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यूपी: एक के बाद एक नौकरी क्यों छोड़ रहे हैं IAS अफसर, नौ अफसरों ने इसलिए लिया था वीआरएस; वजहें राजनीतिक?
Sun, 30 Aug 2026 10:41 PM IST
रोहित मिश्र
अजीत बिसारिया, अमर उजाला लखनऊ
अजीत बिसारिया, अमर उजाला लखनऊ
Published by: रोहित मिश्र
Updated Sun, 30 Aug 2026 10:41 PM IST
सार
Divya Mittal resigns: दिव्या मित्तल जिन भी जिलों में डीएम रहीं, काफी सक्रिय रहीं। उनके समकक्ष एक आईएएस अधिकारी बताते हैं कि राजस्व विभाग में विशेष सचिव रहते सेवा के क्षेत्र में वैसी सक्रियता नहीं रहती।
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दिव्या मित्तल ने दिया इस्तीफा।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
पिछले कुछ वर्षों में 9 आईएएस अधिकारी सेवा से स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ले चुके हैं तो 4 ने इस्तीफा दे दिया। सेवा से बाहर जाने वाले कुछ अधिकारी कॉर्पोरेट सेक्टर में चले गए तो कुछ राजनीति में भाग्य आजमा रहे हैं। कई पूरी तरह से अपनी निजी जिंदगी में लौट गए। इससे यह सवाल भी पैदा हो रहा है कि इतनी महत्वपूर्ण सेवा से अधिकारियों का क्यों मोहभंग हो रहा है।
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जिन 9 आईएएस अधिकारियों ने वीआरएस लिया है उनमें आरपी सिंह, राजीव अग्रवाल, मो. मुस्तफा, आमोद कुमार, रेणुका कुमार, जूथिका पाटणकर, विकास गोठलवाल, रिग्जियान सैंफिल व अनामिका सिंह शामिल हैं। इस्तीफा देने वालों में विद्या भूषण, अभिषेक सिंह, एस मुथु शालिनी और अब दिव्या मित्तल का नाम भी जुड़ गया है। इसके अलावा आईएएस रिंकू सिंह राही ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया और रजनीश चंद्रा के वीआरएस मांगे जाने के बाद भी उनका आवेदन स्वीकार नहीं हुआ है।
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काम में राजनीतिक दखल भी कारण
दिव्या मित्तल जिन भी जिलों में डीएम रहीं, काफी सक्रिय रहीं। उनके समकक्ष एक आईएएस अधिकारी बताते हैं कि राजस्व विभाग में विशेष सचिव रहते सेवा के क्षेत्र में वैसी सक्रियता नहीं रहती। जिस तरह से फील्ड में रहकर आमजन की सेवा कर सकते हैं, वैसी गुंजाइश यहां कम ही रहती है। शायद इसी टीस ने उन्हें सेवा से बाहर जाने का फैसला लेने के लिए मजबूर किया। वह कहते हैं कि जो अधिकारी कुछ कर गुजरने के जज्बे के साथ इस सेवा में आते हैं, वे एक सीमा से ज्यादा राजनीतिक दखल को सहन नहीं कर पाते और सेवा छोड़ना ही उपयुक्त मानते हैं।
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सब कुछ पा लेने पर भी कुछ अधूरा था, इसलिए लंदन से स्वदेश लौटी
दिव्या मित्तल
- फोटो : अमर उजाला
आईएएस दिव्या मित्तल ने रविवार की सुबह सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट लिखी कि सबकुछ पा लेने पर भी कुछ अधूरा था, इसलिए लंदन में लगी नौकरी छोड़कर स्वदेश लौटी। अंत में वह लिखती हैं कि सेवा का वह सपना कभी नहीं छूटेगा, जो देश की मिट्टी ने उन्हें दिया है। इससे यह कयास लगाए जाने लगे कि वह राजनीति में भी जा सकती हैं। हालांकि, उनके करीबी इससे इन्कार कर रहे हैं।
दिव्या लिखती हैं, मैंने 13 वर्षों की अविस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए आईएएस से त्यागपत्र दे दिया है। साधारण परिवेश में पलते हुए मैंने एक अच्छे व सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रात एक कर आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बंगलूरू से पढ़ने के बाद लंदन में नौकरी लग गई, पर सब कुछ पा लेने पर भी कुछ अधूरा था। अपने देश में न होना खलता था। चाहती थी जिस भारत का सपना देखा था, उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हों। इसलिए लौट आई और आईएएस अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला।
वे अपनी पोस्ट में आगे कहती हैं, देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है। मिर्जापुर ने सिखाया कि असंभव कोई तथ्य नहीं, बस एक राय है। मां विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं, उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है। सबसे बड़ी सीख यह थी कि अपने लिए देखे सपने तो पूरे हो चुके थे, अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था। लहुरिया दह की पहाड़ी की वो वृद्ध मां, जो अपने गांव में पहली बार पानी पहुंचता देख कुछ नहीं बोली, बस कांपते हाथों से मेरा सिर छूकर आशीर्वाद दे गई। पद तो आज छूट गया, पर वह स्पर्श जीवन भर नहीं छूटेगा।
दिव्या लिखती हैं, मैंने 13 वर्षों की अविस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए आईएएस से त्यागपत्र दे दिया है। साधारण परिवेश में पलते हुए मैंने एक अच्छे व सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रात एक कर आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बंगलूरू से पढ़ने के बाद लंदन में नौकरी लग गई, पर सब कुछ पा लेने पर भी कुछ अधूरा था। अपने देश में न होना खलता था। चाहती थी जिस भारत का सपना देखा था, उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हों। इसलिए लौट आई और आईएएस अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला।
वे अपनी पोस्ट में आगे कहती हैं, देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है। मिर्जापुर ने सिखाया कि असंभव कोई तथ्य नहीं, बस एक राय है। मां विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं, उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है। सबसे बड़ी सीख यह थी कि अपने लिए देखे सपने तो पूरे हो चुके थे, अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था। लहुरिया दह की पहाड़ी की वो वृद्ध मां, जो अपने गांव में पहली बार पानी पहुंचता देख कुछ नहीं बोली, बस कांपते हाथों से मेरा सिर छूकर आशीर्वाद दे गई। पद तो आज छूट गया, पर वह स्पर्श जीवन भर नहीं छूटेगा।