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योगी आदित्यनाथ ने विभागों के बंटवारे में कुछ मंत्रियों का क्यों घटाया पद, जाने यह सियासी गणित

Fri, 23 Aug 2019 12:15 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: Amulya Rastogi Updated Fri, 23 Aug 2019 12:15 PM IST
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why yogi adityanath decreases post of few minister, know this insight
नए मंत्रियों के साथ बैठक करते सीएम योगी - फोटो : amar ujala
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विभागों के बंटवारे में आरोपों से घिरे चेहरों के पर छांटकर न सिर्फ नए और पुराने मंत्रियों को चाल, चरित्र तथा चिंतन ठीक रखने की हिदायत दी है, बल्कि सुधरने का संदेश भी दिया है। कुछ मंत्रियों को पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण विभाग देकर यह भी समझाने की कोशिश की है कि ईमानदारी से काम करोगे तो उसका इनाम भी मिलेगा। हालांकि सवालों में आए कुछ चेहरे अब भी मंत्रिमंडल में हैं, लेकिन इन्हें सुधरने का संदेश दिया गया है। मंत्रिमंडल विस्तार की तरह विभागों के बंटवारे में भी सियासी गणित का ध्यान रखा गया है।
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अटकलों पर विराम लगाते हुए दोनों उपमुख्यमंत्रियों के पास पूर्ववत महत्वपूर्ण विभाग बरकरार रखते हुए इनके महत्व का संदेश दिया है। सुरेश खन्ना को संसदीय कार्य के साथ वित्त और चिकित्सा शिक्षा देकर इमानदारी से काम करने वालों को सम्मान देने का संदेश दिया गया है। स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री के रूप में परिणाम देने वाले सुरेश राणा, भूपेंद्र चौधरी, डॉ. महेंद्र सिंह जैसे चेहरों को कैबिनेट मंत्री बनाकर भी यही बताने की कोशिश की गई है कि साफ-सुथरी छवि से बेहतर भविष्य की गारंटी है।
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तबादलों में खेल, पर विभाग बचाने में हुए फेल

मुख्यमंत्री ने विस्तार से पहले ही आरोपों में घिरे कुछ चेहरों का त्यागपत्र लेकर यह संदेश दिया था कि  सरकार की छवि पर सवालों की वजह बनने वाले और नतीजा न दे पाने वाले चेहरों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।  समीकरणों या अन्य कुछ कारणों से नंद गोपाल नंदी, चेतन चौहान और सिद्धार्थनाथ सिंह ऐसे जो चेहरे बच गए थे उन्हें कम महत्वपूर्ण विभाग देकर सुधरने का संदेश देने की कोशिश की गई है।

इनमें नंदी और सिद्धार्थनाथ सिंह अन्य कामों के साथ विभागीय तबादलों को लेकर विवादों में थे। नंदी के स्टांप-रजिस्ट्रेशन विभाग में लगातार दो साल से नियम कानून ताक पर रखकर तबादले की कोशिश की जी रही थी, लेकिन मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से तबादले नहीं हो पाए। इस बार तो मुख्यमंत्री ने मंत्री द्वारा कराए गए 350 तबादले रद्द कर दिए थे। इनके हटाए जाने की अटकलें थीं, लेकिन पार्टी के एक केंद्रीय नेता के कारण वे कुर्सी तो बचा ले गए, लेकिन विभाग नहीं बचा पाए। 
 

स्वास्थ्य विभाग के तबादलों में महानिदेशालय में गोलीकांड की गूंज ने सरकार की छवि पर बड़ा सवाल खड़ा किया था। मंत्री द्वारा सीएमओ-सीएमएस के किए गए तबादले संचारी रोग अभियान का सहारा लेकर रोके गए तो फार्मेसिस्ट के तबादलों में भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों की जांच के लिए कमेटी तक बैठानी पड़ी।

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मंत्री के रहते इस कमेटी की रिपोर्ट पर कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही थी। इन सबके बावजूद सिद्धार्थनाथ ने अपनी सियासी विरासत के समीकरणों से कुर्सी तो बचा ली, लेकिन विभाग ये भी नहीं बचा पाए।  शिकायतें चेतन चौहान के खिलाफ भी खूब थीं। पर उनका बड़ा खिलाड़ी होने और सवालों में घिरे अन्य कुछ चेहरों के साथ बरती गई नरमी ने इन्हें भी बचा लिया। सहकारिता विभाग के कामकाज को लेकर भी जमकर सवाल उठे थे। कुर्सी जाने की अटकलें थीं, लेकिन कैबिनेट मंत्रियों में अकेले कुर्मी चेहरा होने से मुकुट बिहारी वर्मा की कुर्सी और विभाग दोनों बच गए।

दूसरी तरफ पहली बार मंत्रिमंडल में शामिल किए गए अशोक कटारिया,  रवींद्र जायसवाल, सतीश द्विवेदी, कपिलदेव अग्रवाल, अनिल शर्मा, चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय जैसे चेहरों को स्वतंत्र प्रभार या महत्वपूर्ण विभागों में बतौर राज्यमंत्री संबद्ध करके यह संदेश दिया गया है कि ईमानदारी और मेहनत से काम करने पर उन्हें और भी तरक्की दी जा सकती है।
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