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सवा बीघे फसल नुकसान पर 125 रुपये का चेक!

Sun, 12 Apr 2015 01:27 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 12 Apr 2015 01:27 AM IST
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UP govt compensation is not enough for farmers.

फसल की बर्बादी पर किसान रोया...बिलखा। सरकार ने हमदर्दी जताई...। विधानसभा तक में कहा, नुकसान की सारी भरपाई करेंगे। राहत देंगे। पर हुआ क्या? राहत पहुंच गया। कैंपों में बंट भी गया। पर किसान फिर रो रहा है। अपना माथा पीट रहा है। कह रहा है- क्या इसे ही राहत कहते हैं। यह तो हमारी बर्बादी का उपहास है।

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सीवन-वाजिदपुर गांवों में राहत चेक बांटने के कैम्प लगे। किसान खुश थे। उन्हें उम्मीद थी कि शायद सरकार की इमदाद से गृहस्थी पटरी पर लौट आए। पर चेक हाथ में आते ही किसानों के चेहरे की रंगत उड़ गई।
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सवा बीघे फसल नुकसान पर 125 रुपये के चेक? किसान कह रहे, एक बोरी खाद की कीमत भी नहीं मिली। जी हां, सीवन-वाजिदपुर उसी रुदौली तहसील का हिस्सा है, जिसके 25 गांवों में फसल की बर्बादी का मुद्दा 24 मार्च को विधानसभा में गूंजा था।
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तब राजस्वमंत्री शिवपाल यादव ने ऐलान किया था कि किसानों को हुए नुकसान की पूरी भरपाई होगी। पर शासन की ओर से मिले चेक के बाद पीड़ित किसान खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। कह रहे हैं, चेक के बाद तो दर्द और बढ़ गया है।

हम तो वापस करेंगे चेक

UP govt compensation is not enough for farmers.

समाज कल्याण मंत्री अवधेश प्रसाद ने बुधवार को मुरादाबाद गांव में 266 किसानों को चेक बांटे। अगले दिन सीवन-वाजिदपुर गांव में कैंप लगा। पर कैम्प में आने से पहले किसानों के चेहरे पर जो उम्मीद की चमक थी, चेक हाथ में आते ही मायूसी में बदलती गई।

सीवन गांव के मो. ईशा को 125 रुपये, मो. उस्मान को 125  रुपये और मो. मूसा को 125 रुपये के चेक उनकी सवा-सवा बीघे गेहूं की फसल बर्बाद होने के एवज में मिला है। घर की खेती सात हिस्से में बराबर बंटी हैं, फिर भी अलग-अलग रह रहे तीन भाई सलाउद्दीन, मो. हाशिम व तुफैल को फूटी कौड़ी नहीं मिली।

मां शाहजहां बानो पर थोड़ी रहम की गई। उन्हें 860 रुपये उतने ही हिस्से के लिए जरूर मिले हैं। मो. ईशा कहते हैं कि मैं तो तहसील जाकर इसे लौटा दूंगा, इसे देने से अच्छा था कि सरकार हमे मरने देती।

330 रुपये में तो एक बार सिंचाई भी नहीं हो सकती

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वजिदपुर की प्रभावती देवी, अनिल कुमार, आनेश कुमार को सवा बीघे गेहूं की बर्बादी पर 330 रुपये का चेक मिला है। इन सबने पंप से गेहूं की सिंचाई की थी। कहते हैं एक बार की सिंचाई का भी पैसा न मिला।

वहीं बुद्धू की पत्नी रमावती कहती हैं कि तीन बीघा पर 372 रुपये का चेक मिला है। इसका हम क्या करेंगे? सीवन गांव निवासी आसमा पत्नी सब्बीर की बूढ़ी आंखों को अब भी मंत्री समेत अफसरों का चेहरा याद है।

बोली.. दो दिन पहले आए थे तो बड़ी-बड़ी बातें की। चार बीघा मसूर व एक बीघा सरसों बर्बाद हो गई। मदद के वादों पर लगा कि अब धान की रोपाई की चिंता नहीं होगी, कुछ आटा खरीद बच्चों का पेट पाल लूंगी। पर मायूसी मिली। ऊपर से चेक थमा दिया। जितना मिला नहीं उससे ज्यादा तो खाता खुलवाने में खर्च हो जाएंगे।

कोई भूसा भी दे दे , ले जाए पूरा गेहूं

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वाजिदपुर के कई किसान हैं जिन्हें राहत के नाम धेला भी नहीं मिला।  एहसानुलहक कहते हैं कि साढ़े छह बीघा गेहूं बर्बाद हो गया। लेखपाल ने तो सर्वे में नाम ही काट दिया।

एहसानुलहक पास के चौधरी के पुरवा में किसी से तय करके आए हैं कि वह उनकी फसल काट ले, सिर्फ भूसा दे दे। ठेला से सब्जी बेचने वाले मो. हुसैन समेत उनके आठ भाइयों की कुल 8 बीघे गेहूं की बर्बादी भी सर्वे में छूट गई है।

पौने बीघे की काश्तकार केवला देवी, तीन बीघा के भल्लू, साहिद, साजिद, जाहिद, दुर्गा प्रसाद, शिवबरन, श्रवण कुमार, रामू, मो. आमिल. हाशिम, मोरसिल अहमद, तुफैल अहमद, मो. खालिद, जियाद्दीन, फखरुद्दीन, इस्माइल, मो. करीम, राशिद, शहनाज बानो जैसे किसान राहत से वंचित हैं।

मृतकों के नाम बन गया चेक

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जिंदा को मदद नहीं मिल रही राजस्व विभाग मृतकों का चेक बनवा रहा है। वाजिदपुर की कमरुन्निशां के शौहर अली हसन का इंतकाल हो चुका है। मगर अली हसन के नाम पर फसल बर्बादी के एवज में सौ रुपये का चेक बना है।

इसी तरह चार साल पहले इंतकाल हो जाने के बाद भी इम्तियाज अली के नाम सौ रुपये का चेक प्रधान के यहां भेजा गया है। साजिद कहते हैं कि चाची कमरुन्निशां मुंबई में रहती थीं, वहीं चचा का इंतकाल हो गया। यदि लेखपाल ने गांव आकर सर्वे किया होता, तब न उसे हकीकत का पता चलता।

फसल का तो कुछ नहीं, कब्रिस्तान का काट दिया चेक
वाजिदपुर के ग्राम प्रधान शमसुद्दीन कहते हैं कि उन्होंने अपने गाटे में कब्रिस्तान बनवाया है। इसे वर्षों हो गए, पुरखों की कब्रे हैं। फिर भी लेखपाल ने 8 भाइयों के नाम सौ-सौ रुपये के चेक काटे हैं।

जबकि साढ़े छह बीघा बर्बाद हुई गेहूं की फसल का कोई मुआवजा नहीं दिया गया है। वह बताते हैं कि साढ़े चार हजार आबादी वाले वाजिदपुर करीब 800 बीघे खेती होती है। सबकी फसल फरवरी के आखिर में ओले से बर्बाद हो गई। लेकिन सर्वे के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हुई, अब राहत में खेल देख लोगों का हाल खराब है।

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