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थाली तक आते-आते 10 गुना महंगी हो जाती हैं सब्जियां
अभिषेक यादव/लखनऊ
Updated Fri, 25 Oct 2013 01:10 PM IST
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राजधानी से महज 50 किमी दूर बाराबंकी के गुडौरा, पल्हरी और आसपास के गांवों से महंगाई के इस दौर में भी आप बेहद सस्ते दामों में सब्जियां खरीद सकते हैं, लेकिन लखनऊ पहुंचते-पहुंचते इन सब्जियों के दाम 10 गुना तक बढ़ जाते हैं।
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इसकी वजह है बिचौलियों और कारोबारियों की मुनाफाखोरी। प्याज की ही बात करें तो लखनऊ आते-आते यह छह बार बेचा और खरीदा जाता है। बाकी हरी सब्जियां भी दिन में चार बार खरीदी-बेची जाती है।
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बिचौलियों की भूमिका का ही नतीजा है कि लखनऊ के आसपास के जिलों के किसानों ने अपने जीवन में कभी 8 रुपये प्रति किलो से ज्यादा दाम में प्याज नहीं बेचा, आज वही प्याज लोग 80 रुपये प्रति किलो खरीद रहे हैं।
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बाराबंकी के गुडौरा गांव के किसान रमापत यादव अपने खेत में उगी लौकी तीन रुपये किलो के हिसाब से बेचते हैं, लेकिन लखनऊ में खुदरा विक्रेता के पास पहुंचने तक इसके दाम 10 गुना बढ़ाकर 30 रुपये किलो हो चुके होते हैं।
ऐसे में गांव के ही कुछ लोग उनसे औने-पौने दाम में सब्जियां खरीद लेते हैं और शहर में बेच आते हैं।
सब्जियों में इस तरह लगता है महंगाई का तड़का
1. खेतों से मंडी तक : सब्जियों के शुरुआती दाम इन्हें उपजाने वाले किसान नहीं, बल्कि मंडी में बैठे सेठ तय करते हैं। लोगों में टमाटर की भले ही जबर्दस्त मांग हो और बाजार में यह महंगा बिक रहा हो, लेकिन ये सेठ माल नहीं खरीदकर किसान को मजबूर करते हैं कि वह उसे सस्ते दामों पर बेचे।
2. बिचौलिये और आढ़तिये : मंडी में आने वाले ग्रामीणों से बिचौलिये और आढ़तिये सब्जियां खरीदते हैं। ये मार्केट के दामों पर कड़ी नजर रखते हैं और आने वाले माल पर भी लॉबी बनाकर अपना नियंत्रण रखते हैं।
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3. व्यापारी : बिचौलियों से माल खरीदकर बेचते हैं। इस दौरान लंबे समय टिकने वाली सब्जियों जैसे प्याज, आलू, बैंगन, आदि को सीधे किसानों से या बिचौलियों से खरीदा जाता है। व्यापारी इन्हें मार्केट में दामों पर नियंत्रण बनाए रखने के हिसाब से बेच रहे हैं। लखनऊ में फिलहाल प्याज नासिक से आ रहा है।
4. फुट्टा खरीदार : व्यापारियों या किसानों से फुट्टा खरीदार सब्जियां खरीद रहे हैं। ये आम तौर पर ऐसे छोटे व्यापारी हैं जो चार या छह का समूह बनाकर एक ट्रक या बड़ी मात्रा में सब्जियां खरीदते हैं और फिर उसे आपस में बांट लेते हैं। यही सब्जियां उन छोटे खुदरा विक्रेताओं को बेची जाती हैं जो बड़े व्यापारियों से सीधे नहीं खरीद सकते। वे बड़े व्यापारी सब्जियों के बड़े कंसाइनमेंट बेचने पर जोर देते हैं।
5. खुदरा विक्रेता : राजधानी के अधिकतम लोगों को सब्जियां खुदरा विक्रेताओं केजरिए मिल रही हैं क्योंकि इनकी पहुंच गली-गली में है। खुदरा विक्रेता फुट्टा खरीदारों से माल ले रहे हैं और आम लोगों तक पहुंचा रहे हैं। ये खुद आर्थिक तौर पर कमजोर स्थिति में हैं और सब्जियां खराब होने का नुकसान भी इन्हीं को उठाना होता है। ऐसे में वे आम लोगों से इस नुकसान की भरपाई करते हैं।
उत्पादन में तो हम नंबर 1
13.4 प्रतिशत सब्जियों का उत्पादन भारत में।
2 रैंक पर है भारत विश्व में सब्जी उत्पादन के मामले में।
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