{"_id":"6227b9db81556719ae59e668","slug":"who-among-the-pandavas-is-nakula-and-sahadeva","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"सत्ता के गलियारों में : चकल्लस...पांडवों में नकुल और सहदेव कौन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सत्ता के गलियारों में : चकल्लस...पांडवों में नकुल और सहदेव कौन
Wed, 09 Mar 2022 04:06 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 09 Mar 2022 04:06 AM IST
सार
इनमें युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन तो बता दिए गए हैं, लेकिन नकुल और सहदेव को लेकर अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है। कुछ कार्यकर्ता कहते हैं कि सरकार में नंबर तीन वाले को नकुल और संगठन में नंबर एक वाले का नाम सहदेव ही रखना उचित है।
विज्ञापन
demo pic
- फोटो : अमर उजाला।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सत्तारूढ़ दल में इन दिनों निर्णायक मंडल के पांच सदस्यों को पांडव की संज्ञा दी गई है। इनमें युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन तो बता दिए गए हैं, लेकिन नकुल और सहदेव को लेकर अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है। कुछ कार्यकर्ता कहते हैं कि सरकार में नंबर तीन वाले को नकुल और संगठन में नंबर एक वाले का नाम सहदेव ही रखना उचित है।
विज्ञापन
बिन बुलाए पहुंचे, उल्टे पैर लौटे
चुनाव के अंतिम चरण में पार्टी के खर्चे पर राजनीतिक पर्यटन पर वाराणसी पहुंचे कुछ नेताओं को नेतागिरी महंगी पड़ी। हुआ यूं कि कुछ नेता और प्रकोष्ठों के संयोजक खुद ही वाराणसी पहुंच गए। वहां पार्टी के बड़े नेताओं ने जब उनसे वाराणसी आने का कारण पूछा तो बहाने बताने लगे। कुछ नेताओं और प्रकोष्ठ के संयोजकों की हालत यह हुई कि उन्हें उल्टे पैर वापस राजधानी लौटना पड़ा। अब चर्चा है कि राजनीतिक पर्यटन के चक्कर में उनकी तीन चार महीने की मेहनत पर भी पानी फिर गया।
विज्ञापन
पहली बार पड़ा ऐसे नेता से पाला
एक दल को उनके सहयोगी दल के मुखिया ने चुनाव में जैसे चाहा, वैसे नचाया। उस समाज के वोट बैंक के लिए बड़े-बड़े नेता भी उनके आगे नतमस्तक नजर आए। उनके लिए राजधानी से लेकर गोरखपुर और वाराणसी के पांच सितारा होटल में शानदार कमरे बुक कराने से लेकर हेलीकाॅप्टर तक मुहैया कराया। इतना ही नहीं नेताजी ने चुनावी नाव में सवार उम्मीदवारों पर खूब हनक जमाया। नेताजी का शुरुआती रुझान देखकर दल के नेता कहने लगे हैं कि ऐसे नेता से पहली बार पाला पड़ा है, चुनाव में यह हाल है तो सरकार बनने के बाद इन्हें संभालना मुश्किल कितना मुश्किल होगा।
विज्ञापन
बाप रे बाप, 35 लाख!
एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता गपशप में मशगूल थे कि इस बार पार्टी ने चुनाव लड़ने वाले अपने हर प्रत्याशी को 35-35 लाख रुपये दिए। कई प्रत्याशी तो ऐसी पृष्ठभूमि से निकलकर आए कि उन्होंने इतने रुपये अपने जीवन में कभी नहीं देखे। तमाम प्रत्याशियों को शुरू से ही जीतने की उम्मीद नहीं थी। इन सबने पार्टी से मिले रुपये खर्च करने के बजाय बचाकर रखने में ज्यादा समझदारी समझी। गपशप में शामिल एक नेता फरमाने लगे कि आने वाले चुनाव मेंे चर्चित विश्वविद्यालय के लोगों को सेट करके अपने लोगों को टिकट दिलवा देंगे। कम से कम 35 लाख में से कुछ तो बचेगा।