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जब नवल किशोर को आगरा में अपना काम छोड़कर लाहौर जाना पड़ा, पढ़ें यह रोचक किस्सा
Fri, 10 May 2019 05:09 PM IST
Amulya Rastogi
अखिलेश वाजपेई, अमर उजाजा, लखनऊ
अखिलेश वाजपेई, अमर उजाजा, लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Fri, 10 May 2019 05:09 PM IST
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मुंशी नवल किशोर
- फोटो : अमर उजला
बात 1852 की है, जब मुंशी नवल किशोर आगरा कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे। उन्होंने प्राच्य विद्या विभाग में दाखिला लिया। उम्र 15 वर्ष ही थी, लेकिन आगरा से प्रकाशित उर्दू समाचार पत्र ‘सफीरे आगरा’ में लेख लिखने लगे थे। उनके पिता यमुना प्रसाद के मित्र मुंशी हरसुख राय कोहिनूर प्रेस चला रहे थे।
कोहिनूर प्रेस से ही उस समय का प्रसिद्ध उर्दू पत्र ‘कोहेनूर’ निकलता था। मुंशी नवल किशोर के पौत्र डॉ. रणजीत भार्गव ने एक संस्मरण में लिखा है, ‘नवल किशोर लाहौर चले गए और मुंशी हरसुख राय के पास रहकर प्रेस और पत्रिका का काम अच्छी तरह सीखा।
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कोहिनूर प्रेस से ही उस समय का प्रसिद्ध उर्दू पत्र ‘कोहेनूर’ निकलता था। मुंशी नवल किशोर के पौत्र डॉ. रणजीत भार्गव ने एक संस्मरण में लिखा है, ‘नवल किशोर लाहौर चले गए और मुंशी हरसुख राय के पास रहकर प्रेस और पत्रिका का काम अच्छी तरह सीखा।
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मुंशी हरसुख राय ने नवल किशोर को अपने छापाखाना का मैनेजर बना दिया। मुंशी हरसुख राय ने पूरे मनोयोग से नवल किशोर को काम सिखाया। नवल किशोर उनसे इतना प्रभावित हुए कि नाम के आगे मुंशी लगाने लगे। वह 1856 में आगरा लौट आए। पर, कुछ ही दिन बाद ऐसा कुछ हुआ कि उन्हें फिर वापस लाहौर जाना लड़ा।
हुआ यह कि हरसुख राय पर फौजदारी का एक मुकदमा हो गया। मुकदमे में उन्हें तीन साल की सजा सुना दी गई। नवल किशोर को पता चला तो आगरा में अपना काम छोड़कर तुरंत लाहौर गए और अपने गुरु की जमानत कराई।
हुआ यह कि हरसुख राय पर फौजदारी का एक मुकदमा हो गया। मुकदमे में उन्हें तीन साल की सजा सुना दी गई। नवल किशोर को पता चला तो आगरा में अपना काम छोड़कर तुरंत लाहौर गए और अपने गुरु की जमानत कराई।
साथ ही उनके प्रेस की व्यवस्थाएं भी ठीक की। मुंशी हरसुख राय इससे काफी खुश हुए और उन्होंने ही मुंशी नवल किशोर को एक हैंड प्रेस और कुछ लिथो (वह पत्थर जिस पर पहले अक्षर खोदकर छपाई की जाती थी) दिए। उसी प्रेस को लेकर वह लखनऊ आए और उन्होंने मुंशी नवल किशोर प्रेस की स्थापना की।’