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यूपी चुनाव : टिकटों की अदला-बदली व लचर रणनीति ने बिगाड़ी सपा की हवा, सहयोगी दलों की नहीं हो पाई लामबंदी

Fri, 11 Mar 2022 06:26 AM IST
योगेश साहू चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ।
चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ। Published by: योगेश साहू Updated Fri, 11 Mar 2022 06:26 AM IST
सार

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के इर्द-गिर्द रहने वाली टीम अति आत्मविश्वास में रही। वह जमीनी जंग लड़ने के बजाय जनसभाओं में दिए जाने वाले जोशीले नारों को जीत का पैमाना मानती रही। इस युवा टीम ने कई वरिष्ठ नेताओं को अंतिम समय तक चक्कर कटवाया, जिसका नतीजा रहा कि वे हतोत्साहित होकर चुनावी मैदान में उतरने के बजाय घर बैठ गए।

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UP elections: ticket swapping and poor strategy spoiled the air of SP
जौनपुर में अखिलेश यादव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

समाजवादी पार्टी के विजय रथ को बहुमत के जादुई आंकड़े तक पहुंचने से रोकने में काफी हद तक पार्टी की लचर रणनीति जिम्मेदार है। टिकटों की अदला-बदली ने नामांकन के अंतिम दिन तक उम्मीदवारों को ही नहीं समर्थकों को भी पशोपेश में रखा। पार्टी के घोषणा पत्र में कई लोकलुभावन वादे किए गए। निश्चित तौर पर अन्य पार्टियों की अपेक्षा ये वादे अहम थे, लेकिन सपा उसे मतदाताओं तक पहुंचाने में चूक गई। इतना ही नहीं परंपरागत वोटबैक को भी दरकिनार किया गया।

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सपा के लिए सहयोगी दलों के साथ लामबंदी बनाए रखना भी चुनौती रही। लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने इसे दरकिनार किया। सपा ने रालोद, सुभासपा, जनवादी पार्टी, महान दल, प्रसपा और अपना दल (कमेरावादी) से गठबंधन कर जातीय गोलबंदी का प्रयास किया और पार्टी ने संबंधित जिले के वरिष्ठ नेताओं को गठबंधन वाले प्रत्याशियों के सिंबल पर वोट ट्रांसफर कराने का निर्देश दिया है। लेकिन यह रणनीति कारगर नही हुई। सपा के साथ मुस्लिम-यादव (एमवाई) समीकरण तो रहा, लेकिन अन्य जातियां एकजुट नहीं हो पाईं। सपा 348 सीटों पर खुद लड़ी।
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पार्टी ने अपने कोटे की सीटों में सर्वाधिक 53 उम्मीदवार मुस्लिम, 45 यादव, 20 ठाकुर और 21 ब्राह्मणों को मैदान में उतारा था। इसके अलावा अनुसूचित जाति की 85 सीटों के अलावा 70 सीटों पर अति पिछड़े, तीन कायस्थ और तीन सिख समुदाय के भी टिकट दिए। इसके बावजूद पार्टी दलितों और अति पिछड़े वोटबैंक को अपने पक्ष में लामबंद नहीं कर पाई।
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बागियों ने बिगाड़ा खेल
सपा ने कई वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी की तो वे भाजपा, बसपा और कांग्रेस के साथ हो लिए। औरैया से मुलायम सिंह यादव के साढ़ू प्रमोद गुप्ता, पूर्व मंत्री शारदा प्रसाद शुक्ला, पूर्व मंत्री शिवकुमार बेरिया जैसे नेता अनदेखी का आरोप लगा भाजपा में चले गए। फर्रुखाबाद में नरेंद्र सिंह यादव ने निर्दल उम्मीदवार के रूप में गणित बिगाड़े तो एटा के अजय यादव ने बसपा से ताल ठोंक दी। निवर्तमान विधायक अंबरीश पुष्कर का टिकट काटकर मोहनलालगंज से सुशीला सरोज को उतारना भारी पड़ा। मंटेरा से मो. रमजान ने सपा का टिकट लौटाकर कांग्रेस से श्रावस्ती से मैदान में उतर कर दोनों सीटों पर नुकसान पहुंचाया।

मझवां में सपा की जमीन तैयार करने वाले डॉ. विनोद कुमार बिंद को सपा ने नकारा तो वह निषाद पार्टी से मैदान में उतरे आैर जीते। रुदौली से टिकट न मिलने पर अब्बास अली बसपा से, बीकापुर से अनूप सिंह निर्दल, टांडा में शबाना खातून बसपा से, महोबा में गोपाल साहू का टिकट कटा तो उनका भई संजय बसपा से, मुरादाबाद देहात से सपा विधायक हाजी इकराम कुरैशी टिकट कटने के बाद कांग्रेस से और कुंदरकी विधायक हाजी रिजवान बसपा से, फिरोजाबाद सदर से अजीम की पत्नी बसपा से मैदान में उतरीं और सपा के वोटबैंक में सेंध लगा दी।

पार्टी कार्यकर्ताओं की अनदेखी पड़ी महंगी
सपा में टिकटों के वितरण में देरी के साथ उनकी अदला-बदली का खेल भी खूब चला। कुछ उम्मीदवारों ने शीर्ष नेतृत्व के आसपास रहने वालों पर टिकट के बदले उगाही तक का आरोप लगाया। पार्टी में चंद दिन पहले आने वालों को टिकट थमा दिया गया, जबकि सालों से सड़क पर संघर्ष करने वालों की अनदेखी की गई। प्रयागराज, जौनपुर, मिर्जापुर सहित कई जिलों की 50 से अधिक सीटें नामांकन के बाद बदली गईं।  ऐसे में एक व्यक्ति को टिकट मिलने पर दूसरे का विरोध जताना स्वाभाविक है। ऐसे में पहले से नामांकन करने वाले ने साथ रहने का दिखावा जरूर किए, लेकिन उनके साथ जुड़ने वाले वोटबैंक का सपा से मोहभंग हुआ। 

बसपा से आए नेताओं के सदुपयोग में चूक
सपा अध्यक्ष ने ताबड़तोड़ जनसभाएं कीं। इस दौरान उन्होंने बेरोजगारी का मुद्दा जोरशोर से उठाया। इसी तरह भविष्य के अन्य सुनहरे सपने भी दिखाए, लेकिन ये सपने सिर्फ युवाओं तक सीमित रहे। बसपा के वोटबैंक में सेंधमारी का प्रयास भी नाकाफी रहा। बसपा पृष्ठभूमिके कद्दावर नेता सपा में शामिल तो हो गए, लेकिन पार्टी उनका सदुपयोग करने में चूक गई।

टिकट कटा तो पलट कर नहीं पूछा
सपा में सर्वाधिक टिकट के दावेदार थे। एक-एक सीट पर 50-50 से अधिक दावेदारी थी। करीब 50 से अधिक सीटों पर टिकटों की अदला-बदली की गई। ऐसे में पार्टी को बड़ी संख्या में उन सीटों पर भी हार का सामना करना पडा, जहां के उम्मीदवारों ने टिकट लेने के बाद अन्य दावेदारों से हाथ मिलाना जरूरी नहीं समझा। ये उम्मीदवार टिकट लेकर सीधे क्षेत्र में गए। संगठन की परवाह नहीं की।

काम न आई पुरानी पेंशन की घोषणा
विधानसभा चुनाव में सपा ने बेरोजगारी, पुरानी पेंशन, 300 यूनिट बिजली सहित कई अहम मुद्दे उठाए थे। बेरोजगारी के मुद्दे पर युवाओं में एकजुटता दिखी। मतदान के दौरान भी बूथ पर युवाओं की भीड़ रही। इसका नतीजा रहा कि सपा के वोट बैंक में इजाफा। सपा ने आधारभूत विकास का वादा करते हुए 22 में 22 संकल्प जारी किया था। समाजवादी वचन पत्र में 300 यूनिट बिजली, पुरानी पेंशन बहाली के साथ आईटी सेक्टर में 22 लाख लोगों को रोजगार, 11 लाख खाली पदों को भरने, संविदा प्रणाली खत्म करने और अलग से महिला विंग बनाने का भी वादा किया। इसमें पुरानी पेंशन को मास्टर स्ट्रोक माना था।

 

उम्मीद थी कि कर्मचारियों के बहाने उनके परिवारों तक पहुंच बनेगी। मगर चुनाव परिणाम पर इसका असर नहीं दिखा है। इसी तरह फिर से बेरोजगारी भत्ता देने और लैपटॉप बांटने की योजना भी कारगर साबित नहीं हुई। महिला आरक्षण, 2025 तक किसानों को कर्जमुक्त बनाने का वादा भी काम नहीं आया। सभी फसलों के एमएसपी, गन्ना किसानों को 15 दिन में भुगतान, किसान आयोग के गठन, दो एकड़ से कम जमीन वालों को दो बोरी डीएपी व पांच बोरी यूरिया मुफ्त में देने के वादे के साथ किसानों को साधने का प्रयास किया गया था, लेकिन उसमें भी सपा कामयाब नहीं हो सकी।



अंबेडकरवादियों को जोड़ने की नीति फेल
सपा ने अंबेडकरवादियों को जोड़कर नया नारा देने का प्रयास किया। पार्टी को भरोसा था कि आरक्षण की दुहाई देकर दलित वोटबैंक में सेंध लगा लेंगे। जबकि सियासी जानकारों का कहना है कि बसपा से छिटकने वाला वोट बैंक बड़ी संख्या में भाजपा के साथ चला गया। वह सपा के साथ जुटने में असहज रहा।

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