राम मंदिर मुद्दे से यूपी की सियासत साध रही है भगवा सेना
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विवादित परिसर में राममंदिर निर्माण के लिए भक्तों से शिलादान अभियान में अभी कई पेंच हैं। श्रीरामजन्मभूमि न्यास ने सवा रुपये प्रतिव्यक्ति दान लेने के पुराने अभियान की जगह इसबार शिलादान लेने की घोषणा की है।
रणनीतिकार कहते हैं कि शिला कोई ऐसी-वैसी नहीं चाहिए, सिर्फ राजस्थान के वंशी पहाड़ का ही शिलाखंड राममंदिर निर्माण में प्रयुक्त हो सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि भक्त कैसे वंशी पहाड़ का शिलादान करने आगे आएंगे। जाहिर है कि कहीं न कहीं धन संग्रह के बाद ही शिलाएं खरीदकर प्रांत, मंडल, जिला या इलाका वार अयोध्या लाई जाएंगी।
विहिप और उससे जुड़े संत-धर्माचार्यों ने अप्रैल 1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में पहली धर्मसंसद कर ताला खुलवाने के जनजागरण का ऐलान किया था। इसी के लिए श्रीरामजानकी रथयात्रा निकाली, मगर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कार्यक्रम एक साल स्थगित हो गया।
अक्टूबर 1985 में पुन: रथयात्राएं शुरू हुई। इन रथ यात्राओं से हिन्दू समाज में ऐसा प्रबल उत्साह जगा कि फैजाबाद के जिला दंडाधिकारी ने 1 फ़रवरी 1986 को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के द्वार पर लगा ताला खोलने का आदेश दिया।
उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे वीर बहादुर सिंह और देश के प्रधानमंत्री थे राजीव गांधी। इसी के बाद से गुजरात के सुप्रसिद्ध मंदिर शिल्पकार चंद्रकांत भाई सोमपुरा द्वारा प्रस्तावित मंदिर का रेखाचित्र तैयार किया गया।
इस तरह विवादित ढांचे पर फहरा दिया भगवा
श्री चंद्रकांत के दादा पद्मश्री पी.ओ.सोमपुरा ने वर्तमान सोमनाथ मंदिर का प्रारूप भी बनाया था। जनवरी, 1989 में प्रयागराज में कुंभ मेले के पवित्र अवसर पर त्रिवेणी के किनारे विश्व हिन्दू परिषद् ने धर्म संसद का आयोजन किया। इसमें पूज्य देवरहा बाबा की उपस्थिति में तय किया गया कि देश के हर मंदिर- हर गांव में रामशिला पूजन कार्यक्रम आयोजित किया जाए।
पहली शिला का पूजन श्री बद्रीनाथ धाम में किया गया। देश और विदेश से ऐसी 2,75,000 रामशिलाएं अक्टूबर, 1989 के अंत तक अयोध्या पहुंच गईं। इस कार्यक्रम में 6 करोड़ लोगों ने भाग लिया। 9 नवम्बर 1989 को बिहार के वंचित वर्ग के एक बंधु श्री कामेश्वर चौपाल द्वारा शिलान्यास किया गया।
उस समय श्री नारायण दत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और प्रधानमंत्री थे राजीव गांधी। 24 जून 1990 को संतों ने देवोत्थान एकादशी (30 अक्टूबर 1990) से मंदिर निर्माण हेतु कारसेवा शुरू करने का आह्वान किया। अयोध्या में अरणि मंथन से एक ज्योति प्रज्ज्वलित की गई।
यह राम ज्योति देश भर में प्रत्येक हिन्दू घर में पहुंची और सबने मिलकर इस ज्योति से दीपावली मनाई। 30 अक्टूबर 1990 को हजारों रामभक्तों ने मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा खड़ी की गईं अनेक बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया और विवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया।
...और फिर बहुमत में आ गई सरकार
मामले में सरकार की सख्ती से ऐसा माहौल बना कि भाजपा के कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन 6 दिसम्बर 1992 के दिन रामभक्तों ने राम जन्मस्थान पर ढांचे को ध्वस्त कर दिया, जिसमें कल्याण सिंह सरकार चली गई मगर बहुमत से फिर आने में कोई रोक न सका।
अब एक बार फिर विहिप और संत-धर्माचार्यों ने मंदिर निर्माण के लिए शिलादान की योजना बनाई है। इसके कितने चरण और क्या-क्या पड़ाव होंगे, सब गोपनीय रखा गया है। मगर शिलादान की घोषणा विहिप सुप्रीमों व रामजन्मभूमि न्यास प्रमुख ट्रस्टी अशोक सिंहल के करने के साथ कई सवाल भक्तों के मन उठ रहे हैं।
पिछली बार की तरह सवा रुपये का दान न लेकर पत्थर दान अयोध्या में लेने की नई रणनीति में भक्त कैसे हिस्सा लें, सब जानना चाहते हैं। आखिरकार भक्त कैसा पत्थर दान दे सकते हैं? क्या कोई भी पत्थर कहीं से लेकर दान दिया जा सकता है? राममंदिर निर्माण में किस पत्थर की उपयोगिता होगी?
इस मामले में बुधवार को कारसेवकपुरम् में जुटे विहिप सुप्रीमों अशोक सिंहल, महामंत्री व कार्यशाला प्रमुख चंपत राय, पुरूषोत्तम सिंह आदि की टीम एक बात के लिए स्पष्ट दिखी कि पत्थर तो वही दान में लिया जाएगा, जिसकी उपयोगिता राममंदिर निर्माण में हो।
पहले तल के लिए राजस्थान के वंशी पहाड़ के पत्थरों के शिलाखंड तराशे गए हैं, दूसरे तल में भी यही पत्थर लगेगें। विहिप के रणनीतिकारों का मानना है कि पत्थर दान की पूरी रणनीति अभी बननी है। इसके बाद दानदाताओं को पूरी जानकारी दी जाएगी। लेकिन एक बात तय है कि इसबार धनसंग्रह करके न्यास शिलाखंड नहीं खरीदेगा। दान पत्थर का ही लिया जाएगा, वह भी वंशी पहाड़ के पत्थर का।
ली जाएंगी कच्ची शिलाएं
मामले पर विहिप के प्रांतीय प्रवक्ता शरद शर्मा का कहना है कि राममंदिर में प्रथम तल के लिए प्रयुक्त हो रहीं सवा लाख शिलाएं राजस्थान के वंशी पहाड़ से आई हैं। इसपर दानदाताओं से एकत्रित 8 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसबार दूसरे तल के निर्माण के लिए दान में वंशी पहाड़ की कच्ची शिलाएं ही दान में ली जाएंगी। इसे कार्यशाला में तराशा जाएगा।
अब शिलाएं कैसे दानदाता मंगाएंगे, सामूहिक धनराशि जुटाएंगे या क्या स्वरूप होगा, इसपर अभी रणनीति बन रही है। शिलाएं अयोध्या कैसे भक्त लेकर आएंगे, इसका भी कार्यक्रम तय होगा।
शिलादान के पीछे नई सियासत तो नहीं
राममंदिर निर्माण को लेकर विहिप, संघ व इससे जुड़े संत-धर्माचार्य हमेशा सियासत भी करते रहे हैं। पहले भी आंदोलनों से आमजनता को जोड़ ताकत दिखाई गई है, अब फिर से जनता को जोडने के लिए गांव-कस्बा से शहर-शहर शिलाएं एकत्रित कर उसे अयोध्या दान देने लाने के नाम पर आंदोलन गरमाने की रणनीति बन सकती है।
शिला को लेकर अयोध्या कूच का कार्यक्रम चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। सूत्रों का कहना है कि यूपी में विधानसभा चुनाव से पहले विहिप व संत-धर्माचार्य आंदोलन गरमाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
सपा सरकार यदि अयोध्या शिला लाने पर रोक लगाती है, तो विहिप को मन मांगी मुराद मिल जाएगी। कोशिश है कि सपा की छवि हिंदू विरोधी गढ़ी जाए, तो सूबे में भाजपा सरकार बनने में आसानी होगी।