इन महिलाओं ने सत्ता के नशे में चूर बाहुबलियों को सिखाया कड़ा सबक
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राजनीति में बाहुबली कहा जाने वाला कोई शख्स यदि किसी की हत्या करा दे तो कोई सामान्य परिवार भला क्या कर सकता है? कानून की नजर में हर अपराधी, अपराधी है लेकिन आम जनमानस मानता है कि यह किताबी बात है। मगर प्रदेश के कुछ परिवारों ने अपने जज्बे से यह सोच बदली है।
अपने परिवारीजन की मौत पर वे चुप नहीं बैठे, लंबा संघर्ष किया और दोषियों को गिरफ्तार कराया, उम्रकैद की सजा दिलवाई। खास बात यह कि ऐसा इन परिवार की महिलाओं ने किया। कोई मृतक की मां है तो कोई बहन। शक्ति का दूसरा नाम बनी हैं ये महिलाएं। पत्नी सारा की हत्या का आरोप झेल रहा सपा नेता अमनमणि त्रिपाठी शुक्रवार रात गिरफ्तार हुआ तो इसके पीछे सारा की मां सीमा सिंह का संघर्ष था।
2003 में कवयित्री मधुमिता हत्याकांड में अमनमणि के पिता अमरमणि त्रिपाठी और मां मधुमणि को उम्रकैद की सजा दिलवा चुकी निधि शुक्ला और 2008 में पीडब्ल्यूडी इंजीनियर मनोज गुप्ता हत्याकांड में बसपा विधायक शेखर तिवारी को उम्रकैद की सजा दिलवा चुकी शशि गुप्ता भी ऐसी ही महिलाएं हैं। ‘अमर उजाला’ ने इनसे बात कर उनकेसंघर्ष की राह को समझने का प्रयास किया।
लोग कहते थे पैसे के लिए लड़ रही हूं, धिक्कार है ऐसा सोचूं भी
‘मैं अपनी बेटी सारा को हर समय अपनी आंखों के सामने उसके आखिरी क्षणों में देखती हूं। मुझे पता है, उसे बहुत दर्दनाक ढंग से मारा गया। मुझे यह बात एक पल भी शांति से बैठने नहीं देती।’
सपा नेता अमरमणि के बेटे अमनमणि की गिरफ्तारी के लिए लगातार जूझने वाली सीमा सिंह बताती हैं कि इस संघर्ष पीछे उनकी बेटी की मौत के जिम्मेदारों को सजा दिलाने का जज्बा रहा है। उन्होंने बताया कि अगर समाज के कुछ लोगों से उन्हें नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलती तो यह संघर्ष और आसान होता। बताती हैं- पिछले करीब डेढ़ वर्ष में यह भी कहा गया कि वह राजनीति में आना चाहती हैं, इसलिए अपनी बेटी की हत्या को भुना रही हैं।
सीमा सिंह तीखे स्वर में कहती हैं, ‘धिक्कार है उस मां पर जो अपनी बेटी की हत्या के बाद चुप बैठ जाए। अगर वो अपनी बेटी को न्याय न दिला सके तो उसे अपनी बेटी को याद करने का भी अधिकार नहीं।’ कुछ लोगों को भले ही उनके संघर्ष में राजनीतिक साजिश नजर आए लेकिन वह बेटी सारा को कभी भूल नहीं पाई हैं।
बताती हैं- अमनमणि अक्सर अपने खर्च के लिए सारा के जरिए पैसे मांगा करता था। वह दो साल पहले की एक घटना याद करती हैं। अमनमणि को मोबाइल फोन खरीदना था और उसके पास पैसे नहीं थे। तब खुद मैंने उसे रुपये दिए थे। वह नहीं जानती थीं कि अमनमणि की वजह से अपनी बेटी से हमेशा के लिए दूर हो जाएंगी।
इतना सब होने पर भी जब वह संघर्ष के लिए साहस बटोर रही थीं, तब उन्हें सुनने को मिला कि वह त्रिपाठी परिवार से पैसा वसूलना चाहती हैं। सीमा कहती हैं, ऐसा कहने वालों की कमी नहीं लेकिन क्या ये लोग बता सकते हैं कि कितना पैसा अपनी बेटी खो चुकी एक मां के दुख को कम या खत्म कर सकता है?
यह है घटनाक्रम
अमनमणि के अनुसार, फीरोजाबाद में एक मोटरसाइकिल सवार के अचानक सामने आने पर उन्होंने तेजी से गाड़ी मोड़ी। तभी एक्सीडेंट हुआ और सारा की मौत हो गई। सारा की मां सीमा सिंह ने अपनी बेटी की हत्या का अंदेशा जताया।
बाद में सीबीआई ने जांच शुरू की। 25 नवंबर 2016 को अमनमणि को पूछताछ के लिए दिल्ली में सीबीआई मुख्यालय बुलाया गया, जहां उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
धमकियों पर हम ध्यान नहीं देते : निधि शुक्ला
निधि ने बताया कि उन्हें नहीं पता कि उनमें इस पूरे संघर्ष के लिए साहस कहां से आया। केवल इतना जानती हैं कि वह स्टूडेंट थीं जब उनकी बहन की हत्या की गई। बहन भले ही जीवित न हों, पर वह उन्हें इंसाफ दिलाना चाहती थीं। कई बार आरोपियों की ओर से उन्हें धमकियां देकर चुप रहने को कहा गया।
लेकिन वह कहती हैं- ‘वे लोग क्रिमिनल हैं, वे पहले क्राइम करते हैं और फिर जिसके साथ गलत हुआ उसे चुप रहने के लिए कहते हैं। लेकिन हम अब धमकियों पर ध्यान नहीं देते। हमें आदत पड़ चुकी है।’ क्या अब भी धमकियां मिलती हैं? पूछने पर निधि बताती हैं कि क्यों नहीं मिलेंगी?
सभी जानते हैं कि अमरमणि त्रिपाठी के लिए जेल में रहकर कुछ भी करवाना मुश्किल नहीं है। प्रदेश सरकार के एक कैबिनेट मंत्री तक जेल में जाकर उनसे मुलाकात करते हैं तो समझा जा सकता है कि किस तरह के अपराधी से उनका पाला पड़ा है। मगर निधि इसकी परवाह नहीं करतीं। कहती हैं, ‘सपा अमरमणि के बेटे अमनमणि को नेता बनाने जा रही है लेकिन गिरफ्तारी के बाद शायद मुख्यमंत्री ऐसा नहीं होने दें। सीएम कुछ अलग छवि के लिए जाने जाते हैं।’
लोगों ने कहा था, ‘ऐसे लोगों को सजा नहीं होती’
निधि बताती हैं- जब हमारा संघर्ष शुरू हुआ तो हमारे कई परिचित कहते थे कि अमरमणि जैसे लोगों को सजा नहीं दिलाई जा सकती। वे अपराध करते हैं और नेता बने रहते हैं।
हमलोग न एमपी-एमएलए हैं, न ऐसे किसी रसूखदार परिवार से आते हैं। इन बातों से निधि को लगता था कि शायद वह कुछ ऐसा करना चाह रही हैं जो नामुमकिन है। लेकिन समाज और मीडिया ने उन्हें सपोर्ट किया। इसी वजह से उनका डर मिट गया।
अब दूसरों को दे रहीं कानूनी मदद
करीब 10 साल के कानूनी संघर्ष के बाद मृत बहन को न्याय दिला चुकीं निधि ने बताया कि उन्हें कोर्ट-कचहरी के कामों की काफी जानकारी हो गई है। अब वे दूसरे जरूरतमंद लोगों को कानूनी मदद दिलाने के लिए काम कर रही हैं। इसके लिए मधुमिता की स्मृति में ट्रस्ट बनाया है।
घटनाक्रम एक नजर में
उस समय वह सात महीने की गर्भवती थीं। मामले की जांच सीबीआई को दी गई, जिसने सितंबर 2003 में अमरमणि को गिरफ्तार किया। बाद में उसकी पत्नी मधुमणि को भी गिरफ्तार किया गया।
जेल में ही रहते हुए अमरमणि ने 2007 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय के रूप में महराजगंज की लक्ष्मीपुर सीट से जीत हासिल की। मार्च 2007 में मामले को देहरादून ट्रांसफर किया गया। 24 अक्टूबर 2007 को अमरमणि, मधुमणि और दो अन्य को उम्रकैद की सजा हुई।
जिन्होंने मेरे पति की हत्या की, उन्हें कैसे छोड़ देती : शशि गुप्ता
पीडब्ल्यूडी इंजीनियर मनोज गुप्ता हत्याकांड में उनकी पत्नी शशि गुप्ता ने आरोपी बसपा विधायक शेखर तिवारी, उसकी पत्नी विभा तिवारी सहित 10 लोगों को उम्रकैद दिलाने में कड़ा संघर्ष किया।
वह बताती हैं कि हर आरोपी का अलग वकील था, इस वजह से उन्हें हर बार गवाही और जिरह के लिए अलग-अलग वकील के सामने खड़ा होना पड़ता। एक-एक घंटे लगातार चलने वाली जिरह कई महीने चली। शशि कहती हैं, पुलिस ने शुरू में ठीक से चार्जशीट हीनहीं बनाई। सरकार के वकील केस हारने के नीयत से लड़ रहे थे।
आरोपी छोटी-छोटी बात पर हाईकोर्ट चले जाते, जिससे सुनवाई खिंचती चली गई। इस पूरे संघर्ष के दौरान कई लोग कहते कि उनके पति तो अब वापस नहीं आएंगे, फिर वे क्यों इस तरह संघर्ष कर रही हैं। शशि बताती हैं, किसी के परिवार का प्रिय व्यक्ति अगर उससे छीन लिया जाए तो वह परिवार भला कैसे चुप बैठ सकता है।
अगर हम घर बैठ जाते तो खुद को क्या जवाब देते? मेरा 21 साल के बेटा प्रतीश प्रांजल उस समय बंगलूरू में नौकरी करने लगा था, लेकिन वह काम छोड़कर लौट आया। किसी को उम्मीद नहीं थी कि हम केस लड़ सकेंगे, लेकिन हमारा मकसद केस लड़ना नहीं, दोषियों को सजा दिलाना था।
सारा की मां से कहूंगी, बेटी को न्याय दिलाने से पीछे न हटें
शशि गुप्ता सारा की मां सीमा सिंह के लिए संदेश देती हैं कि उन्हें अभी संघर्ष करना होगा लेकिन अपनी बेटी को न्याय दिलाने से पीछे नहीं हटें। शशि बताती हैं, ‘24 दिसंबर को मेरे पति की हत्या के आठ साल पूरे हो रहे हैं, और इन सब वर्षों में मैं कभी उन्हें भूल नहीं सकी हूं।’
वह मानती हैं कि अगर मनोज जीवित होते तो परिवार ज्यादा मजबूत होता। उनके ससुर नहीं हैं। 87 वर्ष के पिता एसडी गुप्ता साथ रहते हैं। परिवार कहता है कि उन्हें सुरक्षा की जरूरत नहीं है।
पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर और बीएचयू से पढ़े मनोज गुप्ता औरैया में तैनात थे। वहां उन्हें उनके घर से 23 दिसंबर 2008 को अगवा कर लिया गया और बाद में उनकी हत्या कर दी गई। यह घटना बसपा के तत्कालीन एमएलए शेखर तिवारी और नौ अन्य आरोपियों ने अंजाम दी।
इसकी वजह धन उगाही को माना जाता है। अपहरण के समय मनोज कुमार गुप्ता की पत्नी शशि भी घर में मौजूद थीं। इस मामले में करीब 22 महीने की सुनवाई के बाद 23 जनवरी 2009 को विशेष जज ने शेखर तिवारी और उसकी पत्नी विभा तिवारी सहित 10 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनवाई। 23 फरवरी 2015 को हाईकोर्ट ने यह निर्णय बरकरार रखा।