तो इसलिए आजम ने राज्यपाल को लिखा खत!
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यह पहला मौका नहीं है जब आजम ने अपने खत से कोई विवाद खड़ा किया हो। इससे पहले भी वह ऐसा करते रहे हैं। कभी निशाने पर राज्यपाल होते हैं तो कभी नरेंद्र मोदी या कभी अपनी ही सरकार का कोई अधिकारी। लोगों को भले ही लगता हो कि आजम यूं ही बेवजह अपनी बातों से विवाद खड़ा करते हैं लेकिन इसमें उनकी गहरी सियासत छिपी होती है।
राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो आजम सिर्फ सपा के नेता भर बनकर नहीं रहना चाहते, बल्कि कहीं न कहीं मुसलमानों का सबसे ताकतवर व दबंग नेता बनने का उनका सपना भी है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि वह मुलायम सिंह यादव की मर्जी के बगैर ऐसा करते हैं। ताजा मामले पर ही नजर डालें तो यह बात बहुत कुछ साफ पता चल जाएगी।
यह है पूरा मामला
पिछले दिनों राज्यपाल राम नाईक ने रामपुर के ‘मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट’ को ‘जौहर शोध संस्थान’ का भवन देने के सरकार के फैसले पर आपत्ति उठाई थी। उसी के बाद आजम ने राज्यपाल के राम मंदिर वाले बयान को मुद्दा बनाकर राजभवन को पत्र भेजकर निशाना साधा है।
राम मंदिर मुद्दे से राज्यपाल को घेरने का प्रयास
पिछले दिनों अवध विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में गए राज्यपाल राम नाईक ने पत्रकारों के सवालों पर कहा था, ‘अयोध्या में जल्द से जल्द राम मंदिर बनाया जाना चाहिए। यही देश के नागरिकों की इच्छा है, जो पूरी की जानी चाहिए।’
आजम ने इस पर अपनी राय कुछ यूं व्यक्त की थी, ‘राज्यपाल कम, मंदिर के पुजारी ज्यादा लगते हैं।’ आजम ने ताजा खत लिखकर मुसलमानों को यह संदेश देने की कोशिश की है कि राज्यपाल के मंदिर वाले बयान का विरोध करने के कारण राज्यपाल ने जौहर अली ट्रस्ट को भवन देने में अड़ंगा डालने की कोशिश की है।
मकसद बताता खत का मजमून : आजम जानते हैं कि राज्यपाल का अतीत में जिस पार्टी से संबंध रहा है, उसके चलते खत में लिखी भाषा मुसलमानों के बीच उन्हें खासी तरजीह देगी। आजम ने खत में जौहर शोध संस्थान के काम को कमजोरों की तरक्की से जोड़ने के साथ ही राज्यपाल को सियासी घेराबंदी में घेरने का प्रयास किया है।
आजम ने लिखा है, ‘उम्मीद है आप कमजोरों को शिक्षा दिए जाने का विरोध नहीं करेंगे। रामपुर के नवाबों की अनुचित पैरवी नहीं करेंगे। मैं नहीं समझता कि गरीब बच्चों को जीने व देश की सेवा कर सकने के काबिल बनाना गलत है।’
'भेड़िया खाल बदलकर आया है'
समीक्षकों के अनुसार, आजम जानते हैं कि उनके चेहरे पर मुस्लिम सियासत का रंग जितना गाढ़ा होगा, मुस्लिम चेहरे के रूप में पहचान बनाने में वे उतने ही कामयाब होंगे। इसीलिए वह हर उस मौके का सियासी इस्तेमाल करते हैं जो उनके इस एजेंडे को और मजबूत करे।
उनका लखनऊ में सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में यह बोलना, ‘भेड़िया खाल बदलकर आया है। 125 करोड़ लोगों के बादशाह (मोदी) के हाथ, दामन और माथे पर बेगुनाहों के कत्ल के दाग हैं।’ तो वह खत भी कि ‘सरकार में बैठे कुछ अधिकारी मुसलमानों की तरक्की से चिढ़ते हैं’।
पर, मुलायम से अलग नहीं : इसका मतलब यह नहीं है कि सपा नेतृत्व की इच्छा के बिना आजम यह सब करते हैं। फर्क सिर्फ यह है कि आजम पार्टी के मुस्लिम एजेंडे को धार देते हैं और मुलायम मौके की नजाकत के लिहाज से उस पर अपनी भूमिका तय करते हैं। कभी वे मौन साधकर आजम विरोधी खेमे का समर्थन बटोरते हैं तो कभी मुसलमानों को आरक्षण देने जैसी आजम की मांग का समर्थन करके यह करते हैं।
दरअसल, मुलायम जानते हैं कि आजम से ज्यादा मुस्लिम मुद्दों को दूसरा कोई धार नहीं दे सकता। पर, उन्हें यह भी पता है कि अलग-अलग कारणों से मुसलमानों का बड़ा तबका आजम से चिढ़ता भी है। खुद उनकी पार्टी में भी ऐसे लोग कम नहीं हैं। इसलिए जहां जरूरी होता है वे आजम के साथ खड़े दिखते हैं। जहां दूरी जरूरी होती है, वहां दूरी बना लेते हैं।