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लेफ्ट के गढ़ हो गए राइट: 1991 के बाद भाकपा और माकपा का कोई प्रत्याशी यूपी में सांसद नहीं बन सका; पढ़ें रिपोर्ट
Mon, 01 Apr 2024 02:43 PM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: शाहरुख खान
Updated Mon, 01 Apr 2024 02:43 PM IST
सार
एक दौर था जब प्रदेश की कई संसदीय सीटों पर लाल झंडा बुलंद था। इनमें कानपुर और धार्मिक नगरी अयोध्या व वाराणसी भी थीं। वक्त बदला। हालात बदले। मतदाताओं का मन और मूड भी बदल गया। अब प्रदेश के लाल सलाम वाले अधिकतर गढ़ में भगवा लहरा रहा है। प्रदीप अवस्थी व अभिषेक राज की विशेष रिपोर्ट...
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UP Lok Sabha Election 2024
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने प्रदेश की आठ सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर खुद को यहां जिंदा रखने की कोशिश की है। हकीकत यह है कि मजदूरों और शोषितों के नाम पर राजनीति करके कभी प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में धाक जमाने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों का वजूद अब यहां खत्म होने जैसा है।
लाल सलाम वाले अधिकतर गढ़ों में भगवा लहरा रहा है। वर्ष 1991 के बाद से भाकपा और माकपा का कोई यूपी में सांसद नहीं बन सका। आर्थिक विसंगतियों को दूर करने की बात करके वामपंथियों ने प्रदेश की औद्योगिक राजधानी रहे कानपुर को अपना गढ़ बनाया।
धार्मिक नगरी अयोध्या में भी वर्चस्व देखने को मिला। बांदा, घोसी, वाराणसी और गाजीपुर में भी वामपंथी यदा-कदा जीते। कानपुर में वर्ष 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हरिहर नाथ शास्त्री सांसद बने। वर्ष 1957 के दूसरे चुनाव में वामपंथियों के समर्थक मजदूर नेता एसएम बनर्जी निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत भी गए।
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इसके बाद एसएम बनर्जी अलग-अलग चुनावों में 20 वर्षों तक कानपुर के सांसद रहे। यह अपने आप में वामपंथियों के लिए बड़ी उपलब्धि रही। 1977 में जनता पार्टी के मनोहर लाल ने बनर्जी का विजय रथ रोका। इसके बाद वर्ष 1989 में माकपा की सुभाषिनी अली यहां से सांसद बनीं। अयोध्या से मित्रसेन यादव और घोसी से झारखंडे राय भी सांसद बने। प्रदेश में वामपंथियों के उत्कर्ष का यह आखिरी वर्ष रहा।
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लाल सलाम वाले अधिकतर गढ़ों में भगवा लहरा रहा है। वर्ष 1991 के बाद से भाकपा और माकपा का कोई यूपी में सांसद नहीं बन सका। आर्थिक विसंगतियों को दूर करने की बात करके वामपंथियों ने प्रदेश की औद्योगिक राजधानी रहे कानपुर को अपना गढ़ बनाया।
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धार्मिक नगरी अयोध्या में भी वर्चस्व देखने को मिला। बांदा, घोसी, वाराणसी और गाजीपुर में भी वामपंथी यदा-कदा जीते। कानपुर में वर्ष 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हरिहर नाथ शास्त्री सांसद बने। वर्ष 1957 के दूसरे चुनाव में वामपंथियों के समर्थक मजदूर नेता एसएम बनर्जी निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत भी गए।
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इसके बाद एसएम बनर्जी अलग-अलग चुनावों में 20 वर्षों तक कानपुर के सांसद रहे। यह अपने आप में वामपंथियों के लिए बड़ी उपलब्धि रही। 1977 में जनता पार्टी के मनोहर लाल ने बनर्जी का विजय रथ रोका। इसके बाद वर्ष 1989 में माकपा की सुभाषिनी अली यहां से सांसद बनीं। अयोध्या से मित्रसेन यादव और घोसी से झारखंडे राय भी सांसद बने। प्रदेश में वामपंथियों के उत्कर्ष का यह आखिरी वर्ष रहा।
...इसलिए उड़ता चला गया लाल रंग
वामपंथियों का लाल रंग वर्ष 1990 से फीका पड़ना शुरू हुआ। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह राममंदिर आंदोलन को बताया जाता है। हालांकि राजनीति शास्त्री प्रो. शुचिता पांडेय का कहना है कि वामपंथी विचारधारा की नई पीढ़ी जनता से दूर होती गई। यही राजनीति में इनके पतन का प्रमुख कारण बना। पहले वामपंथी नेता खांटी राजनीति करते थे। अधिकारों के लिए आम जनमानस की चेतना जगाने में इनकी प्रमुख भूमिका रहती थी। इनके उत्तराधिकारियों ने ऐसा नहीं किया। पद प्राप्त करने की लालसा बढ़ती गई। ऐसे में सत्ता को चुनौती देने का दम नहीं बचा।
वामपंथियों का लाल रंग वर्ष 1990 से फीका पड़ना शुरू हुआ। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह राममंदिर आंदोलन को बताया जाता है। हालांकि राजनीति शास्त्री प्रो. शुचिता पांडेय का कहना है कि वामपंथी विचारधारा की नई पीढ़ी जनता से दूर होती गई। यही राजनीति में इनके पतन का प्रमुख कारण बना। पहले वामपंथी नेता खांटी राजनीति करते थे। अधिकारों के लिए आम जनमानस की चेतना जगाने में इनकी प्रमुख भूमिका रहती थी। इनके उत्तराधिकारियों ने ऐसा नहीं किया। पद प्राप्त करने की लालसा बढ़ती गई। ऐसे में सत्ता को चुनौती देने का दम नहीं बचा।
काशी-बांदा ने भी दी लाल सलामी
बात 1967 की है। राजनीतिक कयासबाजी और समीकरण से इतर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सत्य नारायण सिंह ने जीत दर्ज कर काशी को लाल सलामी दी। इसके बाद प्रयास तो बहुत हुए, लेकिन भाकपा की वापसी नहीं हो सकी। 1967 में भाकपा के जागेश्वर यादव ने बांदा से जीत दर्ज की थी। हालांकि इसके बाद भाकपा की वापसी नहीं हो सकी।
बात 1967 की है। राजनीतिक कयासबाजी और समीकरण से इतर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सत्य नारायण सिंह ने जीत दर्ज कर काशी को लाल सलामी दी। इसके बाद प्रयास तो बहुत हुए, लेकिन भाकपा की वापसी नहीं हो सकी। 1967 में भाकपा के जागेश्वर यादव ने बांदा से जीत दर्ज की थी। हालांकि इसके बाद भाकपा की वापसी नहीं हो सकी।
गाजीपुर और घोसी रहा मजबूत किला
गाजीपुर और घोसी भी कम्युनिस्टों का मजबूत किला रहा है। घोसी से 1962 में भाकपा के जयबहादुर सिंह सांसद चुने गए। 1967 में भी उन्होंने यहां कब्जा बरकरार रखा। 71 में भाकपा ने झारखंडे राय को मैदान में उतारा। उन्होंने भी यह सीट पार्टी की झोली में डाली। हालांकि 1977 के चुनाव में यहां से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। जनता पार्टी के शिवराम राय ने जीत हासिल की। 1989 में यहां से झारखंडे राय ने फिर लाल झंडा लहराया। इसी के बाद यह गढ़ भाकपा के हाथ से निकल गया।
गाजीपुर और घोसी भी कम्युनिस्टों का मजबूत किला रहा है। घोसी से 1962 में भाकपा के जयबहादुर सिंह सांसद चुने गए। 1967 में भी उन्होंने यहां कब्जा बरकरार रखा। 71 में भाकपा ने झारखंडे राय को मैदान में उतारा। उन्होंने भी यह सीट पार्टी की झोली में डाली। हालांकि 1977 के चुनाव में यहां से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। जनता पार्टी के शिवराम राय ने जीत हासिल की। 1989 में यहां से झारखंडे राय ने फिर लाल झंडा लहराया। इसी के बाद यह गढ़ भाकपा के हाथ से निकल गया।
उधर, भाकपा के कद्दावर कामरेड सरजू पांडे ने 1967 में यहां से जीत दर्ज की। किसानों में वह इस कदर लोकप्रिय हुए कि उन्होंने देखते ही देखते गाजीपुर को भाकपा का मजबूत गढ़ बना दिया। 1971 के चुनाव में भी यहां पार्टी की पहचान बरकरार रही। इसके बाद यह सीट भाकपा के हाथ से खिसक गई। वर्ष 1991 में विश्वनाथ शास्त्री ने इसे फिर भाकपा की झोली में डाल दिया। ,