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UP Election Result : कमजोर रणनीति, लचर प्रचार, धराशायी हुए बसपा के उम्मीदवार, अब तक के सभी खराब प्रदर्शन पर पहुंची बसपा
Thu, 10 Mar 2022 04:54 PM IST
पंकज श्रीवास्तव
अमित मुद्गल, अमर उजाला, लखनऊ
अमित मुद्गल, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Thu, 10 Mar 2022 04:54 PM IST
सार
बसपा वर्ष 1989 में यूपी विधानसभा के चुनावी रण में कूदी थी तो उसे 13 सीटें मिलीं थीं। 1991 में 12, 1993 और 1996 में 67-67, वर्ष 2002 में 98 मिलीं थी। वर्ष 2007 में 206 सीटों के साथ बसपा को पूर्ण बहुमत मिला। यहां तक बसपा सुप्रीमो मायावती चार बार सीएम बनीं। इसके बाद से बसपा का पतन शुरू हो गया।
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बसपा सुप्रीमो मायावती।
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
यह विधानसभा चुनाव बसपा के लिए अब तक का सबसे खराब चुनाव साबित हुआ है। बसपा सुप्रीमो मायावती की कमजोर रणनीति और लचर परिणाम का असर यह रहा कि बसपा कभी मजबूती से चुनावी रण में दिखी ही नहीं। परिणाम आया तो बसपा चारों खाने चित हो गई।
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बसपा वर्ष 1989 में यूपी विधानसभा के चुनावी रण में कूदी थी तो उसे 13 सीटें मिलीं थीं। 1991 में 12, 1993 और 1996 में 67-67, वर्ष 2002 में 98 मिलीं थी। वर्ष 2007 में 206 सीटों के साथ बसपा को पूर्ण बहुमत मिला। यहां तक बसपा सुप्रीमो मायावती चार बार सीएम बनीं। इसके बाद से बसपा का पतन शुरू हो गया। वर्ष 2012 के चुनाव में बसपा को 80 सीटें ही मिलीं तो लगा कि शायद सत्ता विरोधी रुझान के कारण ऐसा हुआ पर इसकेबाद वर्ष 2017 के चुनाव में तो बसपा की हालत और खराब हो गई। मात्र 19 सीटों पर सिमट आई। अब तो हालत और खराब हो गई।
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इस बार छिटक गया दलित
बसपा इस चुनाव में अपने दलित वोटरों को भी नहीं सहेज पाई। अधिकतर सीटों पर बसपा का वोट ट्रांसफर हुआ। इसी वोटर के दम पर बसपा सत्ता में या तो शामिल होती रही है या चुनाव परिणाम प्रभावित करती रही है। इस बार लगभग पचास प्रतिशत तक इस वोट बैंक में सेंध लगी। अधिकतर सीटों पर यह वोट भाजपा की ओर ट्रांसफर हुआ जबकि कुछ सीटों पर सपा गठबंधन की तरफ गया। दरअसल इसकी पटकथा लोकसभा चुनाव से ही शुरू हो गई थी और ऊपर से बसपा की पहले से ही नजर आ रही कमजोर स्थिति ने इस वोटर को दूसरी तरफ जाने के लिए मजबूर कर दिया।
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पुराना फार्मूला भी नहीं चला
बसपा ने इस बार पुराने उस फार्मूले को लागू करने की कोशिश की थी जिसके बल पर वर्ष 2007 में उसने पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल की थी। यही कारण रहा कि इस बार भी बसपा ने साठ से ज्यादा ब्राह्मणों और इससे ज्यादा मुस्लिमों को टिकट दिए। गणित था कि उसका कॉडर वोटर और उम्मीदवार की जाति का फार्मूला बसपा को हिट कर देगा पर ऐसा नहीं हो पाया। कॉडर वोट तो छिटका ही, ब्राह्मणों ने कोई खास रुचि बसपा में नहीं दिखाई। उधर मुस्लिमों ने सपा की ओर ज्यादा रुख किया। ऐसी स्थिति में बसपा का यह फार्मूला इस चुनाव में सुपर फ्लॉप साबित हुआ।
छोड़ गए सिपहसालार, ठंडा रहा प्रचार
इस चुनाव में बसपा का अब तक का सबसे ठंडा प्रचार रहा। पूरे चुनाव में मायावती ने 18 मंडलों में मात्र 18 सभाएं कीं। दो बड़ी सभाएं राज्य मुख्यालय पर कीं। हालांकि पाटी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा अपने परिवार के साथ प्रचार करते रहे और उन्होंने 150 से ज्यादा सभाएं की पर कुछ काम नहीं आया। बाकी बसपा केअधिकतर सिपहसालार उसे चुनाव से पहले ही छोड़ गए। चुनाव तक पहुंचते पहुंचते 19 में से मात्र तीन विधायक ही रह गए। दूसरे दलों से टिकट ले आए। ऐसे में इस बार बसपा कभी भी चुनावी रण में मजबूती से खड़ी दिखी ही नहीं।