UP: औषधि निरीक्षक लाइसेंस जारी करने में व्यस्त, जांच का नहीं वक्त... ऐसे चल रहा है नकली दवाओं का कारोबार
निरीक्षकों के पद खाली होने और दो-दो जिलों का कार्यभार होने से निगरानी प्रभावित होती है। ऐसे में नकली दवाएं ग्रामीण इलाकों तक पहुंच जाती हैं। यहां देखें पूरी रिपोर्ट:
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उत्तर प्रदेश के ज्यादातर औषधि निरीक्षक मेडिकल स्टोरों के लाइसेंस जारी करने तक ही सीमित हैं। उनके पास दवाओं की जांच के लिए वक्त ही नहीं है। यह जांच अभियान तभी शुरू होते हैं, जब किसी न किसी राज्य में कोई घटना हो जाती है। दबी जुबान से यह बात खुद औषधि निरीक्षक भी स्वीकार करते हैं।
प्रदेश में करीब एक लाख थोक और ढाई लाख से अधिक फुटकर दवा दुकानें एवं ब्लड बैंक हैं। हर साल इनमें करीब 10 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है। औषधि निरीक्षकों के स्वीकृत 109 पदों में से 32 खाली चल रहे हैं। जिन जिलों में दो औषधि निरीक्षक के पद हैं, वहां कहीं एक हैं तो कहीं एक भी नहीं। 13 जिलों में दो-दो जिलों का कार्यभार है। औषधि निरीक्षकों की मानें तो उनका ज्यादातर वक्त सिर्फ लाइसेंस संबंधी कार्य पूरे करने में ही जाता है, क्योंकि लाइसेंस की निरंतर समीक्षा होती है। 15 दिन में यह कार्य पूरा नहीं किया तो जवाब देना पड़ता है।
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लाइसेंस जारी करने से पहले स्थयील सत्यापन सहित अन्य प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है। ऐसे में दवाओं की जांच तभी कर पाते हैं, जब लाइसेंस से जुड़े कार्य कम होते हैं। हर जिले में चार से पांच तहसीलें हैं। करीब 100 किमी के दायरे में मेडिकल स्टोर हैं। ऐसे में अकेले सभी दुकानों तक पहुंचना नामुमकिन है। इसका फायदा मिलावट करने वाले और नकली दवा बनाने वाली कंपनियां उठाती हैं। यही वजह है कि नकली दवाओं की खेप ज्यादातर ग्रामीण इलाके की दुकानों पर पहुंचाई जाती हैं।
खुद करनी होती है न्यायालय में पैरवी
औषधि निरीक्षकों की मानें तो उन्हें न्यायालय में पैरवी के लिए कोई अतिरिक्त स्टाफ नहीं मिला है। कोई पैरोकार नहीं होने की वजह से उन्हें न्यायालय से जुड़े कार्य भी देखने होते हैं। न्यायालयों में बेहतर पैरवी नहीं करने और सुबूत नहीं जुटा पाने की वजह से तमाम आरोपी छूट जाते हैं।
कफ सिरप के खिलाफ 2022 में भी चला था अभियान
अक्तूबर 2022 में हरियाणा के सोनीपत की कंपनी द्वारा बनाए जाने वाले कफ सिरप से अफ्रीकी देश गांबिया में कई बच्चों की मौत हो गई थी। उस वक्त इस कंपनी के चार बैच को प्रतिबंधित किया गया। पूरे प्रदेश में जांच अभियान चलाया गया। जब तक अभियान चला संबंधित कंपनी के सिरप प्रदेश में नहीं मिले। इसके बाद फिर से बिक्री शुरू हो गई।
ये है निरीक्षकों की जिम्मेदारी
ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के तहत औषधि निरीक्षक दवा और कॉस्मेटिक के विनिर्माण, वितरण और विक्री की निगरानी करते हैं। उनके मुख्य कार्यों में विनिर्माण इकाइयों, प्रयोगशालाओं और फार्मेसियों का निरीक्षण करना, उत्पादों के नमूने लेना, लाइसेंस के अनुपालन की जांच करना, नकली या घटिया उत्पादों को रोकना और अधिनियम के उल्लंघन के लिए कानूनी कार्रवाई शुरू करना शामिल है।
अन्य राज्यों की स्थिति
बिहार और राजस्थान में हर जिले में पांच से छह औषधि निरीक्षक होते हैं। ऐसे में वे एक से दो तहसील की जिम्मेदारी लेते हैं। दूसरे विभागों से भी स्टाफ मिल जाता है। ऐसे में वहां निरंतर जांच अभियान चलता रहता है। प्रदेश में दवा निर्माण इकाइयां, फुटकर मेडिकल स्टोर और ब्लड बैंकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ड्रग निरीक्षक के पद कई साल पहले स्वीकृत किए गए। तमाम पद अभी भी खाली हैं। ऐसे में निगरानी तंत्र मजबूत नहीं है। निगरानी बढ़ाने के लिए मानव संसाधन बढ़ाना होगा। सिर्फ एक निरीक्षक के भरोसे पूरे जिले की निगरानी संभव नहीं है। रमाशंकर, पूर्व सहायक आयुक्त, औषधि।