यूं ही नहीं है सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस में दूरी, उल्टी गंगा नहीं बहाना चाहते माया-अखिलेश
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कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के उदय के साथ ही यूपी में कांग्रेस का जनाधार खिसकता चला गया। कांग्रेस इस स्थिति में पहुंच गई कि उसके पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। वहीं, सपा मुखिया अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती अब राहुल गांधी के साथ आकर जनाधार को उल्टी दिशा में खिसकने का खतरा मोल नहीं लेना चाहते। यही वजह है कि लाख कोशिशों के बावजूद भाजपा विरोधी सपा-बसपा और कांग्रेस एक छतरी के नीचे नहीं आ सकीं।
चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो कांग्रेस को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर में 1984 में यूपी में उतने मत (51.03 प्रतिशत) मिले थे, जितने राम लहर और मोदी लहर में भी भाजपा (क्रमश: 32.82 एवं 42.63 प्रतिशत) नहीं पा सकी। इसी दौरान 80 के दशक के मध्य में बसपा और 90 के दशक की शुरुआत में सपा का उदय हुआ।
ये दोनों क्षेत्रीय दल कांग्रेस और भाजपा के लिए उत्तरोत्तर चुनौती बनते गए। 1989 के लोकसभा चुनाव में बसपा चुनाव आयोग में पंजीकृत गैर मान्यता प्राप्त दल की श्रेणी में थी। इस चुनाव में बसपा को यूपी में 9.93 फीसदी मत मिले, जबकि कांग्रेस ने 31.77 फीसदी मत हासिल किए।
सपा के बैनर तले पहला लोकसभा चुनाव 1996 में लड़ा गया और उसने 20.84 प्रतिशत मत पाए। इस चुनाव में बसपा को भी 20.6 प्रतिशत मत मिले, जबकि कांग्रेस 1989 से 1996 के बीच के तीन चुनावों में क्रमश: 31.77 प्रतिशत, 18.02 प्रतिशत और 8.14 प्रतिशत पर पहुंच गई।
इस तरह बिखर गया कांग्रेस का वोट बैंक
इसके पीछे की वजह यह थी कि कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक मुसलमान सपा की ओर और अनुसूचित जाति व जनजाति मतदाता बसपा की ओर चले गए। कांग्रेस की हालत पतली हुई तो ब्राह्मण मतदाताओं के लिए भी इधर-उधर जाने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा।
नतीजतन, 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस यूपी में पूरी तरह से सिमट गई। सिर्फ अमेठी और रायबरेली अपवाद रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मत प्रतिशत के लिहाज से सपा-बसपा के पास खोने के लिए अब भी बहुत कुछ है। इसलिए दोनों ने कांग्रेस से दूरी बनाने का फैसला किया।
रणनीति के तहत ही कांग्रेस पर हमलावर हैं माया-अखिलेश
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मायावती और अखिलेश कांग्रेस में सोची-समझी रणनीति के तहत हमलावर हैं। मायावती देश में गरीबी के लिए कांग्रेस को भी जिम्मेदार ठहरा रही हैं। अखिलेश भी कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कह रहे हैं कि सामाजिक न्याय के बिना गरीबी मिटाने के प्रयास सफल नहीं हो सकते। इस हमले के पीछे की मुख्य वजह अपने-अपने वोट बैंक को छिटकने न देने की रणनीति ही है।
लोकसभा चुनावों में दलों को मिले मत प्रतिशत
वर्ष--कांग्रेस-- बसपा--सपा
1989--31.77--9.93--
1991--18.02--8.7--
1996--8.14--20.6--20.84
1998--6.02--20.9--28.7
1999--14.72--22.08--24.06
2004--12.04--24.67--26.64
2009--11.65--27.20--23.25
2014--7.53--19.77--22.35
(स्रोत : चुनाव आयोग)
ये कहते हैं विशेषज्ञ: महागठबंधन के अपने खतरे और शंकाएं
सपा-बसपा और कांग्रेस के संबंधों पर कोई टिप्पणी करने से पहले हमें तीन दशकों के चुनावी नतीजों पर नजर डालनी होगी। भाजपा ने तो सामाजिक न्याय की स्थिति का सटीक आकलन करके अपनी स्थिति ठीक कर ली, पर कांग्रेस आज तक यूपी में सपा-बसपा के चुनौती रूपी झटके से नहीं उबर सकी है। जैसे-जैसे ये दल बढ़े, कांग्रेस कम या ज्यादा अनुपात में नीचे जाती रही।
सपा-बसपा ने कांग्रेस के वोट बैंक में एक तरह से झाड़ू लगा दी। अब अगर सपा-बसपा इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ महागठबंधन में जातीं तो उनका आधार वोट कांग्रेस की तरफ झुकता। इस बात का खतरा दोनों दल अच्छी तरह से जानते हैं। साथ ही यह भी जानते हैं कि कांग्रेस के पास यूपी में खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। इसलिए महागठबंधन वजूद में नहीं आ सका।
-प्रो. एसी त्रिपाठी, राजनीतिक विश्लेषक एवं एसोसिएट प्रोफेसर, बरेली कॉलेज बरेली
गठबंधन से दोनों दलों को होगा फायदा
बसपा का मौजूदा वोट बैंक कांग्रेस का पंरपरागत वोट बैंक रहा है। कहीं यह वोट पुन: कांग्रेस की तरफ न झुक जाए, इसलिए मायावती ने कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया। पिछले विधानसभा व लोकसभा चुनाव के नतीजों से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को भी लग गया है कि बिना अन्य वर्गों को जोड़े काम नहीं चलेगा।
बसपा भी ऐसा ही सोच रही है, क्योंकि आज वह यूपी विधानसभा में खराब स्थिति में है, जबकि लोकसभा में सिफर है। मुस्लिम, यादव और अनुसूचित जाति व जनजाति के सहारे ये दोनों दल भाजपा को शिकस्त देने में जुटे हुए हैं। सपा-बसपा ने समझ लिया है कि अगर इन दोनों का आधार वोट अलग-अलग रहा तो वे कहीं की नहीं रहेंगी।
एक साथ आने से दोनों ही दलों को इसका फायदा मिलेगा। वहीं, कांग्रेस को साथ लेने का नुकसान भी उन्हें पता है, इसलिए इन दिनों सपा और बसपा अध्यक्ष, दोनों ही के निशाने पर कांग्रेस भी है।
-प्रो. आरपी पाठक, डीन, फैकल्टी ऑफ सोशल साइंस, बीएचयू