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'प्रयागराज' के सहारे बड़ा राजनीतिक गेम खेल रही भाजपा, महागठबंधन पर है निशाना

Wed, 17 Oct 2018 12:07 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 17 Oct 2018 12:07 PM IST
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why bjp changed the name of allahabad.

‘इलाहाबाद’ का नाम ‘प्रयागराज’ करके  योगी सरकार ने ‘सांस्कृतिक सरोकारों’ के सहारे हिंदुत्व के एजेंडे को धार देने की कोशिश की है। सरकार ने सांस्कृतिक एजेंडे पर काम और संकल्पों पर समर्पण का संदेश देने का प्रयास तो किया ही है, यह बताने की कोशिश भी की है कि भले ही कानूनी अड़चनों के कारण राममंदिर निर्माण पर केंद्र और राज्य सरकार बहुत आगे न बढ़ पा रही हो और संतों को स्पष्ट आश्वासन न दे पा रही हो लेकिन इसका मतलब आस्था से जुड़े सवालों को हल करने की प्रतिबद्धता से पीछे हटना नहीं है।

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गोरखपुर, फूलपुर, कैराना व नूरपुर में चुनावी हार के बाद इस फैसले के तार सांस्कृतिक एजेंडे के सहारे महागठबंधन के खिलाफ रणनीति से भी जुड़ते दिख रहे हैं।

योगी सरकार ने इस फैसले के बहाने न सिर्फ संतों-महात्माओं को संतुष्ट करने बल्कि हिंदुओं की भावनाओं के साथ खड़े होने का संदेश भी देने की कोशिश की है। इसी के साथ अगले वर्ष संगम तट पर लगने वाले कुंभ में देश के विभिन्न प्रांतों और दुनिया के कई देशों से आने वाले प्रतिनिधियों को भी हिंदुत्व के एजेंडे पर अपनी प्रतिबद्धता का संदेश देकर संतुष्ट करने का रास्ता ढूंढ लिया है।
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सरकार ने कुंभ में 31 जनवरी और 1 फरवरी को धर्म संसद के बीच खुद के साथ केंद्र सरकार की भी साख बनाए रखने और राममंदिर पर उठने वाले स्वरों को बहुत तीखा न होने देने का इंतजाम कर लिया है।

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संकल्प में इलाहाबाद नहीं प्रयागराज शब्द का ही होता है प्रयोग

भाजपा में विभिन्न पदों पर रह चुके डॉ. अमित पुरी इसे सियासी फैसला नहीं मानते। वह कहते हैं- जो इस निर्णय को सांस्कृतिक के बजाय सांप्रदायिक या सियासी मान रहे हैं, उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी हिंदू जब अपनी निजी धार्मिक यात्रा से संगम तट पर जाता है तो संकल्प में इलाहाबाद नहीं प्रयागराज शब्द का ही प्रयोग करता है। सरकार ने इलाहाबाद के पौराणिक नाम को फिर से कानूनी जामा पहनाया है।

पुरी के तर्क ठीक हैं लेकिन इसके बाद भी इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने का फैसला प्रदेश में सपा और बसपा के संभावित गठबंधन की काट का हिस्सा लगता है। विधानसभा चुनाव 2017 निपटते ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की कही बात पर गौर करें तो यह बात और साफ हो जाएगी।

उन्होंने कहा था कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को एकजुट विपक्ष का मुकाबला करना पड़ सकता है। इसलिए कार्यकर्ताओं को प्रत्येक बूथ पर मतदान में भाजपा की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत करने के लिए जुटना होगा।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो चुनावी लड़ाई को हिंदुत्व के सरोकारों पर केंद्रित कर 60 बनाम 40 बनाने से ही यह काम हो पाएगा। यह फैसला इसी एजेंडे का हिस्सा लगता है।

एजेंडे पर लगातार काम कर रही सरकार

इससे पहले योगी सरकार मुगलसराय का नाम पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर कर चुकी है। मथुरा और वृंदावन नगर निगम और फैजाबाद व अयोध्या नगर पालिका का विलय कर अयोध्या नाम से नया नगर निगम, अयोध्या में छोटी दिवाली पर बड़ा उत्सव और इस आयोजन को सरकारी स्वरूप देने का फैसला, सरयू आरती का प्रारंभ, अयोध्या के विकास और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े अन्य मुद्दों पर काम, रामकथा संग्रहालय, मथुरा-वृंदावन के विकास के लिए कई कामों की घोषणा, अयोध्या से चित्रकूट तक सड़क निर्माण, चित्रकूट में मंदाकिनी की आरती, नैमिषारण्य, विंध्यवासिनी और देवीपाटन के नवरात्र मेलों को राज्य मेले का दर्जा और काशी में देव दीपावली उत्सव से भी योगी सरकार हिंदुत्व के एजेंडे पर निष्ठा और समर्पण का संदेश दे चुकी है।

लंबे समय से संत कर रहे थे मांग

प्रदेश में योगी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद सभी हिंदू संत और धर्माचार्य इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज करने की मांग कर रहे थे। भाजपा के सहयोगी संगठन विश्व हिंदू परिषद की तरफ से भी काफी दिनों से इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज करने की मांग उठ रही थी।

मुख्यमंत्री बनने से पहले खुद योगी आदित्यनाथ कई मौकों पर इलाहाबाद के प्रयागराज होने की बात कह चुके थे। सभी यह तर्क देते आए हैं कि इलाहाबाद का पौराणिक नाम प्रयागराज ही है। वह तो अकबर ने अपने शासन में इस धार्मिक नगरी का नाम अल्लाहाबाद अर्थात अल्लाह की नगरी कर दिया था।

संतों का यह भी कहना था कि देश ही नहीं दुनिया में हिंदुओं के सांस्कृतिक सरोकारों के इस महत्वपूर्ण केंद्र का नाम हिंदू शास्त्रों में उल्लिखित तथ्यों और नाम के आधार पर प्रयागराज ही होना चाहिए।

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