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गोमती तीरे गदर के मंजर को मिली शक्ल

Sun, 22 Dec 2013 12:32 PM IST
टीम डिजिटल/लखनऊ
टीम डिजिटल/लखनऊ Updated Sun, 22 Dec 2013 12:32 PM IST
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wajid ali shah mahotsav

पेड़ों और फांसी के तख्तों पर लटकी लाशें, गोलियों से मारे गए और संगीनों से घायल नागरिकों के बीच बिलखती महिलाएं।

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कुछ ऐसा ही मंजर था अवध का जब 1857 की क्रांति को ईस्ट इंडिया कंपनी ने खत्म कर दिया।

यही मंजर शनिवार शाम छतर मंजिल में फिर नजर आया जब वाजिद अली शाह फेस्टिवल के तहत नृत्य नाटिका ‘गोमती’ का यहां मंचन हुआ।

ख्यातिप्राप्त साहित्यकार डॉ. राही मासूम रजा की इस रचना पर यह नाटिका लखनऊ के फिल्मकार मुजफ्फर अली के निर्देशन में तैयार की गई थी।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सहित कई गणमान्य नागरिक व राजनीतिक व्यक्तित्व मौजूद रहे।

‘गोमती’ ने पैदा की सिरहन

गोमती किनारे बनी छतर मंजिल में प्रस्तुत नृत्य नाटिका में अंग्रेजों के खिलाफ हुए पहले स्वतंत्रता संग्राम और उसके दुखद अंत की गाथा को समेटा गया है। कहानी कुछ यूं है कि अंग्रेजों द्वारा क्रांति का दमन के बाद एक शायर लखनऊ आता है।

उसे यहां के लाशों का ढेर देखकर अहसास होता है कि यह वह लखनऊ नहीं जिसकी उम्मीद में वह यहां आया था। इस दौरान नृत्यांगनाओं द्वारा गीत ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाय...’ पर भावपूर्ण प्रस्तुति ने सभी को रोमांचित कर दिया। इसके बाद नृत्य नाटिका का सिलसिला कुछ यूं चला -
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‘दरो दीवार पर हसरत से नजर रखते हैं
खुश रहो एहले वतन, अब हम तो सफर करते हैं।’


यह गीत प्रस्तुत कर 57 की क्रांति में जान देने वाले वीरों के जज्बों को सामने रखा गया। इस दौरान शायर लखनऊ के एक बुजुर्ग से मिलकर हालात से वाकिफ होता है। मशाल लिए नागरिक मंच पर उनके भावों को अभिव्यक्त करते हैं।
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गीत गूंजता है.... बेवाएं मृतकों के शरीर गोद में लिए रो रही हैं। घर तोड़े जा चुके हैं, चिराग बुझाए जा चुके हैं। एकाएक दिसंबर की शीतलहर सिरहन बढ़ाती हुई बह निकलती है...।


‘लखनऊ... अपने ही खून में डूबकर सुर्ख तू...।’ इसके बाद इतने में आहट आती है अंग्रेज सैनिकों के आने की।

वे किसी को ढूंढ रहे हैं, किसे? गोमती खुद बताती हैं, ‘वो मेरी जुस्तजू में मरते हैं, गोरे मुझे ही तलाश करते हैं....’पृष्ठभूमि में गीत की ध्वनि गूंजती है ‘सुनो भाइयों कथा सुनो 57 की, क्रांति के पहले सावन की...।’

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