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Bhopal: भोपाल में जुटीं देशभर की महिला साहित्यकार,मंत्री बोलीं-मोबाइल के जमाने में पढ़ना लिखना हो रहा प्रभावित
Sun, 05 Jan 2025 06:49 PM IST
संदीप तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: संदीप तिवारी
Updated Sun, 05 Jan 2025 06:49 PM IST
सार
भोपाल में देश भर से आईं महिला साहित्यकारों का सम्मेलन हुआ। मंत्री निर्मला भूरिया ने कहा स्मार्टफोन के जमाने में पढ़ना-लिखना प्रभावित हो रहा है ऐसे में साहित्य सम्मेलन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
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महिला साहित्यकारों का सम्मेलन
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
राजधानी भोपाल में रविवार को देशभर से आई महिला साहित्यकारों का सम्मेलन किया गया जिसमें महिला बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया भी शामिल हुईं। उन्होंने इस दौरान कहा कि आदिकाल से ही भारत में विदुषी महिलाओं के द्वारा किए गए लेखन ने परचम फहराया है। ऋग्वेद में 27 महिला साहित्यकारों का जिक्र है। कई मौके आए हैं जब महिला साहित्यकारों ने बड़े-बड़े महानुभावों को निरुत्तर कर दिया। आज भी महिला साहित्यकार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।मंत्री निर्मला भूरिया ने कहा कि आज स्मार्टफोन के जमाने में जब पढ़ना-लिखना प्रभावित हो रहा है ऐसे में साहित्य सम्मेलन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य मनोरंजन नहीं करता, यह जीवन में परिवर्तन लाता है। हमारे साहित्य में विश्वबंधुत्व की झलक मिलती है।
बाल साहित्य सम्मेलन भी करें
मंत्री भूरिया ने सलाह देते हुए कहा कि जिस प्रकार महिला सम्मेलन किया गया है। वैसे ही बाल साहित्य सम्मेलन किया जा सकता है। इससे बच्चों में राष्ट्रीय साहित्य के प्रति जागरूकता बढ़ेगी। आज ऐसा साहित्य लिखने की। जरूरत है जिसमें भारतीय गौरव की झलक दिखनी चाहिए। मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव भी महिलाओं और बच्चों को शिक्षा के प्रति आगे बढ़ाने के लिए कई जानकारी कार्य कर रहे हैं।
विचार आएंगे-जायेंगे, साहित्य तत्व बचा रहेगा
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि साहित्य एक तरह का संवाद है, इसमें विमर्श चलते रहता है, लेकिन बंटने वाला विमर्श ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि आज साहित्य बाहरी देशों से प्रभावित हो रहा है। साहित्य का बंटवारा नहीं किया जाना चाहिए। प्रो. कुमुद शर्मा ने ने कहा कि जब तक हृदय धड़कते रहेगा, साहित्य लिखा जाते रहेगा, यही भारतीय दृष्टि है। उन्होंने कहा कि विचार आएंगे-जायेंगे, साहित्य का तत्व बचा रहेगा। उन्होंने कहा कि साहित्य आने वाले समाज के लिए पगडंडी तैयार करता है। आज दुनिया में भारतीय साहित्य का प्रभाव इस कदर बढ़ा है कि पश्चिमी देश भी नारीवाद की भारतीयता की तरफ लौट रहे हैं।
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एट्रोसिटी लिटरेचर को समझना होगा
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट यूनियन की पहली अध्यक्ष और ग्रेजुएशन करने वाली उडुपी की साहित्यकार रश्मि सावंत ने अपनी बात रखी। रश्मि ने कहा कि भारत के बाहर एट्रोसिटी लिटरेचर लिखा जा रहा है। इस साहित्य से ब्रिटिशर्स उन मानवीय कार्यों को जस्टिफाई करते हैं जो उन्होंने भारत और अन्य देशों में किए थे। रश्मि ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि जो बचपन से बहुत टैलेंटेड होते हैं, वही आगे जाते हैं। बल्कि वे लोग जीवन में आगे।बढ़ते हैं जो निरंतर प्रयास करते रहते हैं। जीवन में योग्यता ही नहीं, प्रयास ज्यादा महत्व रखते हैं।
बासुदेव कुटुंबकम्' की गौरवशाली परम्परा
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की प्रो. शशिकला ने कहा कि पश्चिमी देशों में जब लोग डिप्रेशन में जाने लगे तो वहां अध्ययन शुरू किया गया। स्टडी के परिणाम में ये बात आई कि अच्छे रिश्ते खुश रहने के लिए बहुत जरूरी हैं। लेकिन भारत में तो शास्त्रों में पहले से लिखा है 'बासुदेव कुटुंबकम्'। यह हमारे देश की गौरवशाली पारिवारिक परम्परा रही है। जिससे हमारे देश के सामाजिक मूल्य सबसे ऊपर हैं। यहां महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिला है। यही हमारी साहित्यिक सृष्टि, भारतीय दृष्टि है।
भाषा पर अधिकार बढ़ाना होगा
डॉ. साधना बलवटे ने कहा कि संस्कृत में सबसे अच्छा साहित्य मिलता है, हमें पढ़ना शुरू करना चाहिए। हमें भाषाओं पर अधिकार बढ़ाना चाहिए। कोई भी शुरुआत हमें घर से करनी होगी।प्रो. मनीषा बाजपेई ने बताया कि अर्चना प्रकाशन न्यास के बैनर तले आयोजित यह सम्मेलन 'महिलाओं का, महिलाओं के द्वारा, महिलाओं के लिए' किया गया। राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षण प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (NITTTR) में आयोजित इस सम्मेलन में देशभर की करीब 100 महिला साहित्यकार शामिल हुई थी। सम्मेलन की शुरुआत में अर्चना प्रकाशन न्यास की डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन भी किया गया, जिसमें न्यास के द्वारा की जा रही साहित्यिक गतिविधियों को प्रदर्शित किया गया। इस सम्मेलन में रश्मि सावंत, डॉ. मेधा पुरोहित, डॉ. साधना बलबटे, डॉ. आरती दुबे, प्रो. शशिकला, डॉ. सोनाली मिश्रा, डॉ कुमकुम गुप्ता, डॉ वंदना मिश्रा, सुनीता यादव, रक्षा दुबे, डॉ. निवेदिता शर्मा, डॉ. सविता सिंह भदौरिया मौजूद रहीं।
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बाल साहित्य सम्मेलन भी करें
मंत्री भूरिया ने सलाह देते हुए कहा कि जिस प्रकार महिला सम्मेलन किया गया है। वैसे ही बाल साहित्य सम्मेलन किया जा सकता है। इससे बच्चों में राष्ट्रीय साहित्य के प्रति जागरूकता बढ़ेगी। आज ऐसा साहित्य लिखने की। जरूरत है जिसमें भारतीय गौरव की झलक दिखनी चाहिए। मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव भी महिलाओं और बच्चों को शिक्षा के प्रति आगे बढ़ाने के लिए कई जानकारी कार्य कर रहे हैं।
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विचार आएंगे-जायेंगे, साहित्य तत्व बचा रहेगा
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि साहित्य एक तरह का संवाद है, इसमें विमर्श चलते रहता है, लेकिन बंटने वाला विमर्श ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि आज साहित्य बाहरी देशों से प्रभावित हो रहा है। साहित्य का बंटवारा नहीं किया जाना चाहिए। प्रो. कुमुद शर्मा ने ने कहा कि जब तक हृदय धड़कते रहेगा, साहित्य लिखा जाते रहेगा, यही भारतीय दृष्टि है। उन्होंने कहा कि विचार आएंगे-जायेंगे, साहित्य का तत्व बचा रहेगा। उन्होंने कहा कि साहित्य आने वाले समाज के लिए पगडंडी तैयार करता है। आज दुनिया में भारतीय साहित्य का प्रभाव इस कदर बढ़ा है कि पश्चिमी देश भी नारीवाद की भारतीयता की तरफ लौट रहे हैं।
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एट्रोसिटी लिटरेचर को समझना होगा
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट यूनियन की पहली अध्यक्ष और ग्रेजुएशन करने वाली उडुपी की साहित्यकार रश्मि सावंत ने अपनी बात रखी। रश्मि ने कहा कि भारत के बाहर एट्रोसिटी लिटरेचर लिखा जा रहा है। इस साहित्य से ब्रिटिशर्स उन मानवीय कार्यों को जस्टिफाई करते हैं जो उन्होंने भारत और अन्य देशों में किए थे। रश्मि ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि जो बचपन से बहुत टैलेंटेड होते हैं, वही आगे जाते हैं। बल्कि वे लोग जीवन में आगे।बढ़ते हैं जो निरंतर प्रयास करते रहते हैं। जीवन में योग्यता ही नहीं, प्रयास ज्यादा महत्व रखते हैं।
बासुदेव कुटुंबकम्' की गौरवशाली परम्परा
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की प्रो. शशिकला ने कहा कि पश्चिमी देशों में जब लोग डिप्रेशन में जाने लगे तो वहां अध्ययन शुरू किया गया। स्टडी के परिणाम में ये बात आई कि अच्छे रिश्ते खुश रहने के लिए बहुत जरूरी हैं। लेकिन भारत में तो शास्त्रों में पहले से लिखा है 'बासुदेव कुटुंबकम्'। यह हमारे देश की गौरवशाली पारिवारिक परम्परा रही है। जिससे हमारे देश के सामाजिक मूल्य सबसे ऊपर हैं। यहां महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिला है। यही हमारी साहित्यिक सृष्टि, भारतीय दृष्टि है।
भाषा पर अधिकार बढ़ाना होगा
डॉ. साधना बलवटे ने कहा कि संस्कृत में सबसे अच्छा साहित्य मिलता है, हमें पढ़ना शुरू करना चाहिए। हमें भाषाओं पर अधिकार बढ़ाना चाहिए। कोई भी शुरुआत हमें घर से करनी होगी।प्रो. मनीषा बाजपेई ने बताया कि अर्चना प्रकाशन न्यास के बैनर तले आयोजित यह सम्मेलन 'महिलाओं का, महिलाओं के द्वारा, महिलाओं के लिए' किया गया। राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षण प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (NITTTR) में आयोजित इस सम्मेलन में देशभर की करीब 100 महिला साहित्यकार शामिल हुई थी। सम्मेलन की शुरुआत में अर्चना प्रकाशन न्यास की डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन भी किया गया, जिसमें न्यास के द्वारा की जा रही साहित्यिक गतिविधियों को प्रदर्शित किया गया। इस सम्मेलन में रश्मि सावंत, डॉ. मेधा पुरोहित, डॉ. साधना बलबटे, डॉ. आरती दुबे, प्रो. शशिकला, डॉ. सोनाली मिश्रा, डॉ कुमकुम गुप्ता, डॉ वंदना मिश्रा, सुनीता यादव, रक्षा दुबे, डॉ. निवेदिता शर्मा, डॉ. सविता सिंह भदौरिया मौजूद रहीं।
