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संभल कर खाएं एंटीबॉयोटिक, सेप्सिस का खतरा, हार्ट अटैक व कैंसर के बाद सेप्सिस से सबसे ज्यादा मौतें
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लखनऊ। एंटीबॉयोटिक दवाओं के इस्तेमाल के लिए गाइड लाइन बहुत जरूरी है। खुद व कई बार डॉक्टरों के परामर्श पर अनावश्यक रूप से एंटीबॉयोटिक दवाओं का सेवन घातक हो सकता है। यह शारीरिक रूप से कमजोर बनाती हैं। इस पर रोक न लगी तो आने वाले समय में मरीजों की मौत की सबसे बड़ी वजह सेप्सिस होगी। अधिक एंटीबॉयोटिक दवाओं के सेवन यह बीमारी होती है। यह जानकारी केजीएमयू पल्मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन के विभागाध्यक्ष प्रो. वेद प्रकाश ने रविवार को विश्व सेप्सिस दिवस की पूर्व संध्या पर दी।
उन्होंने बताया कि हार्ट अटैक और कैंसर के बाद सेप्सिस से सबसे अधिक मौतें होती हैं। यदि लापरवाही जारी रही तो वर्ष 2050 तक सेप्सिस तीसरे पायदान से पहले पर आ जाएगा। उन्होंने कहा कि आईसीयू में भर्ती मरीजों की गंभीरता की एक बड़ी वजह सेप्सिस होती है। आईसीयू के 60 से 70 प्रतिशत मरीजों को सेप्सिस की समस्या होती है। इनमें 35 प्रतिशत को रेस्पिरेटरी सेप्सिस तथा 25 फीसदी में यूरोसेप्सिस होता है। शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द होने पर लोग एंटीबॉयोटिक व दर्द निवारक दवाएं ले लेते हैं। कई बार तो समस्या बढ़ने पर डाक्टर ही उन्हें यह दवाएं लिख देते हैं। यह मरीज के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षित डाक्टर के परामर्श पर ही दवाएं लें और डॉक्टर जितने दिन की दवा लिखे उतने दिन ही खाएं। खुद से दवा लेकर न खाएं। बीमारी के दौरान दवा का एक निर्धारित कोर्स होता है कम दिन दवाएं लेने पर बीमारी के वायरस या बैक्टीरिया शरीर में रजिस्टेंस विकसित कर लेते हैं। दोबारा वही रोग होने पर दवाएं काम नहीं आतीं। डॉ. बीएन प्रसाद ने कहा कि अस्पतालों में गंदगी अथवा सर्जिकल उपकरणों में संक्रमण के कारण भी सेप्सिस हो सकता है।
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उन्होंने बताया कि हार्ट अटैक और कैंसर के बाद सेप्सिस से सबसे अधिक मौतें होती हैं। यदि लापरवाही जारी रही तो वर्ष 2050 तक सेप्सिस तीसरे पायदान से पहले पर आ जाएगा। उन्होंने कहा कि आईसीयू में भर्ती मरीजों की गंभीरता की एक बड़ी वजह सेप्सिस होती है। आईसीयू के 60 से 70 प्रतिशत मरीजों को सेप्सिस की समस्या होती है। इनमें 35 प्रतिशत को रेस्पिरेटरी सेप्सिस तथा 25 फीसदी में यूरोसेप्सिस होता है। शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द होने पर लोग एंटीबॉयोटिक व दर्द निवारक दवाएं ले लेते हैं। कई बार तो समस्या बढ़ने पर डाक्टर ही उन्हें यह दवाएं लिख देते हैं। यह मरीज के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षित डाक्टर के परामर्श पर ही दवाएं लें और डॉक्टर जितने दिन की दवा लिखे उतने दिन ही खाएं। खुद से दवा लेकर न खाएं। बीमारी के दौरान दवा का एक निर्धारित कोर्स होता है कम दिन दवाएं लेने पर बीमारी के वायरस या बैक्टीरिया शरीर में रजिस्टेंस विकसित कर लेते हैं। दोबारा वही रोग होने पर दवाएं काम नहीं आतीं। डॉ. बीएन प्रसाद ने कहा कि अस्पतालों में गंदगी अथवा सर्जिकल उपकरणों में संक्रमण के कारण भी सेप्सिस हो सकता है।
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