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विधान परिषद चुनाव: भाजपा की ताकत बढ़ी पर नई चुनौतियां भी सामने, सपा ने खुद को मुख्य प्रतिद्वंद्वी साबित किया

Sun, 06 Dec 2020 11:13 AM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sun, 06 Dec 2020 11:13 AM IST
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UP Vidhan Parishad Election, BJP increased power but SP saves its seat.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व अखिलेश यादव। - फोटो : amar ujala

विधान परिषद की शिक्षक व स्नातक क्षेत्र की 11 सीटों के चुनाव में सत्ताधारी भाजपा ने पांच सीटें जीतकर और एक सीट पर बढ़त बरकरार रखते हुए अपनी ताकत में इजाफा तो किया, लेकिन उसकी चुनौतियां भी उभर आई हैं। इस चुनाव में तीन सीटें जीतकर सपा ने फिर यह साबित किया है कि प्रदेश में भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी वही है।

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प्रदेश में स्नातक क्षेत्र की पांच व शिक्षक क्षेत्र की छह सीटों के चुनाव हुए। भाजपा ने इनमें से स्नातक की सभी पांच व शिक्षक की चार सीटों पर चुनाव लड़ा। शिक्षक क्षेत्र लखनऊ, मेरठ, बरेली-मुरादाबाद सीट पर कब्जा जमाकर भाजपा ने बड़ी सफलता हासिल की है। इसी तरह स्नातक क्षेत्र की आगरा, मेरठ सीट भाजपा ने अपने खाते में दर्ज कर ली है। जबकि लखनऊ में पार्टी प्रत्याशी बढ़त बनाए है। इससे पार्टी ने विधान परिषद में अपनी ताकत में बड़ा इजाफा किया है। लेकिन ये नतीजे विधान सभा चुनाव-2022 से पहले उसके लिए बड़े मंथन की नौबत भी ले आए हैं।
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दरअसल, भाजपा ने पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी व सीएम योगी आदित्यनाथ के गृह क्षेत्र गोरखपुर-फैजाबाद की शिक्षक सीट पर प्रत्याशी ही नहीं उतारा। पार्टी ने वाराणसी की स्नातक सीट पर निवर्तमान एमएलसी केदारनाथ सिंह को प्रत्याशी बनाया और शिक्षक सीट पर निवर्तमान एमएलसी चेत नारायण सिंह को समर्थन दिया।
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मुख्य विपक्षी दल सपा ने इस क्षेत्र की दोनों ही प्रतिष्ठापूर्ण सीटें जीत लीं। खास बात ये रही कि  पीएम इस चुनाव के दौरान वाराणसी भी आए। कई परियोजनाओं का लोकार्पण-शिलान्यास भी किया। लेकिन, न तो मोदी ने इस चुनाव का कोई जिक्र किया और न ही वाराणसी के स्नातक-शिक्षक मतदाताओं ने इसे नोटिस में लिया। लिहाजा नतीजा एकतरफा गया।

इलाहाबाद-झांसी सीट भी नहीं बचा पाई भाजपा

गोरखपुर सीट पर भाजपा प्रत्याशी न होने से पार्टी को लेकर मतदाताओं का रुख साफ नहीं हो सका। पार्टी स्नातक क्षेत्र की एक और प्रतिष्ठापूर्ण इलाहाबाद-झांसी सीट भी नहीं बचा पाई। इस सीट पर भाजपा ने चार बार के एमएलसी डॉ. यज्ञदत्त शर्मा को प्रत्याशी बनाया था। सपा ने यह सीट भी भाजपा से छीन ली। इन सीटों की हार ने भाजपा की जीत के उल्लास को कसैला बना दिया है।

इन चुनावों में शिक्षक व स्नातक मतदाताओं का मिजाज भी सामने आया है। माना जाता है कि आम चुनावों में यह वर्ग वोटरों को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाता है। इस वर्ग का संदेश साफ है कि चुनाव जीतकर दूरी बना लेने वाले नेता अब उसे स्वीकार नहीं हैं। ऐसे लोगों की जगह वे किसी भी प्रत्याशी के रूप में नए चेहरे को मौका दे सकते हैं। उसके बीच रहकर काम करने वाले पुराने सदस्यों को फिर मौका देने में भी उसे कोई परहेज नहीं है। मतदाताओं ने 9 नए चेहरों को ताज पहना दिया तो दो मौजूदा सदस्यों ध्रुव कुमार त्रिपाठी और उमेश द्विवेदी को मौका देने में संकोच नहीं किया।

सपा ने फिर कराया ताकत का अहसास

सपा ने इस चुनाव में शिक्षक व स्नातक की सभी 11 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। सपा ने न सिर्फ वाराणसी की शिक्षक व स्नातक कोटे की दोनों सीटें जीतीं, बल्कि इलाहाबाद-झांसी सीट भी भाजपा से झटक ली। 11 में दो सीटें सपा के पास थीं लेकिन उसने एक और सीट पर कब्जा जमाकर अपनी ताकत का अहसास करा दिया। कांग्रेस कहीं लड़ाई में भी नहीं दिखी।

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