर टिका इस्लाम, रमजान महीने में पूरे होते हैं तीन उसूल
Sat, 01 Mar 2025 11:24 PM IST
भोपाल ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: भोपाल ब्यूरो
Updated Sat, 01 Mar 2025 11:24 PM IST
सार
Ramadan 2025: माह ए रमजान वैसे तो कई मायनों में बाकी महीनों से अलग और खास माना जाता है, लेकिन इसकी विशेषता यह भी है कि यह इकलौता महीना है, जिसमें एक साथ तय इस्लामी पांच बुनियाद में से चार का पालन करता है।
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माह ए रमजान
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दुनिया की 20% से ज्यादा आबादी मुसलमान है, जो इस्लामी अकीदत (आस्था) का पालन करने वाले लोग हैं। अरबी में इस्लाम का मतलब है फरमा बरदारी (आज्ञा पालन), खास तौर पर एक ईश्वर (अल्लाह) के प्रति। जो लोग एक अल्लाह के प्रति समर्पण करते हैं, उन्हें मुसलमान कहा जाता है। मुसलमान इस्लाम के पांच स्तंभ कहे जाने वाले नियमित धार्मिक कर्तव्यों के ज़रिए अपने विश्वास को मज़बूत करते हैं : शहादत (गवाही), नमाज, ज़कात, रोजा और हज। इस्लाम के ये पांच स्तंभ दुनियाभर के अकीदतमंदों को भाईचारे में एकजुट करने के लिए हैं।
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यह हैं इस्लाम के बुनियादी उसूल
तौहीद (कलमा पढ़ना), नमाज अदा करना, रोजा रखना, जकात अदा करना और हज करना। तौहीद का मतलब है, अल्लाह को एक मानना। उसकी जात में किसी दूसरे को शरीक न करना। साथ ही अल्लाह के नबी को आखिरी पैगंबर मानना। आखिरी किताब कुरान-ए-पाक है। वहीं हर मुसलमान मर्द और औरत पर पांच वक्त की नमाज फर्ज है। इसके बाद रोजा फर्ज है, जिसे चांद के ऐतबार से रमजान महीने के 29 या 30 दिन रखने का हुक्म है। जकात हर उस मुस्लिम पर फर्ज है, जिसके पास साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोले चांदी या फिर इनके बराबर रकम हो, उसे भी पूरा एक साल हो चुका हो तो हर आदमी पर जकात फर्ज हो जाती है। मुसलमान पर जिंदगी में सिर्फ एक बार हज करना फर्ज है। हालांकि, शर्त यह है कि हज पर जाने वाले के पास इतना पैसा हो कि वह हज के दौरान रहन-सहन, आने-जाने का खर्च उठा सके।
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चार उसूलों की पाबंदी वाला महीना रमजान
माह ए रमजान वैसे तो कई मायनों में बाकी महीनों से अलग और खास माना जाता है, लेकिन इसकी विशेषता यह भी है कि यह इकलौता महीना है, जिसमें एक साथ तय इस्लामी पांच बुनियाद में से चार का पालन करता है। नमाज, रोजा और जकात। आमतौर पर नमाज हर मर्द औरत के लिए दिन में पांच बार फर्ज है, लेकिन माह ए रमजान में इसका सवाब (पुण्य) और महत्व आम दिनों से बहुत ज्यादा है। साथ ही कुछ अतिरिक्त नमाजें भी इस माह ए खास के लिए मुकर्रर (निर्धारित) की गई हैं। इसके अलावा जकात की अदायगी और रोजे रखने की कवायद भी इसी माह में पूरी की जाती है। इस्लाम के पहले उसूल शहादत का पालन स्वतः ही इस माह में इसलिए हो जाता है कि बिना अल्लाह और उसके पैगम्बर पर ईमान लाए कोई भी अकीदत पूरी होना मुमकिन ही नहीं है।
रोजे के लिए हदीस
जब रोज़ादार अपने रब से मिलेगा तो वह अपने रोज़े पर बहुत खुश होगा, जब वह उसके बदले में मिलने वाले इनाम को देखेगा और उस रोज़े की स्वीकृति का परिणाम देखेगा, जिसे अल्लाह ने उसे रखने की अनुमति दी है। जहाँ तक रोज़ा खोलने की खुशी का सवाल है, तो वह इसलिए है कि उसने अपनी इबादत पूरी कर ली है और उसे सही सलामत रखा है और ऐसी किसी चीज़ से दूर रखा है जो उसे बातिल कर सकती है, और वह किसी ऐसी चीज़ से बच गया है जिसकी ओर उसका झुकाव था। यह एक ऐसी खुशी है जो प्रशंसनीय है क्योंकि यह अल्लाह की आज्ञा का पालन करने और रोज़ा पूरा करने की खुशी है जिसके लिए सवाब का वादा किया गया है, जैसा कि अल्लाह ने कहा है: कह दो, "अल्लाह के अनुग्रह और उसकी दया से उन्हें प्रसन्न होना चाहिए।"
वक्त : सेहरी और इफ्तार
- इफ्तार (2 मार्च) शाम 6.29 बजे
- सेहरी (3 मार्च) सुबह 5.02 बजे
