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राम गोविंद चौधरी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता देने पर राज्यपाल ने उठाए सवाल

Tue, 28 Mar 2017 08:18 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 28 Mar 2017 08:18 PM IST
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UP governor raises question on appointing ram govind as opposition leader.
राज्यपाल राम नाईक

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने निवर्तमान विधान सभा अध्यक्ष द्वारा नेता विरोधी दल के रूप में राम गोविन्द चौधरी को मान्यता दिये जाने के संबंध नवगठित विधान सभा के विचार के लिए संदेश भेजा है।

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राजभवन द्वारा भेजे गये संदेश में कहा गया है कि नवगठित विधान सभा, निवर्तमान विधान सभा अध्यक्ष द्वारा 16वीं विधान सभा के अंतिम कार्यदिवस दिनांक 27 मार्च, 2017 को नवगठित 17वीं विधान सभा के लिए राम गोविन्द चौधरी को 27 मार्च से नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दिए जाने संबंधी जारी अधिसूचना के लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक औचित्य के प्रश्न पर विचार करे।
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गौरतलब है कि विधान सभा सचिवालय (संसदीय अनुभाग) की ओर से 27 मार्च को अधिसूचना जारी की गई थी कि नवगठित 17वीं विधान सभा के लिए राम गोविंद चौधरी को नेता विरोधी दल के रूप में मान्यता दी गई है।
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नेता विरोधी दल को मान्यता देने का कोई अन्य उदाहरण देश के किसी राज्य में उपलब्ध नहीं है, जब किसी विधान सभा के कार्यकाल के अंतिम दिन विधान सभा अध्यक्ष द्वारा नवगठित अथवा आने वाली नई विधान सभा, जिसका कि विधान सभा अध्यक्ष सदस्य भी निर्वाचित नहीं हो सका हो, अगले पांच वर्ष के लिए नेता विपक्ष को मान्यता प्रदान कर दे।

पत्र में ये भी उठाए सवाल

UP governor raises question on appointing ram govind as opposition leader.

पत्र में यह भी कहा गया है कि लंबे समय से देश के सभी राज्यों की विधान सभाओं में नेता विपक्ष के चयन व मान्यता देने के संबंध में चली आ रही स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा का अनुपालन उत्तर प्रदेश की नवगठित 17वीं विधान सभा के नेता विपक्ष के चयन अथवा मान्यता देने में क्यों नहीं किया गया?

यह विधान सभा सचिवालय की ओर से जारी अधिसूचना से स्पष्ट नहीं होता है। विधान सभा में नेता विरोधी दल को मान्यता देने या न देना विधान सभा अध्यक्ष का विवेकाधिकार है न कि संवैधानिक बाध्यता।

राजभवन की ओर से भेजे गये पत्र में यह भी कहा गया है कि 27 मार्च को जारी अधिसूचना में यह स्पष्ट नहीं है कि नेता विपक्ष के चयन का मामला यदि नवगठित विधान सभा के नए अध्यक्ष पर छोड़ा गया होता तो किस प्रकार की संवैधानिक शून्यता अथवा संकट या फिर असंवैधानिकता पैदा होने की संभावना थी।

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