राज्यपाल बोले, सांसदों व विधायकों को हुआ 'कैंसर'
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राज्यपाल राम नाईक ने कहा कि सदन के कामकाज के कम होते दिन चिंता उत्पन्न करते हैं। तीन दिन के बजट सत्र बुलाए जाने लगे हैं। यह स्थिति अच्छी नहीं है। इससे न तो संसदीय परिपाटी समृद्ध होगी और न लोकतंत्र को मजबूती नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा कि विधायकों और सांसदों को वेल में आकर हंगामा करने की कैंसर जैसी बीमारी हो गई है।
राज्यपाल ने उच्च सदन की भूमिका को भी परिभाषित किया। कहा, राज्यसभा हो या विधान परिषद, इन दोनों सदनों का काम सिर्फ सरकार के कामकाज को रोकना नहीं है। अच्छा यह है कि विपक्ष को कहने का मौका मिले और सरकार को काम करने का।
उन्होंने सत्तापक्ष को नसीहत दी कि सरकार चर्चा से चलेगी तो अच्छे निर्णय आएंगे। वह रविवार को यहां विधानसभा मंडप में स्पीकर्स कॉन्फ्रेंस के समापन सत्र में बोल रहे थे। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, विधान परिषद सभापति गणेश शंकर पांडेय व विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने भी समापन सत्र को संबोधित किया।
होने चाहिए कड़े निर्णय
उन्होंने कहा कि सदनों के सामने सबसे बड़ी समस्या सदस्यों का बार-बार वेल में जाना है। इस पर कड़े निर्णय होने चाहिए। यह बीमारी कैंसर जैसी हो गई है। उम्मीद है कि सम्मेलन में इस बारे में चर्चा हुई होगी।
पक्ष व विपक्ष दोनों को बैठकर सदन में हुल्लड़-हंगामा रोकने के लिए उपायों पर चर्चा कर रास्ता निकालना चाहिए। सदस्यों को समझाना चाहिए कि सदन में हुल्लड़-हंगामा नई पीढ़ी को अखरने लगा है। यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि हुल्लड़-हंगामा करने वाले सदस्यों को वोट नहीं देंगे।
ध्वनिमत से न पारित कराएं विधेयक: राज्यपाल ने कहा कि विधायिका को जनता के लिए ज्यादा से ज्यादा उपयोगी तभी बनाया जा सकता है जब सदन के अंदर विधेयकों को ध्वनिमत से पारित कराने की परंपरा बंद हो।
उन्होंने चिंता जताई कि प्राय: देखा जाता है कि दूरगामी महत्व के विधेयक विधान मंडलों द्वारा अल्प चर्चा और कभी-कभी सदन में शोरशराबे के बीच बगैर चर्चा के ही ध्वनिमत से पारित करा दिए जाते हैं। बजट भी बिना चर्चा के पारित होने लगे हैं।
सत्रों की कार्यवाही तीन दिन में निपटाई जाने लगी है। यह ठीक नहीं है। कहा कि स्पीकरों को सदस्यों के विशेषाधिकार हनन के मामलों में पर्याप्त संवेदनशीलता से काम करना चाहिए। उन्हें देखना चाहिए कि कोई लोकसेवक सदस्य की गरिमा के विपरीत काम न करे।
संसदीय पद्धति पर भरोसा करने की ट्रेनिंग हो
राम नाईक ने कहा कि सदस्यों को संसदीय पद्धति पर भरोसा करने की ट्रेनिंग देनी चाहिए। साथ ही बताना चाहिए कि प्रश्नकाल और शून्य प्रहर को हंगामा करके बर्बाद करने से उनका ही नुकसान है।
अगर वे अपने क्षेत्र की बात उठाएंगे तो उन्हें अपने इलाके में समर्थन मिलेगा और सदन के जरिये वह अपने मतदाताओं के इलाके में विकास भी करा सकेंगे। सदस्यों ने सिर्फ विरोध का मार्ग अपनाया और हुल्लड़-हंगामा ही करते रहे तो उन्हें अपने क्षेत्र के बारे में बात करने का मौका नहीं मिलेगा।
स्पीकर देखे तो सदस्य बैठ जाए: राज्यपाल ने स्पीकरों को भी कामकाज के बारे में कई सुझाव दिए। कहा, सदन में हुल्लड़-हंगामा रोकने के लिए स्पीकरों के पास पहले से ही अधिकार हैं। पर, यह अधिकार तब चलेंगे, जब अध्यक्षों को सभी पक्षों का भरोसा हासिल होगा। स्पीकरों को इस बारे में खुद भी प्रयास करने होंगे।
अगर उन्हें सभी पक्षों का विश्वास प्राप्त होगा तो वह कड़े फैसले ले सकेंगे। इसलिए फैसला ऐसा करें जो सभी पक्षों को उचित लगे। फैसला भले ही किसी पक्ष के खिलाफ हो लेकिन उसे लगे कि निर्णय सही है। सुझाव दिया कि स्पीकर अपनी छवि को कुछ ऐसे गढ़नी चाहिए कि जिस सदस्य को वह गौर से देख लें तो बैठ जाए।
...तो वेल में आकर हंगामा करने से पहले सोचेंगे
राम नाईक ने स्पीकरों को सदन संचालन में पीठासीन पैनल के सदस्यों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने का सुझाव भी दिया। कहा, इससे ज्यादा से ज्यादा सदस्यों को कार्यवाही के संचालन का अनुभव मिलेगा। साथ ही जब वे सदस्य के रूप में भूमिका निभाएंगे तो वेल में आने और हंगामा करने से पहले सोचेंगे।
अध्ययनशील प्रतिनिधियों को दें ज्यादा मौका: राज्यपाल ने स्पीकरों से कहा कि उन्हें अध्ययनशील प्रतिनिधियों को बोलने का ज्यादा मौका देना चाहिए। जो सदस्य बोलते नहीं है, उन्हें भी बोलने का मौका देना चाहिए। इसके लिए उन्हें प्रेरित करना चाहिए। कहा कि अध्यक्ष के संरक्षण से एक सदस्य भी उल्लेखनीय काम करके बड़ी लकीर खींच सकता है।
राज्यपाल ने बताया कि उन्होंने अपने पते में बंबई लिखा होने को अशुद्ध बताकर आवाज उठाई तो लोकसभा के तत्कालीन स्पीकर के संरक्षण से धीरे-धीरे सरकार को बंबई को मुंबई मानने पर सहमत होना पड़ा।
इसी को नजीर बनाकर मद्रास चेन्नई तो कलकत्ता को कोलकाता नाम मिल गया। राम नाईक ने यह भी बताया कि उनके प्रयास से ही संसद में पहली बार 1992 में वंदेमातरम् और राष्ट्रगान शुरू हुआ। कहा, स्पीकर के संरक्षण से एक सदस्य भी बड़ा काम कर सकता है।
नियमों में बदलाव भी जरूरी
राज्यपाल ने कहा कि राज्य विधानमंडलों की कार्यवाही छह दशक पहले बनाए गए नियमावली से चल रही है। आज के संदर्भ में इसमें कुछ संशोधन और सरलीकरण होने चाहिए।
साथ ही अध्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके सदन की कार्यवाही में कागज के प्रयोग को नियंत्रित करना चाहिए।
बजा आधा राष्ट्रगान
इसे महज संयोग ही कहा जाएगा कि कुछ देर पहले राज्यपाल राम नाईक ने सदनों में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत शुरू कराने की बात कही और उनके भाषण के तुरंत बाद आधा-अधूरा ही राष्ट्रगान बज पाया।
हुआ यह कि राज्यपाल के भाषण के बाद विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने राष्ट्रगान की घोषणा की। पर, राष्ट्रगान बजना शुरू हुआ तो बीच से।