अमिताभ बच्चन ने बताया, विदेशों में भारत के बारे में क्या सुनकर उन्हें लगता है बुरा
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महानायक अमिताभ बच्चन का कहना है कि मैं जब विदेशों में जाता हूं तो लोग कहते हैं कि ये 'थर्ड वर्ल्ड' से हैं या एक विकासशील देश से हैं। ये मुझे बड़ा बुरा लगता है। मुझे पूरा भरोसा है कि मेरे जीते जी भारत एक दिन पहली दुनिया के देशों में शामिल होगा।
अमिताभ ने ये बातें एक निजी टीवी चैनल के कार्यक्रम में लखनऊ स्थित ताज में ये बातें कही। फिल्मों में उन्होंने अपनी सफलता पर कहा कि मैं आज जो कुछ भी हूं, वो लेखकों की वजह से ही हूं और फिल्मों का जो भी असर समाज पर पड़ता है वो लेखकों के कारण ही है। हम तो एक कलाकार के रूप में कैमरे के सामने दी गई स्क्रिप्ट के अनुसार परफॉर्म करते हैं।
अमिताभ ने बताया कि मैंने पोलियो उन्मूलन के लिए काम किया। हेपेटाइटिस बी व ट्यूबर कोलोसिस के लिए भी काम कर रहा हूं, क्योंकि मैं खुद भी इन बातों से पीड़ित रहा हूं। भारत के पर्यटन के लिए भी काम कर रहा हूं।
उन्होंने कहा कि आज मुझे इस बात की खुशी है कि भारत से पोलियो पूरी तरह खत्म हो चुका है, जबकि हमारे पड़ोसी देशों में अब भी इसका प्रभाव है।
मैं 25 प्रतिशत लीवर पर सर्ववाइव कर रहा हूं
अमिताभ ने बताया कि मैं हेपेटाइटिस बी व ट्यूबर कोलोसिस के लिए भी काम कर रहा हूं, क्यों कि मैं खुद भी इससे पीड़ित रहा हूं। उन्होंने बताया कि मेरा 75 प्रतिशत लीवर समाप्त हो चुका है, सिर्फ 25 प्रतिशत पर सर्वाइव कर रहा हू।
जब 1982 में मेरे साथ कुली का हादसा हुआ तो करीब 60 बोतल खून मुझे चढ़ाया गया। लगभग 200 लोगों ने रक्तदान किया था। इन्हीं में से एक को हेपेटाइटिस था, जिसका पता मुझे 25-30 साल बाद लगा। तब तक वायरस मेरे लीवर को बुरी तरह प्रभावित कर चुका था। ऐसे में मैं लोगों के सामने एक उदाहरण बनना चाहता हूं।
फिल्मों में बढ़ी है महिलाओं की भूमिका
अमिताभ ने बताया कि अब फिल्मों में महिलाओं की भूमिका बढ़ी है। मैंने 1969 में फिल्मों में काम करना शुरू किया। उस समय फिल्म में सिर्फ दो ही महिलाएं होती थीं, एक हीरोइन और दूसरी हीरो की मां, पर अब कैमरा पर्सन से लेकर डायरेक्टर तक और कई भूमिकाओं में महिलाएं होती हैं, ये एक बड़ा बदलाव आया है।
अमिताभ के अनुसार, जब लोग हॉल में फिल्म देखने जाते हैं तो कोई किसी से जाति नहीं पूछता, क्षेत्र नहीं पूछता। फिल्म के सीन के प्रभाव में आकर लोग रोते हैं, हंसते हैं, गाने गुनगुनाते हैं। ये हिंदी सिनेमा का ही प्रभाव है जो लोगों को एक जगह लाता है।